सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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यद्यपि ग्रहगोलाध्याय और ग्रहगणिताध्याय में विषयों में समानता होते हुए भी कहीं- कहीं पर गोलाध्याय में खगोल विषयों का अधिक स्पष्ट और विस्तार किया गया है। ग्रहगोलाध्याय में १४ चौदह प्रकरण हैं, इसमें ज्योत्पत्ति और भुवन कोश प्रकरण भी सम्मिलित हैं— (१) गोलप्रशंसाध्याय, (२) गोलस्वरूप प्रश्नाध्याय, (३) भुवनकोश, (४) मध्यम- गतिवासना, (५) छेद्यकाधिकार, (६) ज्योत्पत्ति वासना, (७) गोलबन्धाधिकार, (८) त्रिप्रश्नवासना, (९) ग्रहण वासना, (१०) उदयास्तवासना, (११) शृङ्गोन्नत्ति- वासना, (१२) यन्त्राध्याय, (१३) ऋतुवर्णनाध्याय और (१४) प्रश्नाध्याय । ग्रहगणिताध्याय में भी उक्त प्रकरणों के विषयों के वर्णन के बावजूद सूर्यचन्द्रग्रहणा- धिकारों के पृथक् पृथक् अधिकार जैसे पर्वसंभवाधिकार इत्यादि विषयों का पृथक् वर्णन किया गया है। वास्तव में दोनों में ग्रहगणित और ग्रहगोलाध्याय में एक ही विषय का एक तथ्य विषय के सूक्ष्म गणित ज्ञान के लिये गणिताध्याय की रचना खगोलग्रहगोलज्ञान के आधार से इस गोलाध्याय में की गई है। इस प्रकार ग्रहगोलाध्याय एवं ग्रहगणिताध्याय के इन उक्त प्रकरणों का संक्षिप्त समन्वयात्मक विवेचन नीचे क्रमशः दिया जा रहा है— १. गोलप्रशंसाध्याय—आचार्य भास्कर ने गोलाध्याय के इस प्रथम गोलप्रशंसाध्याय में कहा है कि गोलाध्याय ग्रन्थ अति प्रांजल है। आज तक के जिन पूर्ववर्ती आचार्यों से जिन आवश्यक विषयों का बोध स्पष्ट नहीं हो पाया है उन कठिन विषयों का वर्णन, व्याख्यान इस गोलाध्याय में कर रहा हूँ, ऐसा कहते हुए गालाध्याय का प्रारम्भ हुआ है। 'गोलाध्याय के प्रथम श्लोक में भास्कराचार्य ने लालित्य लीलावती भारती सरस्वती अर्थात् नर्तक की नर्तकी की तरह मुखरूपी रंगस्थल में नृत्य करती हुई माँ सरस्वती तथा विघ्नराज गणेशजी की स्तुति से ग्रन्थ का प्रारम्भ किया है— सिद्धिं साध्यमुपैति यत्स्मरणतः क्षिप्रं प्रसादात्तथा यस्याश्चित्रपदा स्वलंकृतिरलं लालित्यलीलावती । नृत्यन्ती मुखरङ्गनेव कृतिनां स्याद्भारती भारती त तां च प्रणिपत्य गोलममलं बालावबोधं ब्रुवे ॥ इसी प्रकार वराहमिहिराचार्य के 'बृहज्जातक' ग्रन्थ के प्रारम्भ के मंगलश्लोक की तरह "गीर्वाणवन्द्यो रविः" देवताओं से स्तुत्य अनेक किरणवान् भगवान आदित्य की वन्दना से ग्रहगणिताध्याय का प्रारम्भ हुआ है । पृथ्वी नक्षत्र-ग्रहादिकों की ब्रह्माण्ड की सही स्थिति कहाँ पर है ? अर्थात् ग्रहगणित से प्रतिपाद्य पदार्थस्वरूप प्रतिपादित ग्रन्थ का नाम गालशब्द से ज्ञात होता हैं । करा-