सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ गोलाध्याये पुनरनुपात से त्रिज्यावृत्तीय वलन अ × त्रि क × त्रि ---------- तथा ---------- = क द्यु द्यु दोनों का संस्कार स्पष्ट वलन काल होता है । संस्कार = स्पष्ट वलन उक्त भाँति संस्कार से लब्ध प्राणों (असुओं) से क्षितिजस्थ ग्रह स्थान से ग्रहबिम्ब नत या उन्नत रहता है । सूर्य स्पष्ट = सू । इष्टकाल = स्पष्ट वलनासु से नत ग्रह से जो क्रम लग्न, और उन्नत ग्रह से जो उत्क्रम लग्न होती है वही ग्रहोदय लग्न होती है । इस क्रम का व्यस्त गणित, सू + ६ राशि से जो लग्न वह पश्चिमस्थ ग्रहबिम्ब दर्शनार्थ होता है । ग्रहों के लघु शर में उक्त गणित ठीक हो जाता है । यदि शर अधिक है तो मध्यम क्रान्ति से शर को स्पष्ट शर बना कर उक्त गणित करना चाहिए । तद्वशेन साधित आयनांश व वलनासुओं से ग्रह स्थान से ग्रह बिम्ब को नतोन्नत समझ कर आयनाक्ष वलन के योग वियोग संस्कृत काल में उक्तवत् लग्न साधन द्वारा ग्रह बिम्ब दर्शन समय ज्ञात करना चाहिए ॥३-९॥ अथ शरस्य स्पष्टीकरणमाह— सत्रिराशिग्रहद्युज्यानिघ्नस्त्रिज्योद्धृतः शरः । स्फुटोऽसौ क्रान्तिसंस्कारे दृक्कर्मण्यक्षजे तथा ॥१०॥ वा० भा०—अयं संक्षिप्तो गौणप्रकारः । मुख्यस्तु पूर्वं व्याख्यात एव । तथाऽपीह युक्तिमात्रमुच्यते । विषुवद्वृत्तात्क्रान्तिर्ध्रुवाभिमुखी । क्रान्त्यग्राच्छरः कदम्बाभिमुखः । कथं तेन तिर्यक्स्थेन सा संस्कार्या । अतः क्रान्त्यग्रे यद्द्युज्या- वृत्तं तस्य शराग्रस्य च यदन्तरमृजु तेन संस्कृता सती स्फुटा भवति । तच्चान्तरं कोटिरूपम् । शरः कर्णरूपः । तद्वर्गान्तरपदं द्युज्यावृत्ते भुजः । एतत्त्र्यस्रं दिग्व- लनजत्र्यस्रसंभवम् । तत्र सत्रिराशिग्रहक्रान्तिः कदम्बध्रुवसूत्रयोरन्तरम् । तज्ज्या भुजः । तद्द्युज्या कोटिस्त्रिज्या कर्णः । यदि त्रिज्ययेयं कोटिस्तदा शरेण केत्युप-