सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउदयस्तवासना ४०१ अथाऽऽरब्धोऽधिकारो निरूपित इति फक्किकयाऽऽह—इत्युदयास्तवासनाधिकार इति । उदयास्तयोर्दृक्कर्मज्ञानाधीनत्वाद्दृक्कर्मवासनानिरूपणेन तदधिकारवासनैव निरूपिता । तत्रोक्तस्य सुगमोपपत्तिकत्वादित्यर्थः । एतेनैव ग्रहच्छायाधिकारवासना प्रतिपादितेति सूचितम् । दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीरङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् । याता शिरोमणिमरीच्यभिधे समाप्तिं दृक्कर्मयुक्तिनिचयाधिकृतिः स्फुटेयम् ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमरङ्गनाथगणकात्मजविश्वरूपापरनामकमुनीश्वरगणकवि- रचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचावुत्तराध्याये दृक्कर्मवासनाधिकारः संपूर्णः ॥ केदारदत्तः—मन्द बुद्धि विद्यार्थी या कवि के लिए कहा जा रहा है कि— गुरु मुख से सम्यगध्ययन में मन न लगाने से विषय बुद्धिगत न होते हुये भी विषय ज्ञान के गर्व (मिथ्या) से, रस के अतिशयत्व लाभ से, पर विश्वास से या अत्यन्त प्रमाद से, बुद्धिमान विद्यार्थी भो मोह के वश में आकर अशुद्ध सिद्धान्त को भी शुद्ध मान बैठता है तो मन्दबुद्धि विद्यार्थी के लिये कहना ही क्या है ? कुत्सित काव्य रचयिता मन्दबुद्धि का कुकवि व्याकरण सिद्ध शब्द के महत्त्व को नहीं जानते, काव्यरचना के अभिमान से उत्पन्न सन्तोष से दूसरे के सही अर्थ बोधक वाक्य को भी नहीं मानते । वेश्या सेवनत्वेन रसिक होने के मिथ्याभिमान से सज्जन वृन्द से कृत निन्दा की भी उपेक्षा करते हैं । अर्थात्—शिष्टाचार और मर्यादा भङ्ग की भी ऐसे लोग उपेक्षा करते हैं । ग्रहगणित सिद्धान्त ग्रन्थों में उक्त प्रकार के ग्रन्थ रचयिता लोगों पर आचार्य ने यह कड़ा आक्षेप दर्शाया है आचार्य के इस कथन से लल्लनाचार्य पर ही अधिक आक्षेप हो सकता है।।२३।।२४।। इति सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगोलाध्याय के उदयास्तवासनाध्याय :—१० की श्री पण्डित हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत “केदारदत्तः” हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न । २६