सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें..." Wait: during the day, does moonlight reveal anything? "...प्रखरं तेजोऽपसार्य प्रतिबिम्बभागस्य चक्षुषा सह संयोगयोग्यत्वेन स्वाभिव्यक्तिजननार्हत्वात् ।" Wait, is it "अन्तर्-स्थितमन्धकारं"? Let's check if the word is "अन्धकारं": Look at the letters after "चन्द्रकरस्यान्तर्-": Letter 1: 'स्' Letter 2: 'थ' with 'ि' = 'स्थि' Letter 3: 'त' Letter 4: 'म' Letter 5: 'प्र' or 'भ' or 'ध्व'? Wait, look at the next word: "प्रतिहत्य"! Wait, what is "प्रतिहत्य"? Who destroys what? Or striking what? "प्रखरं तेजोऽपसार्य"? Wait, could it be: "चन्द्रकरस्यान्तर्-" "-स्थितस्तमःप्रसारं प्रतिहत्य"? No, 'व्यापारं'! Look at: 'व-्-य-ा-प-ा-र-ं' -> that is clearly 'व्यापारं'! Now what is before 'व्यापारं'? There is: 'म' + 'घ'? 'म' + 'ध'? 'म' + 'भ'? Wait, look at: "स्थितम" - then a letter that looks like 'भ' with a bar? Or 'स्व'?