सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयन्त्राध्याय ४२३ यन्त्र को जल धरातल में डालकर निरन्तर सावधानी से प्रथम पात्र में घड़ी के जलपूर्ण होने पर (डूबने लग रही हो) तो दूसरे पात्र में दूसरी घड़ी रख देने प १ घटी में से प्रथम घड़ी पात्र के जल की स्थिरता होगी दूसरी घड़ी पात्र में दूसरी घटी डाल देनी चाहिए इस प्रकार दूसरे अर्द्ध सूर्योदय बिम्ब तक ६० घटी होनी चाहिए । यह नाक्षत्र मान है । नक्षत्रोदय प्रथम से नक्षत्रोदय द्वितीय तक का समय यह ६० घटी का नाक्षत्राहोरात्र होता है । मेरी जन्मभूमि जुनायल ग्राम मेरे घर पर यह घटी यन्त्र आज भी विद्यमान है जिसका उक्त कथित उपयोग आसन्न प्रसव समय में, प्रसव दिनीय सूर्योदय से प्रसव समय तक किया जाता है ॥८॥ अथ शङ्कुमाह— समतलमस्तकपरिधिर्भ्रमसिद्धो दन्तिदन्तजः शङ्कुः । तच्छायातः प्रोक्तं ज्ञानं दिग्देशकालानाम ॥९॥ स्पष्टम् । इति शङ्कुयन्त्रम् ॥९॥ मरीचिः—अथ घट्यासन्नतयोपस्थितयोः शङ्कुचक्रयोर्मध्ये सुगमत्वाच्छङ्कुयन्त्रमार्य- याऽऽह–समतलेति । दन्तिदन्तजः । गजदन्तनिर्मितः । उपलक्षणात्सारदारूत्पन्नोऽपि शङ्कुः । समतलमस्तकपरिधिः । तलं मूलम् । मस्तकमग्रम् । तयोः परिधी समो यस्येत्येतादृशः । आद्यन्तग्रहणान्मध्यप्रदेशेष्वपि तत्तुल्यपरिधिरित्यर्थात्सिद्धम् । ननु सर्वप्रदेशसमपरिधिकः कथं सिद्धयेदत आह— भ्रमसिद्ध इति । समपरि[धि]वस्तुकरणं यन्त्रं लोके चरखा इत्युच्यते । तत्संलग्नतया भ्रमेण तादृशः सिद्धो भवतीत्यर्थः । दैर्घ्यमिष्टमनुक्तत्वात् । पूर्वैस्तु द्वादशाङ्गुलः शङ्कुरुक्तः । तथा च सिद्धान्तशेखरे—भ्रमविरचितवृत्तस्तुल्य- मूलाग्रभागो द्विरददशनजन्मा सारदारूद्भवो वा । अतिऋजुरवलम्बादव्रणः षट्कवृत्तः समतल इह शस्तः शङ्कुरर्काङ्गुलः स्यादिति । नन्वस्य यन्त्रत्वं कुत इत्यत आह— तच्छायात इति । उक्तशङ्कुच्छायायाः सकाशात् । दिग्देशकालांनां ज्ञानं त्रिप्रश्नाधिकारे सूक्ष्मत्वेनोक्तम् । पलभाज्ञानाद्देशज्ञानमित्यभीष्टकालद्वादशाङ्गुलशङ्कुच्छायातः पलभान- यनं प्रश्नोत्तरत्वेन प्रसिद्धतरम् । तथा चैतत्साधकवस्तुविशेषस्य यन्त्रत्वादुक्तशङ्कावपि यन्त्रत्वं स्वतः सिद्धिमिति भावः ॥९॥ केदारदत्त—शङ्कुयन्त्र निर्माण— हाथी के दाँत का या अन्य सुदृढ़ परिपक्व, शाल, शीशम साखू आदि लकड़ियों का समान तल मस्तक अर्थात् मूलस्थ परिधि प्रमाण के तुल्य अग्र भाग में भी परिधि होनी चाहिए अर्थात् मूल से शिर तक वर्तुलाकार चिक्कन शङ्कुयन्त्र होता है । किसी भी इष्ट समय में जल से समतल कृतभूमि में केन्द्र से इष्ट त्रिज्या से वृत्त बना कर केन्द्र में उक्त शंकु की स्थापना से इष्टकाल में जो छाया होती है वही एक प्रकार से खगोल शास्त्र की एक कुञ्जिका है, जिससे (१) दिशा, (२) देश और (३) काल का ज्ञान होता है ।