सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 530, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ें४२८ गोलाध्याये
करना चाहिए। उसकी परिधिस्थ पट्टी में १२ राशियों अंश कला के साथ ६० विभागों में ६० घटी यथा शक्ति एक घटी के ६० पल यथा सम्भव अङ्कित करने चाहिए। (सुषिर) छिद्र युक्त आधार में लम्बाकार ऊर्ध्व रेखा तदुपरि लम्ब रूपिणी अथ तिर्यक् रेखा करनी चाहिए। आधार से तिर्यग्रेखा के ९०° नब्बे अंशों पर परिधि और तिर्यक् रेखा सम्पात पर भू पृथ्वी की कल्पना करनी चाहिए। ६ राशि की दूरी पर अध्वं रेखा और परिधि सम्पात पर खमध्य की कल्पना करनी चाहिए। छिद्र में सूक्ष्म रेखा गमन शील (चक्रभ्रमणावसर सुविधा के लिये) लकड़ी देनी चाहिए। जिसे अक्ष शब्द से बोधित करना चाहिए। सूर्याभिमुख परिधि जैसे हो तैसे चक्र की आधार पर स्थापना करनी चाहिए। इस प्रकार कील अक्ष की छाया जहाँ पर परिधि पर लगती है वहाँ से क्षितिज गत चिह्न तक जो अंश होंगे भूमि से सूर्य तक जो भुक्तांश वे सूर्य के उन्नतांश, तथा छाया और खमध्य के अन्तर में नतांश होते हैं। इस प्रकार नतांश और उन्नतांश का ज्ञान होता है। अन्य आचार्यों ने उक्त यन्त्र से नत उन्नत घटिकाओं का भी ज्ञान किया है। जैसे— जिस दिन मध्य दिन में उन्नतांश तथा दिनार्ध, ज्ञान कर अनुपात द्वारा नतोन्नत घटिकाओं का ज्ञान प्रकार इस प्रकार से है कि— दिनार्ध घटिका × आनीत उक्त नतांश या उन्नतांश ────────────────────────────────────────── मध्यदिनीय उन्नतांश या नतांश स्थूल नतोन्नत घटिका होती हैं ॥१०॥११॥१२॥ अथ वेधेन ग्रहज्ञानमाह— पित्र्यर्क्षपुष्यान्तिमवारुणानामृक्षद्वयं नेमिगतं यथा स्यात् । दूरेऽन्तरेऽल्पेषु भखेचरौ वा तथाऽत्र यन्त्रं सुधिया प्रधार्यम् ॥१३॥ नेमिस्थदृष्ट्याक्षगतं प्रपश्येत् खेटं च धिष्ण्यस्य च योगताराम् । नेम्यङ्कयोरक्षयुजोस्तु मध्ये येंऽशाः स्थिता भध्रुवको युतस्तैः ॥१४॥ प्रत्यक् स्थिते भेऽथ पुरःस्थिते तैर्हीनो ध्रुवः स्यात् खचरस्य भुक्तम् । वा० भा०—तत्र यन्त्रस्याधोनेम्यां दृष्टिं कृत्वोर्ध्वनेम्याममुक्तर्क्षाणां मध्ये भद्वितयं युगपन्नेमिगतं यथा स्यात् तथा यन्त्रं स्थिरं कृत्वा नेम्यां धिष्ण्योरेकतरं स्थानमङ्कयेत् । ततोऽग्रे पृष्ठतो वा दृष्टिं चालयित्वा ग्रहं विध्येत् । ग्रहः प्रायोऽक्ष- गतो दृश्यते । अक्षमूलस्य ग्रहस्य चान्तरं शरो ग्रहावधिः । अक्षमूलं नेम्यां यत्र लग्नं दृश्यते तत् स्थानमप्यङ्क्यम् । अथ भग्रहाङ्कयोर्मध्ये येंऽशास्तैर्भध्रुवो युतः स्फुटग्रहो भवति । यदा ग्रहात् पश्चिमस्थं नक्षत्रम् । यदा पूर्वस्थं नक्षत्रं तदा भध्रुवो हीनः स्फुटग्रहो भवति । अथवाऽल्पशरं नक्षत्रं रोहिण्याद्यं ततो दूरेऽन्तरे यदा ग्रहस्तदा तावेव विद्ध्वा प्रोक्तवद्ग्रहज्ञानम् । इति चक्रयन्त्रम् ॥१३॥१४॥