भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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यन्त्राध्यायः ४३९ में एक लम्बरूप रेखा करनी चाहिए जिसका नाम लम्ब होता है। इस लम्ब को ९० भागों में वितरित कर प्रत्येक भाग में एक एक लम्बरूपिणी दोनों छोरों तक गमन करने वाली रेखा देनी या करनी चाहिए जो आधार गत लम्ब रेखा पर लम्ब रूपिणी होती है। प्रत्येक अंगुल गत तिर्यक् रेखाओं को एक से ९० अंश तक की पृथक् पृथक् ज्या समझनी चाहिए। आधार के नीचे ३० अंगुल पर जो ज्या और उसका ऊर्ध्वाधर लम्ब के सम्पात पर एक सुषिर = छिद्र करना चाहिए। उसमें अभीष्ट प्रमाण की एक शलाका स्थापित करनी चाहिए जिससे छाया उत्पन्न हो सके। इस शलाका का नाम अक्ष रेखा है। इस छिद्र से ३० अंगुल व्यासार्ध से एक वृत्त बनाना चाहिए इस वृत्त में काल ज्ञानाय ६० घटि- कायें एवं ग्रह ज्ञानाय ३६०° १२ राशियाँ कलादि से युक्त वृत्त में चिह्न करने चाहिए। प्रत्येक अंश १०, दश दश पालीयपल से अङ्कित करने चाहिए। ताम्रादि धातु को या वंशादि बांस आदि की ६० अंगुल की एक पट्टिका जिस अंगुल मान से फलक यन्त्र निर्मित हुआ है उसी अंगुल माप की पट्टिका भी होनी चाहिए। पट्टिका का विस्तार ३ अंगुल होता है तथा दैर्घ्य = ६० अंगुल होना चाहिए। पट्टिका के अग्र भाग में एक अंगुल विस्तार कुठाराकारा (कुल्हाड़ी) होना चाहिए। कुठार के विस्तार में भी एक छिद्र करना चाहिए। उक्त अक्ष रेखा प्रोत इस पट्टी को लम्ब रेखा में ऐसे रखना चाहिए जिससे अक्ष रेखा का एक भाग जिस प्रकार लम्ब रेखा का त्याग न करै, ऐसे यन्त्र को स्थापित करना चाहिए। १८।१९।२०।२१। इदानीं यन्त्रोपकरणमाह— यत् खण्डकैः स्थूलचरं पलाद्यं तद्गोकु १९ हृत् स्याच्च- रशिञ्जिनीह ॥२२॥ वा० भा०—यत्खण्डकोत्थं चरार्धं पानीयपलात्मकं तस्यैकोनविंशति १९ भागोऽत्र चरज्याज्ञेया। तानि चरखण्डानि। दिङ्नागसत्र्यंशगुणैः १०।८।३।२०। विनिघ्नो पलप्रभा स्युश्चरखण्डकानीति। तानि यथा सार्धचतुरङ्गुले ४।३० पल प्रभादेशे ४५।३६।१५। अत्रोपपत्तिः खण्डकैश्चरसाधने कथितैव। तच्चरं रूपतश्चरज्यारूपमेवाऽऽ- गच्छति। तच्च पानीयपलात्मकम्। अतस्तत् षड्गुणितमस्वात्मकं स्यात्। (स्वल्पत्वादस्य ज्या तावत्येव भवति)। ततोऽनुपातः। यदि त्रिज्याव्यासार्धे एतावती चरज्या तदा त्रिशद्व्यासार्धे कियतीति। अत्र त्रिंशच्चरज्याया गुणक- स्त्रिंज्या हरः। अतः षड्भिस्त्रिंशता च त्रिज्यापवर्तने कृते जात एकोनविंशतिर्हरः १९। रूपं १ गुणः। फलमत्र यन्त्रे चरज्येत्युपपन्नम् ॥२२॥

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