भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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यन्त्राध्यायः ४६५ क्रान्तिज्यया त्रिज्यातुल्या दोर्ज्या तदाऽभीष्टक्रान्तिज्यया केत्यनुपातेनाभीष्टसायनार्क- दोर्ज्येति ॥३६॥ केदारदत्तः—दिग्देश कालादि में किसी का भी ज्ञान होने पर भी केवल सूर्यदर्शन से भू पृष्ठ में निज स्थानादि का ज्ञान— यष्टि से और तीन समयों में तीन शङ्कुओं से सूर्य वेध द्वारा भूमण्डल में वेध स्थान कहां है ? और वर्ष के १२ महीनों में कौन मास आदि है इत्यादि के ज्ञान से समग्र पञ्चाङ्ग ज्ञान जिस विधि से यन्त्र या वेध विधि से होता है वह सब मात्र सूर्य दर्शन से हो जाता है—जैसे— अभीष्ट समय में तीन शङ्कुओं का ज्ञान कर समतल भूमि में त्रिज्या व्यासार्ध से एक वृत्त बनाकर, प्रथम और तीसरे शङ्कु के अग्र में एक तिर्यक सूत्र बांध कर, मध्य- शंकु के अग्र में अन्य एक सूत्र का अग्र भाग रखकर वह यंत्र लम्बरूप जैसे हो कण- गति से प्रथम शंकु के नीचे त्रिज्या वृत्त की परिधि तक ले जाकर पूर्व विभाग में एक चिह्न करना चाहिए । तथा अन्य सूत्र या वही सूत्र तीसरे शंकु के अभिमुख पूर्व प्रकार ले जाकर वृत्त के पश्चिम भाग में चिह्न करना चाहिए । इन दोनों चिह्नों पर गये हुए सूत्र का नाम उदयास्त सूत्र होता है । सूत्र और केन्द्र का आकार = अग्रा । उदयास्त सूत्र से अग्रा तुल्य आकार में केन्द्र से पूर्वापर रेखा देनी चाहिए । इस प्रकार शङ्कु मूल और उदयास्त सूत्र का अकार शंकुतल आदि के ज्ञान से पूर्वोक्त विधि से पलभा का ज्ञान हो जाता है । उपपत्ति—पूर्वापर समानान्तर उदयास्त सूत्र और द्युज्या का सार्ध से केन्द्र से क्रियमाण अहोरात्र वृत्त में उदयास्तादि सूत्र ज्ञान पूर्वक अहोरात्रवृत्त वृत्त तीन शंकुओं के तीन अग्र बिन्दु ज्ञान कर, आद्यन्त सूत्र के शिर में लम्ब सूत्र बाध कर, मध्य सूत्र से लम्बरूप नीचे की तरफ नीयमान उदयास्त सूत्र में ही उक्त सूत्र लगेगा, अतः अग्रा शंकुतल के ज्ञान से पलभा ज्ञान पूर्वक भूमण्डलस्थ वेध स्थानीय भूपृष्ठ बिन्दु में पलभा- अक्षांशादि ज्ञान हो जाते हैं । उपपत्ति—आद्यन्त शंकुओं के ऊपर, एक सूत्र जो आदि शंकु की दिशा के अभिमुख- भूमि में जहाँ लगेगा तथा अन्त्य शंकु अग्र अग्र से भूमि पर गत सूत्र जहाँ लगेगा उन बिन्दुओं पर गई हुई रेखा स्वोदयास्त सूत्र होती है जो पूर्वापर सूत्र की समानान्तरा होती है । पूर्वापर स्वोदयास्त सूत्रों का अन्तर = अग्रा । शंकुमूल से स्वोदयास्त सूत्र तक शंकुतल । ३०