सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऋतु" or maybe "संबन्धृतु"? Wait, if it's 'ऋ', then it is "संबन्धऋतुकालस्य"! Wait, look at L21 again: "संबन्ध" then 'ऋ' then 'तु' = "संबन्धऋतुकालस्य"! Wait, could it be "संबद्धऋतुकालस्य"? Look at the anusvara: there is an anusvara on 'स': 'सं'. Then 'ब', then 'न्ध'. Wait, is there a gap between ध and ऋ? Yes, "संबन्ध ऋतुकालस्य" or "संबन्धऋतुकालस्य". And later in L21: "पूर्वापरविभागज्ञानं चर्तुचिह्ना-" -> Wait, "चर्तुचिह्ना-" or "च ऋतुचिह्ना-" or "चर्तुचिह्ना-"? Look at: "च" + "र्तु" (त with repha and u-matra) = "चर्तु"! Yes, "चर्तुचिह्ना-"!
रम्भात्त्रिंशत्सोदान्तर्गतान्तर्गताभीष्टदिनक्रमेण । Wait! Let's read L22 carefully: "रम्भात्त्रिंशत्सोदान्तर्गतान्तर्गताभीष्टदिनक्रमेण ।" Wait: "रम्भात्" + "त्रिंशत्" + ... What is after त्रिंशत्? Is