सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
ऋतु" or maybe "संबन्धृतु"? Wait, if it's 'ऋ', then it is "संबन्धऋतुकालस्य"! Wait, look at L21 again: "संबन्ध" then 'ऋ' then 'तु' = "संबन्धऋतुकालस्य"! Wait, could it be "संबद्धऋतुकालस्य"? Look at the anusvara: there is an anusvara on 'स': 'सं'. Then 'ब', then 'न्ध'. Wait, is there a gap between ध and ऋ? Yes, "संबन्ध ऋतुकालस्य" or "संबन्धऋतुकालस्य". And later in L21: "पूर्वापरविभागज्ञानं चर्तुचिह्ना-" -> Wait, "चर्तुचिह्ना-" or "च ऋतुचिह्ना-" or "चर्तुचिह्ना-"? Look at: "च" + "र्तु" (त with repha and u-matra) = "चर्तु"! Yes, "चर्तुचिह्ना-"!
रम्भात्त्रिंशत्सोदान्तर्गतान्तर्गताभीष्टदिनक्रमेण । Wait! Let's read L22 carefully: "रम्भात्त्रिंशत्सोदान्तर्गतान्तर्गताभीष्टदिनक्रमेण ।" Wait: "रम्भात्" + "त्रिंशत्" + ... What is after त्रिंशत्? Is
मीचीनो"! This book has typos! Look at L28: "वर्गवेदेन्द्रद्युतिमूलरूपकर्णानुरोधात्त्रिज्यावृत्तेऽप्रा" -> 'ऽप्रा' instead of 'ऽग्रा'! So the typesetter of this book makes typos! Let's transcribe accurately what the image shows, including typos if they are in the printed text, but let's be careful to read the print correctly.
Let's do a complete line-by-line check:
४६४ गोलाध्याये वसन्तादिषडृतूनां ज्ञापकवस्तूनि । अग्रतः । यन्त्राध्यायसमाप्त्यव्यवहितानन्तरम् । वक्ष्ये । कथयिष्ये । अत्रर्तुवर्णने यन्त्रप्रतिपादनमध्ये काव्यग्रन्थः प्रेक्षावतामुन्मत्तप्रलपितो लगतीति पृथक्तद्वर्णनाध्यायः कृतः इति भावः । अत्रोपपत्तिः-प्रथमचरणे मेषादित्रयान्तर्गतत्वेन दोर्ज्याधनुरेवार्कः । द्वितीयपदे षड्भाच्छुद्धेन भुजसंभवादोर्ज्याधनुर्भाद्यं भुजः षड्भाच्छुद्धोऽर्को भवति । तृतीयपदे षड्भि- रूनोन भुजसंभवाद्भुजः षड्भयुतोऽ
मीनान्त तक सूर्य का परम भुजांश ३ राशि तक होता" Wait, "धनुषान्त" or "धनुषान्त,"? Yes, comma.
L30: "है तो वेध से सिद्ध उक्त रवि भुजांश को वर्ष के किस चरण में माना जायगा ? संशय"
L31: "निराकरण के लिये, मेषादि सूर्य में उक्त भुजांश ही स्वयं स्पष्ट रवि हैं । वर्ष के दूसरे"
Let's check the line markers and overall layout: Header: यन्त्राध्यायः ४६१
Lines to . Everything is clear and accurately matched to the text.[यन्त्राध्यायः] [४६१]
साधितोऽस्मात्कारणात् । दिग्देशांशो । आद्यशब्दात्क्रान्तिज्याख्यादिसाधनम् । चकारान्न सद्भवत्यत एव तदुपेक्ष्य मया भिन्नमार्गेणाग्रादिज्ञानमुपकल्प्योक्तम् । दिने छायाग्राणां बहुत्वसंभवाद्द्रुतभिन्नभित्रितयेन प्रत्येकं छायाभ्रमवृत्तं भिन्नं भवतीति दक्षिणोत्तररेखाया अपि भिन्नत्वम् । न वा सर्वच्छायाभ्रमणवृत्तानां याम्योत्तररेखायामेकत्र संपातो येन मध्याह्नच्छायानिश्चयज्ञा
४६० गोलाध्याये चरण में वेध से प्राप्त रवि भुजांश है तो उक्त भुजांश ६ राशि में घटाने से और तृतीय चरण में ६ राशि जोड़ने से और चतुर्थ चरण में १२ राशि में घटाने से स्पष्ट सूर्य का ज्ञान होता है । मकरादि २, दो राशियों के सूर्य में शिशिर, मीन मेष के सूर्य में वसन्त, वृष मिथुन के सूर्य में ग्रीष्म, कर्क सिंह के सूर्य में वर्षा, कन्या तुला के सूर्य में शरद और वृश्चिक धनु के [सूर्य में हेमन्त ऋतु होती है, इस प्रकार रवि भुजांश ज्ञान से मेषादि द्वादश राशिगत सायन सूर्य का ज्ञान होता है । कुछ आचार्यों ने छाया भ्रमण से अर्थात इष्ट काल में १२ अंगुल शंकु की तीन समय की छाया, ज्ञान कर तीनों छायाग्रों लम्ब रेखाओं के (मत्स्य मुख पुच्छ रेखा) योगादि सम्बन्ध से छायाग्रत्रितयसूत्रस्पृक् परिधि में छाया का भ्रमण आदि (भाभ्रम) छाया भ्रमण वृत्तात्मक परिधि मार्ग में बताया है। स्वल्पान्तर से एक दिन सम्बन्धिनी अभीष्ट छाया भ्रमण वृत्त में हो सकता है। क्रान्तिगति का एकरूप वेग न होने से छाया का भ्रमण वृत्त में न होकर वृत्तों के वलयादि परिवलयादि मार्गों में होता है इत्यादि। विस्तारभय से यह विषय यहाँ अलम समझ कर विशेष ज्ञान के लिये म० म० पं० सुधाकर द्विवेदी विरचित दिङ्मीमांसा, भाभ्रम आदि ग्रन्थों को देखना चाहिए। तथा—उक्त प्रकार से वेधज्ञान से साधित स्पष्ट सूर्य का मान चल मेषादि, (नाडी क्रान्तिवृत्त का वर्त्तमान सम्पात) से होता है । यतः सारा फलित ज्योतिष निरयण गणना से होने से वेधसाधित उक्त स्पष्ट रवि में पात नाम अयनांश कम करना चाहिए, जिससे अहर्गण से साधित स्पष्ट रवि के तुल्य फलादेश के उपयोग का स्पष्ट रवि हो जावेगा । सौरसिद्धान्तानुसार पात नाम अयन की दोलायमान गति स्थिर सम्पात से :- २७° अंश पूर्व पुनः २७° पश्चिम पुनः २७ अंश पश्चिम और पुनः २७° पूर्व एवं २७ × २ = ५४ तथा ५४ × २ = १०८ अथवा २७ × ४ = १०८ अंश पूर्व पश्चिम सम्पात चलन से अयनांश का १ भगण होता है अतः ऐसी परिस्थिति में वेधसिद्ध सूर्य स्पष्ट को पात में कम करने से निरयण स्पष्ट रवि होता है । ततः स्पष्ट रविज्ञान से विलोम विधि से मध्यम रवि और मध्यम रवि ज्ञान के अनन्तर मध्यम रवि से विलोम से अहर्गण ज्ञानकर अहर्गण ज्ञान के अनन्तर विलोम विधि से कल्पगत सौर वर्षों का ज्ञान करना चाहिए ॥३७॥३८॥३९॥ इदानीं धीयन्त्रं विवक्षुरादौ तत्प्रशंसामाह— अथ किमु पृथुतन्त्रैर्धीमतो भूरियन्त्रैः स्वकरकलितयष्टेर्दत्तमूलाग्रदृष्टेः । न तदविदितमानं वस्तु यद्दृश्यमानं दिवि भुवि च जलस्थं प्रोच्यतेऽथ स्थलस्थम् ॥४०॥
यहाँ दिए गए पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
यन्त्राध्यायः ४७१ अत्र प्रश्नः— वंशस्य मूलं प्रविलोक्य साग्रं तत्स्वान्तरं तस्य समुच्छ्रयं च । यो वेत्ति यष्ट्यैव करस्थयाऽसौ धीयन्त्रवेदी वद किं न वेत्ति ॥४१॥ स्पष्टार्थम् ॥४०॥४१॥ अथ यष्ट्या ध्रुववेधेन पलभामाह— यष्ट्यग्रमूलसंस्थं विद्ध्वा ध्रुवमग्रमूलयोर्लम्बौ । बाहुर्लम्बान्तरभूर्लम्बोच्छ्रायान्तरं कोटिः ॥ ४२ ॥ कोटिर्द्वादशगुणिता बाहुविभक्ता पलप्रभा ज्ञेया । वा० भा०—अत्र समायां भूमौ स्थित्वा गणकेन वेधः कर्तव्यः । यष्ट्यग्रमूल- संस्थमिति । यष्टेरग्रे मूले चैकहेलया यथा ध्रुवः संलग्नो दृश्यते तथा यष्टिर्धार्या । ततस्तदग्रान्मूलाच्च लम्बनिपातौ कार्यों । भुवि लम्बनिपातयोरन्तरे यावन्त्यङ्गु- लानि तावान् भुजः । एवं लम्बोच्छ्रययोरन्तरे यावन्ति तावती कोटिः । यष्टि- प्रमाणं कर्णः । सर्ववेधेष्वप्ययमेव विधिर्ज्ञेयः । ततोऽनुगतः । यद्यनेन बाहुनैतावतो कोटिस्तदा द्वादशांगुलेन किमिति फलं पलभा स्यात् ॥४२॥ मरीचिः—अथावशिष्टं धीयन्त्रं पूर्वोक्तयन्त्रान्यथासिद्धिकर्तृत्वेनाम्यर्हितमालिन्या प्रतिजानीते—अथ किमु इति । अथ पूर्वोक्तयन्त्रप्रतिपादनश्रमानुभवानन्तरम् । धीमतो बुद्धिः स्वतो यन्त्रम् । तद्वतो गणकस्य। भूरियन्त्रैर्बहुभिः प्रागुपपादितैर्यन्त्रैः प्रतिपादेन संजाता महाग्रन्था येषां तैरित्यर्थः । किमु किं प्रयोजनमपि तु नैव प्रयोजनमित्यर्थः । कुतोऽतः कारणमाह—नेति । दिवि । आकाशे । भूमौ । चः समुच्चये । भुवो भेदद्वयमाह—जलस्थमिति । स्थलस्थम् । निर्जलप्रदेशस्थम् । यद्वस्तु दृश्यमानम् । नयनगोचरम् । तत् तस्य धीयन्त्रवतः पुरुषस्य । अविदितमानम् । अज्ञातं प्रमाणं यस्य तादृशं न स्यात् । ज्ञातमानं भवेदित्यर्थः । ननु केवलधीयन्त्राज्ज्ञातमानं वस्तु कथं स्यान्नहि विना किंचिदाश्रयं बुद्ध्या ज्ञातुं शक्यते इत्यत आह—स्वकरकलितयष्टेरिति । निजहस्ते गृहीता यष्टिः शलाका स्वाभि- मतप्रमाणा येनैतादृशस्य धीयन्त्रवतः पुरुषस्य । तथा च शलाकाश्रयमात्रेण धीमतस्तज्ज्ञानं शक्यमेवेति भावः । ननु गृहीतयष्ट्या कथं वा तस्य तज्ज्ञानं संबन्धाभावादत आह—दत्त- मूलाग्रदृष्टेरिति । दत्ता गृहीतयष्टिमूलाग्रयोर्दृष्टिरेका येनैतादृशस्य । तथा च मूलाग्रैक- समसूत्रवस्तुदर्शनरूपवेधसम्बन्धाद्धीमतस्तज्ज्ञानं भवेदेव । निर्बुद्धेस्तु तादृशवेधसद्भावेऽपि तन्मानज्ञापकप्रकारोपकल्पनसामर्थ्याभावान्न तज्ज्ञानमिति भावः । एवं च दृश्यमानवस्तु- प्रमाणज्ञानं धीयन्त्राद्भवतीत्यन्येषामुपयोगाभाव इति भावः ।
! Wait, let's look at the typeset word: अ, भि, म, त, य, ष्ट, ु, ग, wait, no, is that a 'यु'? Yes, it literally looks like: "अभिमतयष्ट्युगपन्मूलाग्रयोः" or "अभिमतयष्टेर्युगपन्मूलाग्रयोः". Wait, look at: "यष्ट्युगपन्मूलाग्रयोः" vs "यष्टेर्युगपन्मूलाग्रयोः". Wait, look at the letter: य (ya) ष्ट (sh-ta) Then a 'यु' (yu)? Wait, look at 'यु' in 'युगपन्': 'यु' has a loop at the bottom curving left. Does 'ष्ट' have that? No, after ष्ट, there is a 'यु'! Wait, is there a repha on यु? Look above the line between ष्ट and यु: there is a tiny mark. If it is a repha, then it's 'यष्टेर्यु' or 'यष्ट्यु'? But there is no e-matra on ष्ट! Wait, whether it's "यष्ट्युगपन्मूलाग्रयोः" or "यष्टेर्युगपन्मूलाग्रयोः", let's be extremely faithful to what is legible. Wait, if it's "यष्ट्युगपन्मूलाग्र
यन्त्राध्यायः ४७३ कल्पितम् । तेनाक्षज्यास्थानापन्नपलभायाः कोटित्वम् । द्वादशाङ्गुलशङ्कोर्भुजत्वमिति । लम्बनिपातान्तरभूमानभुजे लम्बोच्छ्रयान्तरं कोटिस्तदा द्वादशाङ्गुलशङ्कुभुजे केत्यनुपातेन पलभा । अन्यथा तदसिद्धेः । न चैतत्क्षेत्र एव भुजकोट्योर्व्यत्यासादुक्तं संगच्छते इति वाच्यम् । ऊर्ध्वाधरकोटेर- पलापेन वक्ष्यमाणानुपपत्तेः । पलभासिद्धितात्पर्येण कोटित्वेन तत्सिद्धावक्षतेश्च । एवं सूर्यवेधाद्यष्टिकर्णे लम्बोच्छ्रायान्तरं कोटिर्लम्बनिपातान्तरं भुजस्तदा त्रिज्याकर्णे क इत्यनु- पातेन शङ्कुदृग्ज्ये भवतः । आभ्यां त्रिप्रश्नोक्तविधिना काल इति धीयन्त्रस्य गोलसंबन्धो- ऽस्त्येवेति भावः ॥४२॥ केदारदत्तः—बुद्धि ही यन्त्र है— विशाल ग्रन्थ रचना और गुरु शिष्य परम्परा से उनके अध्ययनाध्यापन से बुद्धि के साथ शास्त्र सम्बर्धन होता है यह सब तो बुद्धि साध्य है, अत एव ज्योतिष के बृहद् ग्रन्थोक्त अनेकों यन्त्रों के वर्णन से तभी लाभ हो सकता है जब बुद्धि भी साथ दे । अत एव अपने हाथ में स्थापित सुन्दर यष्टि के मूल से अग्रभाग की दृष्टि वशेन आकाश में ग्रह तारा आदिकों के वेध से दृश्यमान आकाश से कोई भी मान अविदित नहीं रहता आकाशस्थ पातालस्थ और जलस्थ सभी वस्तु दृश्य होकर उनकी सभी जानकारियां सुलभ होती हैं, अर्थात् बुद्धि ही ग्रह गति ज्ञान के लिये एक महान् यन्त्र हो जाती है । प्रश्न किसी बांस का मूल और अग्र भाग को देखकर और दृष्टा से वंश की अन्तर भूमि और वांस की ऊँचाई भी देखकर ज्ञात होने पर जो हस्तगत यष्टि से बांस की ऊँचाई, अपने से वांस तक की अन्तर भूमि जान सकता है वही बुद्धियन्त्र का ज्ञाता क्या क्या नहीं जान सकता है । अर्थात् तीव्र बुद्धि का धीयन्त्रवेदी गणक ही सब कुछ वही समझ सकता है । तात्पर्य बुद्धि की प्रधानता से है । यष्टि से ध्रुववेध द्वारा पलभा ज्ञान— यष्टि के अग्रभाग से ध्रुव का वेध कर यष्टि के अग्रभाग से भूमिगत लम्ब मान और यष्टि मूल से भूमिगत लम्बमानों के अन्तर मान को लम्बमान मान कर तथा दोनों लम्ब- मूलों की मध्यगत भूमि को भूमि मान कर ओर यष्टि को कर्ण मान कर जो एक अक्ष- क्षेत्र का सजातीय त्रिभुज बनता है उस आधार से अक्ष क्षेत्रानुपात से ध्रु भू × १२ / ध्रु भू भू = लम्बोच्च्यान्तर कोटि × १२ / अन्तर भूमि = पलभा उपपन्न होती है ॥४०॥४१॥४२॥
४७४ गोलाध्याये [चित्रम्: ध्रु, यष्टिमूल, भू, भुं, यष्ट्यग्र सेलम्ब मूल, यष्टिमूल सेलम्ब मूल, अन्तर भूमि] इदानीं वंशादिवेधमाह— विद्ध्वैवं वंशतलं दृष्ट्युच्छ्रायाहताद्बाहोः ॥४३॥ कोट्या लब्धं ज्ञेयं स्ववंशमध्ये महीमानम् । विद्ध्वाऽथो वंशाग्रं भूमानं कोटिसंगुणं भक्तम् ॥४४॥ दोष्णा वंशोच्छ्रायो दृष्ट्युच्छ्रायेण संयुतो ज्ञेयः । उदाहरणम्— पञ्चशक्राङ्गुला १४५ यष्टिरष्टषष्टिर्दृगुच्छ्रायः । षट् करास्तलवेधो दोः कोटिः सप्तदशाङ्गुला ॥ अग्रवेधे रसेशा ११६ दोः कोटिस्तुरगकुञ्जराः ८७। वंशस्य यस्य तन्मानं चाऽऽत्मवंशान्तरं वद । वा० भा०—यष्टिः १४५ । दृगुच्छ्रायः ६८ । तलवेधे बाहुः १४४ । कोटिः १७ । अग्रवेधे बाहुः ११६ । कोटिः ८७ । अत्र तलवेधेऽग्रवेधे वा ध्रुववद्यष्ट्यग्र- मूललम्बयोरन्तरभूर्भुजः । एवं यथोक्तकरणेन लब्धमात्मवंशान्तरम् ५७६ । वंशोच्चयम् ५०० । अत्रोपपत्तिः । आत्मवंशान्तरभूमिर्भुजः । दृष्ट्युच्छ्रायः कोटिः । दृष्टिवंशमूल- योर्बद्धं सूत्रं कर्णः । एतत्त्र्यस्रानुसारमेव यष्ट्या बेधेन त्र्यस्रमुत्पद्यते । तच्च
लम्बान्तरभूर्भुजः । लम्बोच्छ्रयान्तरं कोटिः । यष्टिः कर्णः । अतोऽनेनानुपातः । यद्यनया कोट्याऽयं भुजो लभ्यते तदा दृगुच्छ्रायकोट्या क इति । फलमात्म- वंशान्तरभूमिः । एवमग्रवेधेऽपि । एवं वंशमूलादुपरि दृष्ट्युच्छ्रायमितेऽन्तरे चिह्नं कल्प्यम् । तद्दृष्ट्योरन्तरे रेखा भूमानमिता स भुजः । चिह्नोपरिस्थं वंशखण्डं कोटिः । दृष्टिवंशाग्रयोर्बद्धं सूत्रं कर्णः । एतत्त्र्यस्रानुसारमेव वेधस्त्र्यस्रं भवत्यतो- ऽनुपातः । यदि वेधभुजेन वेधकोटिर्लभ्यते तदा भूमितेन भुजेन केति । फलं चिह्नोपरितनवंशखण्डम् । तद्दृष्ट्युच्छ्रायेन युतं सकलवेणुप्रमाणम् ॥४३॥४४॥ मरीचिः—अथ तत्स्वान्तरमिति प्रश्नस्योत्तरमाह—विद्ध्वेति । एवं यष्ट्यग्रमूलसंस्थ- मिति प्रकारेण वंशतलं वस्तुनो मूलं विद्ध्वा । अग्रमूलयोर्लम्बावित्यादिना प्रागुक्तेन बाहु- कोटी ज्ञेये इति शेषः । ततो दृष्ट्युच्छ्रायाहतात् । वेधसमये यो दृष्टेरुच्छ्रायो यष्टिमूल- संबन्धिलम्बतुल्यस्तेन गुणितात् । भुजालम्बनिपातान्तरात् । लम्बोच्छ्रायान्तररूपकोट्या । भागेन फलम् । स्ववंशमध्ये । आत्मवस्तुनोरन्तराले । भूप्रमाणं ज्ञेयम् । अथ तस्य समुच्छ्रयं चेति प्रश्नस्योत्तरमाह—विद्ध्वेति । अर्थो तत्स्वान्तरज्ञानसंपाद- नोत्तरम् । द्वितीयप्रश्नोत्तरं पूर्वप्रश्नोत्तरज्ञानं विना न संभवतीति सूचनार्थमिदमुक्तम् । वंशाग्रम् । ऊर्ध्वाधरवस्तुन ऊर्ध्वमग्रम् । प्रागुक्तरीत्या विद्ध्वा । प्रागुक्तविधिना भुजकोटी ज्ञेये । ततो भूमानम् । प्रागानीतात्मवस्त्वन्तरमहीमानम् । कोटिगुणितम् । भुजेन भक्तम् । फलं वंशोच्छ्रायः । ऊर्ध्वाधरवस्तुन औच्छ्यम् । ननु प्रत्यक्षविरुद्धमेतदत आह—दृष्ट्युच्छ्रायेणेति । अग्रवेधकालिकयष्टिमूललम्ब- प्रमाणेनेत्यर्थः । संयुतः प्रागानीतवंशोच्छ्रायो युतः । वंशः । वंशस्य वस्तुनो मानं नहि पूर्वानीतो वंशोच्छ्रायो वंशमानं येन बाधः, किंतु दृष्टेरुर्ध्वसमसूत्रेण वंशखण्डमत एव दृष्ट्युच्छ्राययोगात्संपूर्ण वंशमानमिति भावः । अत्रोपपत्तिः—आत्मवस्तुनोरन्तराले भूप्रदेशसमसूत्रं भुजः । दृष्ट्युच्छ्रायः कोटिः । दृग्वस्तुमूलयोरन्तरसूत्रं कर्ण इति महत्क्षेत्रान्तर्गतमेव मूलवेधजनितलघुक्षेत्रम् । अतो लघुकोट्या लम्बोच्छ्रायान्तररूपया लघुभुजो लम्बनिपातान्तरभूमितुल्यस्तदा इष्ट्युच्छ्राय- कोट्या यष्टिमूललम्बतुल्यया क इति भुजमानमात्मवस्त्वन्तराले भूमिप्रमाणम् । एवं वंशाग्रवेधे वंशमूलादुपरि इष्ट्युच्छ्रायमितेऽन्तरे वंशे चिह्नं कल्प्यम् । तद्दृष्ट्योरन्तररेखा- ऽऽत्मवंशान्तरभूमिता भुजः । चिह्नोपरिस्थं वंशखण्डं कोटिर्दृष्टिवंशाग्रयोः सूत्रं कर्ण इति महत्क्षेत्रान्तर्गतमेवाग्रवेधजनितलघुक्षेत्रमतो लघुभुजेन लघुकोटिस्तदाऽऽत्मवंशान्तरभूमित- भुजेन केत्यनुपातेन इष्ट्युच्छ्रायादुपरि वंशखण्डम् । ४० । ३० । अथाल्पबुद्धेरेतच्चमत्कारज्ञानदार्ढ्यार्थमुदाहरणं विवक्षुस्तावद्ग्रन्थासंगतत्वपरिहाराय तत्प्रतिजानीते-उदाहरणमिति । उक्तार्थस्य निदर्शनमुच्यत इति शेषः । अथ श्लोकद्वयेन प्रतिज्ञातमाह—पञ्चशका१४५ङ्गुलेति । यष्टिर्वेधशलाका पञ्च- चत्वारिंशदधिकशताङ्गुलदीर्घा । दृष्ट्युच्छ्रायोऽष्टषष्टिमितोऽङ्गुलः । वक्ष्यमाणमूलाग्रभुज-
४७६ गोलाध्याये कोट्योः शुद्धयर्थं यष्टिमानकथनं न तु मूलाग्रवेधयोस्तुल्ययष्ट्यपेक्षार्थमिति ध्येयम् । यस्य वंशस्य मूलवेधे दोः । लम्बनिपातान्तरभूमिः षट्हस्ता । सर्वत्राङ्गुलानां सत्त्वाच्च- तुश्चत्वारिंशदधिकशताङ्गुलो भुज इत्यर्थः । कोटिर्लम्बोच्च्यान्तरं सप्तदशाङ्गुलप्रमाणा । तस्यैव वंशस्याग्रवेधे भुजः षोडशाधिकशताङ्गुलानि कोटिः सप्ताशीत्यङ्गुलानि । एवं भुजादिकज्ञानात्तन्मानं तद्भुजादिसंबन्धिनो वंशस्य प्रमाणं कथय ॥४३॥४४॥ केदारदत्तः—वंशादि वेध प्रकार— यष्टि से इस प्रकार दो बांसों का वेध कर दृष्टि की ऊँचाई से भुज को गुणा कर कोटि से भाग देने से लब्ध फल, अपने और बाँस के मध्य की भूमि का मान होता है । वंशाग्र भूमिमानको कोटि से गुणा कर, भुज से भाग देने से लब्ध फल को दृष्ट्यु- च्छ्रिति में जोड़ देने से बाँस की ऊंचाई का ज्ञान होता है । उदाहरण से भी बताया जा रहा है— यष्टि का मान = १४५, दृष्ट्युच्छ्रिति (दृष्टा की ऊँचाई) = ६८ हाथ, तलवेध बाहु = भुज = १४४ कोटि = १७, अग्र वेध से भुज = ११६ कोटि = ८७ । उपपत्ति—वेधकर्त्ता और बाँस के बीच की भूमि = भुज दृष्ट्युच्छ्राय = कोटि, दृष्टि और वंश के मूल में बद्ध सूत्र = कर्ण । इसी के अनुसार यष्टि वेध से पूर्ववत् अक्ष क्षेत्र साजात्य क्षेत्र बनता है । जहाँ पर लम्बान्तर = भुज, लम्बोच्च्यान्तर = कोटि, और यष्टि = कर्ण । अनुपात से कोटि में भुज तो दृगुच्छ्राय कोटि में फल = आत्मवंशान्तर भूमि । अग्रवेध से भी वंश मूल से ऊपर दृगुच्छ्रायमित अन्तर में चिह्न करने चाहिए । दोनों दृष्टियों के अन्तर रेखा = भूमि चिह्न के ऊपर का बाँस खण्ड = कोटि, दृष्टि और वंशाग्र- बद्ध सूत्र = कर्ण । अनुपात से— वेध कोटि × भूमिमित भुज ────────────────────── = चिह्न से ऊपर तक बाँस खण्ड । वेध भुज में दृष्ट्युच्छ्रिति + वंश खण्ड = बाँस मान उपपन्न होता है । गणित के उदाहरण से यथा— मूलवेध में भुज = १४४, दृष्ट्युच्छ्रिति = ६८ १४४ × ६८ = ९७९२ में मूलवेध कोटि १७ से भाग देने से ५७६ उपलब्ध हो जाता है । अग्रवेध कोटि × १४४ तथा ────────────────── = ४३२ वंश की ऊँचाई । अग्रवेध भुज बाँस की ऊँचाई + दृगुच्छ्रिति = ४३२ + ६८ = ५०० । समग्र बाँस की ऊँचाई का मान उपलब्ध होता है ॥४३॥४४॥
यन्त्राध्यायः ४७७ अथ केवलाग्रवेधेनाऽऽह— अग्रं विद्ध्वोर्ध्वस्थः पुनरुपविष्टश्च तद्विध्येत् ॥४५॥ निजभुजभक्ते कोटी तदन्तरहृतो दृगौच्च्यविश्लेषः । भूमिर्वंशौच्च्यमतः पृथक् पृथक् पूर्ववज्ज्ञेयम् ॥४६॥ अत्र प्रश्नः— ऊर्ध्वस्थस्य गृहादिभिर्व्यवहितस्याप्यग्रमात्रं सखे वंशस्य प्रगुणस्य यस्य सुसमे देशे समालोक्यते । अत्रैव त्वमवस्थितो यदि वदस्यस्यान्तरं चोच्छ्रयं मन्ये यन्त्रविदां वरिष्ठपदवीं यातोऽसि धीयन्त्रवित् ॥४७॥ उदाहरणम्— इष्टयष्ट्योर्ध्वसंस्थेन वंशाग्रं विध्यता भुजः । दृष्टश्चतुष्करोऽथान्ययष्ट्या खाङ्काङ्गुलः सखे । निविष्टेन तथा कोटिरङ्गुलं वेधयोरपि । आत्मवंशान्तरं ब्रूहि वंशो
४७८ गोलाध्याये रुदाहरणप्रदर्शनार्थमात्मवंशात्तरं नोद्दिष्टम् । अन्यथा षट्करा इत्याद्यर्योद्दिष्टस्य व्यर्थतापत्ते रिति भावः । यथा मूलवेधे भुजः १४४ । दृष्टद्युच्छ्रायः ६८ गुणितः ९७९२ मूलवेधकोट्या १७ भक्तः फलमात्मवंशात्तराङ्गुलानि ५७६ । अग्रवेधकोट्या ८७ गुणितानि ५०११२ । अग्रवेधभुजेन ११६ भक्तानि । फलं वंशोच्छ्रायः ४३२ दृष्टद्युच्छ्राय ६८ युतो वंशमान- मङ्गुलात्मकं ५०० । ४६ । ३० ॥४३॥४४॥ ननु व्यवधानान्मूलवेधासंभवेनाऽऽत्मवंशात्तरा(र)ज्ञान(ना)संभवात्कथमग्रमात्रदर्शनेन वंशमानज्ञानं स्यादित्यत आर्योत्तरार्धेनाऽऽशंया चाऽऽह—अग्रं विद्ध्वेति । ऊर्ध्वस्थोऽग्रं विद्ध्वा भुजकोटी एकत्र स्थापयेत् । पुनर्द्वितीयवारमुपविष्टः संस्तदग्रं विध्येत् । चकारात्तत्संबन्धिभुजकोटी अपरत्र स्थापयेदित्यर्थः । ततः स्वस्व भुजेन स्वस्व- कोटी भक्ते कार्ये । फलयोरन्तरेण भक्तो दृगोच्च्यविश्लेषः । ऊर्ध्वस्थोपविष्टसंबन्धिदृगुच्छ्रा- ययोर्वियोगः । फलमात्मवंशात्तरभूमानम् । अतः । भूमानात् । पृथक्पृथक् ऊर्ध्वस्थोपविष्ट- वेधसंबन्धिभुजकोटिभ्याम् । पूर्ववत् । भूमानं कोटिसंगुणमित्यादिना प्रत्येकं वंशोच्छ्यं वंशमानतुल्यं ज्ञेयम् । अत्रोपपत्तिरेकवर्णसमीकरणेन आत्मवंशात्तरभूमानंया १ अस्मादूर्ध्वस्थवेधसिद्धकोटिस्तदा यावत्तावन्मितात्मवंशात्तरभूतुल्यभुजेन केत्यनुपातेनोर्ध्वस्थवेधसिद्धभुजेनोर्ध्वस्थवेधसिद्धकोटेः फलं यावत्तावद्गुणमूर्ध्वस्थदृगुच्छ्रायादुपरि वंशखण्डं याफ १ । एवमुपविष्टवेधसिद्धभुजभक्त- कोटे. फलं यावत्तावद्गुणमुपविष्टदृगुच्छ्रायादुपरि वंशखण्डं याफ १ एते वंशखण्डे स्वस्व- दृगुच्छ्राययुते वंशमानतुल्ये भवतः । वंशस्यैकत्वात् । अतस्तुल्ययोः पक्षयोः शोधनार्थं न्यासः । या० फ १ दृ १ । अत्रोर्ध्वस्थदृगोच्छ्यादुप- विष्टदृगोच्छ्यस्य न्यूनत्वनिर्णयादूर्ध्वं—या० फ १ दृ १ । स्थफलादुपविष्टफलमधिकमे- वान्यथा स्था(सा)म्यासम्भव इति ध्येयम् । एकान्यक्तमित्यादिना तदन्तरहृतो दृगोच्च्य- विश्लेषो भूमानमुपपन्नम् । अस्मादग्रवेधकोटिभुजाभ्यां वंशोच्छ्रायज्ञानं प्रागुक्तमेव । भूमानं कोटिसंगुणं भक्तम् । दोष्णा वंशोच्छ्राय इत्यनेन स्वस्वभुजभक्तकोटी भूमानगुणिते वंशोच्छ्रायौ । तयोरन्तरं वंशोच्छ्रायान्तरम् । तत्र लाघवात्स्वभुजभक्तस्वकोट्योरन्तरमेव भूमानगुणितं कृतं समत्वात् । तथा च भूमानगुणितं स्वभुजभक्तस्वकोट्योरन्तरं वंशोच्छ्रायान्तररूपमितभूमाने सिद्धम् । कथमम्यथा भूमानगुणितं तद्वंशोच्छ्रायान्तरं संगच्छत इति । अतो वंशोच्छ्र्यभेदेऽपि भूमानभेदाभावाद्वंशोच्छ्रयान्तरतुल्यवंशेऽपि भूमानं तदेव । तथा दृष्टद्युच्छ्रायभेदेऽपि भूमाना- भेदाद्दृष्टद्युच्छ्रायान्तरतुल्यदृष्टद्युच्छ्राये भूमानं तदेवेति रूपमितभूमानसंबन्धिवंशोच्छ्रायान्त- रेण स्वभुजभक्तस्वकोट्योरन्तरमितेन स्वरूपं भूमानमात्मवंशान्तरस्थितं लम्यते तदा दृष्ट- द्युच्छ्रायान्तरेण किमित्यनुपातेन तदनन्तरहृतो दृगोच्च्यविश्लेषो भूमिरित्युपपन्नम् । वंशमूलवेधसंबन्धेन भुजकोट्योरज्ञानादग्रवेधसंबद्ध भुजकोटिभ्यां संबन्धाभावेन दृष्टद्यु-
यन्त्राध्यायः ४७९
च्छायाहताद्बाहोः कोट्या लब्धमिति पूर्वोक्तेन भूमाना(न)सिद्धिरिति केचित् । तन्न ।
वंशोच्छायदृष्ट्युच्छ्रायाभ्यां प्रत्येकं सम्बन्धस्यैतत्तुल्यत्वादुक्तरीत्या भूमानसिद्ध्यापत्तेः ।
अन्तरानुपातासाधारणसम्बन्धानुक्तेश्च ।
लक्ष्मीदासास्तु व्यवधानाभावेन समग्रवंशदर्शनेन पूर्वोक्तप्रकारविषयेऽपि वंशाग्रतदा-
सन्नाधःप्रदेशवेधाभ्यां ज्ञातभुजकोटिभ्यां वेधावधिवंशोच्चययोरेकवंशे ज्ञानप्रकारान्तरबोधक-
मिदं पद्यं पाठन्तरभिन्नम् तद्यथा-
अग्रं विद्ध्वोर्ध्वस्थः पुनरपि तदधस्तथा विदध्येत ।
निजभुजभक्ते कोटी तदन्तरहते दृगौच्च्यविश्लेषः ॥
भूमिविश्लेषहृता पृथक्पृथक्पूर्ववज्ज्ञेयमिति ।
पूर्ववद्द्रंशतलमग्रं च विद्ध्वाऽऽत्मवंशान्तरभूमानं भुजकोटी विज्ञाय पुनरूर्ध्वं तदधो वा
दृग्विणिधाय वंशाग्रं विध्येत् । तत्रापि भुजकोटी ज्ञात्वा भुजयोरन्तरेण कोटी गुणनीये ।
स्वस्वभुजाभ्यां भाज्ये । लब्धं दृगौच्च्यविश्लेषः स्यात् । निजवंशान्तरभूद्द्गौच्च्यविश्लेषेण
गुणनीया ततः पृथक् पृथक् पूर्ववज्ज्ञेयम् ।
एतदुक्तं भवति । विश्लेषहता भूर्भुजान्तरेण भक्ता वंशोच्छ्रायः पृथक्पृथक् भवती-
त्यर्थः । यथा-अग्रवेधे भुजः ४ कोटि ६ । ५५ । मूलवेधसिद्धभू-५ जकोटि-४ भ्यां दृष्ट्यु-
च्छ्रायाद्भू १०० मानं १२५ अनेनाग्रवेधकोटि-६ । ५५ । गुणिता ८६४ । ३५ भुजेन ४
भक्ताऽऽप्तं २१६ । ८ । वंशीच्छ्रायः । अथाग्राधोभागे विद्धे भुजः ४ । ३० । कोटिः ६ ।
३७ । एतद्गुणं भूमानं ८२७ । ५ । भुजेनाऽऽ ४ । ३० । प्तं १८३ । ४८ । वंशो-
च्छ्रायः । दृगुच्छ्रायेण १०० युतो वंशामानवे धावध्येकवंशे ३१६ । ९ । २८३ । ४८ ।
अथाग्रतरासन्नाधःप्रदेशवेधसिद्धभुजयो ४ । ४ । ३० । रन्तरेण० । ३० । हते कोटी ।
तत्राऽऽद्या ३ । २८ । अपरा ३ । १९ । स्वभुजाभ्यां ४ । ४ । ३० । क्रमेण भक्ते दृगौ-
च्च्यान्तरे ९० । ५२ । ७ । ४४ । आभ्यां भूमाने १२५ गुणिते १०८ । ८२ । भुजा-
न्तरेण ० । ३० । भक्ते । स्वकीयो वंशोच्छ्रायौ । २२६ । १८४ । दृष्ट्युच्छ्राययुतौ
पूर्ववत् । तेनाऽऽद्यवेधे ३१६ । अन्तरवेधे २८४ वंशदैर्घ्ये वेधावधि ।
अत्रोपपत्तिः-यदेताभ्यां भुजाभ्यामेते लम्बोच्छ्रायान्तररूपे कोटी तदा भुजान्तररूपेण
भुजेन किमिति । फलं दृगौच्च्यविश्लेषात्मिका कोटिः । अथ द्वितीयोऽनुपातः । यदि भुजा-
न्तररूपेण भुजेन दृगौच्च्यविश्लेषः कोटिस्तदा स्ववंशान्तरभुजेन किमिति । फलं वंशोच्छ्रा-
यरूपा कोटिरिति सर्वमा(म)नवि(व)द्यमित्याहुस्तन्न । ग्रन्थकृद्भाष्यविरोधात् ।
किंच । अग्रतदधःप्रदेशवेधसम्बन्धिदृष्ट्युच्छ्राययोरन्तरस्यैकत्वेन निर्णयात्स्वस्वभुज-
कोटिभ्यामानीतयोर्दृष्ट्युच्छ्रायान्तरयोर्द्वैधानुपपत्तिः ।
न च मूलवेधसिद्धदृष्ट्युच्छ्रायेण तत्रयाणां सम्भवान्मूलदृष्ट्युच्छ्रायात्प्रत्येकं तयो-
४८० गोलाध्याये दृष्टद्युच्छ्राययोरन्तरयोर्द्वैधसंभव इति वाच्यम् । वंशोच्चानयने मूलदृष्टद्युच्छ्रायस्य संब- न्धाभावेनासङ्गतत्वादिति दिक् ।।४५।।४६।। ननु बिना मूलदर्शनमग्रदर्शनं न भवत्येवेति पूर्वप्रकारेणैव वंशोच्चज्ञानसंभवादुप- कल्पितप्रकारो विषयाभावादावश्यको नेति मन्दाशङ्काया [निरा]करणाय प्रश्नं शार्दूल- विक्रीडितेनाऽऽह-ऊर्ध्वस्थस्येति । यस्य वंशस्योर्ध्वस्थस्यातिदीर्घस्याग्रमात्रम् । मात्रपदेनाग्रव्यतिरिक्तसंपूर्णवंशनिरासः । हे सखे मित्र । अनेन सुहृद्भावेन पृच्छयते नेर्ष्यया । अन्यथोपेश्या तदुत्तरदानाप्रसङ्ग इति सूचितम् । सुसमे देशे । समानभूप्रदेशान्तरेऽज्ञातमाने समालोक्यते सम्यग्दृश्यते । ननु संपूर्णदर्शने किंवाग्रक्रमत आह—गृहादिभिरिति । गृहं मन्दिरम् । आदिपदाद् वृ
यन्त्राध्यायः ४८१ ययोर्ध्वस्थनिर्दिष्टवेधयोः कल्पितौ दृगुच्छ्रायौ द्विसप्ततिचतुर्विंशत्यङ्गुलमितौ ७२। २४ निजभुज ९६। ९०। भक्ते १। १ कोटी। अनयोः समच्छेदपूर्वकन्तरम् ६। अनेन च्छेदंलवं १६। ४० परिकर्त्त्येत्यादिना दृगोच्छ्रयविशेषो ८६४० ४८। भक्तः। भूमनाङ्गुलानि ६९१२०। एभ्यो वंशमानाङ्गुलानि ७९२। एवं दृष्ट्युच्छ्रायकल्पनाभ्या- मनेकधा ॥४७॥ केदारदत्तः—वंश के अग्रवेध से आत्मवंशान्तर भूमिज्ञान— खड़े होकर यष्टि से वांस का अग्रवेध, पुनः बैठ कर वंश का अग्रवेध करने से कोटियों में अपनी अपनी भुजाओं से भाग देकर उसमें आत्मवंशान्तर से भाग देने से दोनों ऊँचाइयों के अन्तर से भाग देने से लब्ध भूमि ज्ञान से पुनः पूर्ववत् पृथक् पृथक् भुज कोटिज्ञान के अनन्तर पूर्व में प्राप्त आत्मवंशान्तर को कोटि से गुणा कर भुज से भाग देने से दृष्टि उच्छ्रिति + बांस की ऊँचाई प्राप्त हो जाती है। जैसे—ऊर्ध्ववेध में भुज = ९६, कोटि = १, बैठे हुये भुज = ९० कोटि = १, कल्पित दृष्ट्युच्छ्राय = ७२, २४, पूर्व भाँति भूमान = २८८०, और बांसों की ऊँचाई = ३३ हाथ। उपपत्ति—कल्पना से आत्म वशान्तर भूमि मान = या। यदि यष्टि के ऊर्ध्व वेध भुज ९६ में कोटि प्राप्त होतो है तो या भुज में या / ९६ , या / ९० अतः ७२ + या / ९६ = २४ + या / ९० (६९१२ + या) / ९६ = (२१६० + या) / ९० = ६२२०८० + ९० या = २०७३६० + ९६ या ∴ ६ या = ४१४७२० या + ६९१२ / ९६ = या + २१६० / ९० ∴ या = ६९१२० अंगुल ∵ २४ अंगुल = १ हाथ, अतः ६९१२० ÷ २४ = २८८० = भूमान उपपन्न होता है ॥४५॥४६॥४७॥ अथ जलान्तर्वेधमाह— एवं तोयेऽप्यौच्च्यं तत्र दृगौच्च्योदितं भवति । किंवा यष्ट्या कोटी दृष्ट्युच्छ्रायौ जलान्तके वाहू ॥४८॥ अत्र प्रश्नः— दूरस्थस्य न दूरगस्य यदि वाऽदृष्टस्य दृष्टस्य वा वंशस्य प्रतिबिम्बितस्य सलिले दृष्ट्वाऽग्रमात्रं सखे । ३१
४८२ गोलाध्याये अत्रैव त्वमवस्थितो यदि बदस्यस्यान्तरं चोच्छ्रयं त्वां सर्वज्ञमतीन्द्रियज्ञमनुजव्याजेन मन्ये भुवि ॥४९॥ उदाहरणम्— दृष्टा चेत् त्र्यङ्गुला कोटिर्बाहुश्च चतुरङ्गुलः । ऊर्ध्वस्थेनोपविष्टेन बाहुरेकादशाङ्गुलः ॥ कोटिरष्टाङ्गुला तोये वंशाग्रं विध्यता सखे । त्र्येकहस्तौ दृगुच्छ्रायौ वंशौच्च्यं चान्तरं वद ॥ वा० भा०—ऊर्ध्ववेधे कोटिः ३ । भुजः ४ । उपविष्टवेधे कोटिः ८ । भुजः ११ । दृष्ट्युच्छ्रायौ क्रमेण । ७२ । २४ लब्धमात्मवंशान्तरं हस्ताः ८८ । वंशौच्च्यं हस्ताः ६३ । अत्रोर्ध्ववेधेऽन्योपविष्टवेधे वाप्या यष्टिरिति । अत्रोपपत्तिः । अत्र भित्तेः सुसमे पार्श्वे तिर्यग्रेखा दीर्घा कार्या । सा किल जलसमा भूः । तत्रैकस्मिन्नेकान्तप्रदेश ऊर्ध्वरेखा कार्या । स किल वंशः । वंशमूला- दधोगामिनी वंशप्रमाणैवान्या रेखा कार्या तत् किल वंशप्रतिबिम्बम् । अथ भूरेखाया उपर्यन्यप्रान्ते दृगुच्छ्रिताऽन्या रेखा कार्या । दृगुच्छ्रायात् प्रतिबिम्बवंशा- ग्रगामिनी कर्णरेखा कार्या । सा कर्णरेखा भूरेखायां यत्र लग्ना तत्रस्थे जले वंशाग्रं द्रष्टा पश्यति । जलादुभयतो द्वे त्र्यस्रे भवतः । तत्र जलवंशमूलयोरन्तरं बाहुः । प्रतिबिम्बवंशः कोटिः । अधः कर्णखण्डं कर्णः । अन्यदात्मजलान्तरं बाहुः । दृष्ट्युच्छ्रायः कोटिः । ऊर्ध्वकर्णखण्डं कर्णः । एते त्र्यस्रे परस्परानमते । यष्टि- वेधेन ये भुजकोटी ते अप्येतदनुसारे । अत उक्तं एवं तोयेऽपीति । किन्त्वत्र यदौच्च्य- मागच्छति तद्दृगोच्छ्येन हीनं कार्यम् । प्रतिबिम्बितस्याधोमुखत्वादृद्गोच्छ्येन सहाऽऽगच्छति । अतस्तदूनं कृतमिति सर्वमुपपन्नम् ॥४८॥४९॥ किम्वा यष्टेचेत्यस्योदाहरणम्— षडङ्कैरमरैस्तुल्यान्यङ्गुलान्यथवा क्रमात् । आत्मतोयान्तरं दृष्ट्वा वंशौच्च्यं चान्तरं वद ॥ वा० भा०—ऊर्ध्वस्थस्य जलान्तरम् ९६ । उपविष्टस्य जलान्तरम् ३३ । दृष्ट्युच्छ्रायौ ७२ । २४ । लब्धं तदेव भूमानं हस्ताः ८८ । वंशौच्च्यं हस्ताः ६६ । इति धीयन्त्रम् ॥ मरीचिः—अथ जलस्थप्रतिबिम्बाद्वस्तुदैर्ध्यमानज्ञानमुद्गीत्याऽऽह—एवं तोयेऽपीति । तोये जले । अपिशब्दात्प्रतिबिम्बिताग्रात्प्रतिबिम्बितस्य । औच्च्यं वंशोच्छ्रायो नतु वंशमा- नम् । एवमग्रं विद्ध्वोर्ध्वस्थ इत्यादिना ज्ञेयम् ।
Here is the complete line-by-line transcription of the page:
यन्त्राध्यायः ४८३ नन्वत्राऽऽगतो वंशोच्छ्रायो दृष्ट्युच्छ्राययुतो वंशमानमिदं प्रत्यक्षविरुद्धमत आह— तदिति । जलप्रतिबिम्बितागतवंशोच्छ्रायमानं प्रतिबिम्बिताग्रवेधसंबन्धिदृष्ट्युच्छ्रायमाने- नोनम् । तुकाराद्वंशमानं स्यात् । तथा च दृष्ट्युच्छ्राययुतो सहजसिद्धोऽविसंवादः । दृगोच्च्यवर्जितस्यात्र विशेषत्वात्तथा करणे संवाद इति भावः । जलप्रतिबिम्बिताग्राद्वस्तुदैर्घ्यमानं यष्टिनिरपेक्षेण लाघवादाह—किंचेति । जलप्रति- बिम्बिताग्रदर्शनाद्वस्तुदैर्घ्यमानज्ञानार्थं यष्ट्या किं कार्यं यष्टेरप्यावश्यकता नास्तीति भावः । तर्हि तन्मानज्ञानं कथं स्यादत आह—वेति । तन्निरपेक्षप्रकारान्तरेण तज्ज्ञानसंभवा- दिति भावः । ननु यष्टेः साधकक्षेत्रार्थमेव प्रयोजनमिति साधकक्षेत्राभावात्प्रकारान्तरेण कथं तत्सिद्धि
सूत्रस्य"! Wait, look at "उच्यत": Is it "उच्यत" or "उच्यते"? There is no e-matra on 'त'! It is just "उच्यत".
इत्यर्थः । तत्र सूत्रपूर्वार्धोदाहरणप्रश्नं श्लोकद्वयेनाऽऽह—दृष्टा चेत्त्र्यङ्गुलेति । Matches line 29.
प्रश्नेऽल्पबुद्धीनामपि कोपसंभवस्तदपनोदार्थं सखा इति संबोधनम् । अन्यथा तदुत्तरा- Matches line 30.
लाभ इति भावः । जले । वंशाग्रं । प्रतिबिम्बवंशाग्रम् । यष्ट्या विध्यता गणकेनोर्ध्वस्थेन। Wait, after 'वंशाग्रं': is there a danda? Yes, "वंशाग्रं ।" After 'गणकेनोर्ध्वस्थेन': danda without space? "गणकेनोर्ध्वस्थेन।"
कोटिर्लम्बोच्छ्रायान्तररूपा । त्र्यङ्गुला त्र्यङ्गुलामिता । दृष्टा ज्ञाता । भुजो लम्बनिपा- Matches line 32.
तान्तरम् । चतुरङ्गुलः । चकाराज्ज्ञातः उपविष्टेन । प्रतिबिम्बाग्रं यष्ट्या विध्यता Matches line
गणकेन । भुज एकादशाङ्गुलो जातः । अष्टाङ्गुला कोटिर्जाता । उभयत्र क्रमेण । त्र्येक- हस्तौ । द्विसप्तत्यङ्गुलचतुर्विंशत्यङ्गुलमितावित्यर्थः । दृष्ट्युछ्रायौ ज्ञातौ चेत् । एवं सति । वंशोच्चयम् । वंशमानम् । ननु भूमानं कोटिसंगुणमित्याद्यवगतं वंशोच्छ्रायम् । वेधद्वयेन तद्द्वयादेकवचनानुपपत्तेः । पूर्वार्धसंपूर्णोदाहरणसिद्धेश्च । ननु वंशमूलस्वस्थानान्तराज्ञानाद्वंशमानं कथं स्यादत आह—चान्तरमिति । अन्तरम् । तद्रूपम् । चः समुच्चये । कथय । अन्तरमानीय वंशमानमानीयैति भावः । वेधयोर्भिन्ना सिद्धा यष्टिरित्युदाहरणानुपपत्तिर्नेति ध्येयम् । यथा । निज- मुक्तभक्तकोट्यो । ३ । ८ । रन्तरेण १ । दृगौच्च्यान्तरं ४८ भक्तमङ्गुलात्मकं भूमानं २११२ । । ४ । ११ । ४४ । अतः पृथक्पृथक्वंशोच्च्यं १५८४ । १५३६ । स्वस्वदृगौच्च्येन ७२ । २४ । हीनं वंशमानं १५११२ । ५५ । अथानुष्टु भोत्तरार्धोदाहरणप्रश्नमाह—षडङ्कैरमरैति । अथवेत्यनेन किं वा यष्टचेत्युत्तरार्धस्येदमुदाहरणमिति स्पष्टीकृतम् । क्रमात् । त्र्येक- हस्तदृगुच्छ्रायक्रमात् । आत्मतोयान्तरम् । प्रतिबिम्बदर्शनस्थानाभ्यामात्मस्थानस्यान्तरद्वय- मित्यर्थः । षण्णवत्या त्र्यस्त्रिंशता समान्यङ्गुलानि । तदन्तरमेतदङ्गुलमितं ज्ञात्वेत्यर्थः । अन्तिमचरणस्तु व्याख्यात एव । यथा निजभुजभक्तकोट्यो । ७२ । २४ । रन्तरेण । ७२ । दृगौच्च्या- न्तरं ४८ भक्तं भूमान २११२ । ९७६ । ३३ । । ३१६८ । मस्मद्भूज- कोटिभ्यां ९६ । ७२ । ३३ । २४ । पृथक्वंशौच्च्यं १५८४ ।। २४३६ । दृष्ट्युछ्रायोनं वंशमानतुल्यं प्राक्सिद्धमेव १५ । १२ ।। ४९ ।। अथ यन्त्रादि त्र(म)योच्यते इत्युद्देशे आदिपदग्राह्यं स्वयं वहयन्त्रं निरूपयिषुः संगति- प्रदर्शनार्थं तत्प्रतिजानीते—अथ स्वयंवहमिति । पूर्वोद्दिष्टदशयन्त्रनिरूपणानन्तरम् । स्वयं वहति अनति निरपेक्षयेत्येतादृशं यन्त्रं निरूप्यते इत्यर्थः । अत्र जात्यभिप्रायेणैकवचनम् । तेन स्वयं वहयंत्रप्रतिपादनमविरुद्धमिति ध्येयम् ।।४८।।४९॥ केदारदत्तः—जल में अपनो ओर बांसवृक्ष की ऊँचाई को परिछांहो से बांस वेधादि अन्तर भूमिज्ञान— जलस्थ बांस के प्रतिबिम्ब वेध में दृगुच्छ्रिति को वंशोच्छ्रिति में कम करना चाहिए । यष्टि वेध से जल मध्य में कोटियों और दृष्टि की ऊंचाइयों और जल आत्म प्रतिबिम्ब मूल से जल तक भूमि का ज्ञान होना चाहिए । प्रश्न है कि—अदूरगामी दृष्टा के दूर दृष्टि स्थित, दृष्ट या अदृष्ट प्रतिबिम्बित बांस की मात्र अग्रभाग जल में देखा गया है, हे मित्र । तुम यदि ऐसी स्थिति में वहां स्थित हो तो, अपनो जगह से बांस तक की दूरी और बांस की ऊँचाई यदि बता सकते होवो
४८६ गोलाध्याये मैं (भास्कराचार्य) मानव शरीरी तुमको इस भूमण्डल में अतीन्द्रिय ज्ञान सम्पन्न सर्वज्ञ कहूंगा । उदाहरण—जल में प्रतिबिम्बित बांस वेध से कोटि = ३ अंगुल, भुज = ४ अंगुल, ऊपर स्थित बाहु = ११ अंगुल और कोटि = ८ अंगुल, दृगुच्छ्रितियां = ३ हाथ और १ हाथ तो बांस की ऊँचाई और आत्मवंशान्तरित भूमि का मान बताओ । ऊर्ध्व वेध से कोटि = ३, भुज = ४, बैठे हुये वेध से कोटि = ८ भुज = ११, दृष्टा की ऊँचाइया क्रमश: ७२, २४ पूर्ववत् आत्मवंशान्तर भूमि = ७८ हाथ, बांस की ऊँचाई = ६३ ऊर्ध्व वेध और अधोवेध में यष्टिमान भिन्न होते हैं । उपपत्ति—समान भित्ति में एक दीर्घ सरल रेखा ऐसी हो जो जलसम समतल धरातल गामिनी होती हो । उसके एक छोर पर एक लम्बवत् ऊर्ध्व रेखा करनी चाहिए इसी में बांस की ऊँचाई का मान होगा बांस के मूल से नीचे वंश प्रमाण की एक अन्य रेखा करनी चाहिए । यही वंश की प्रतिबिम्ब रेखा होगी । पूर्वकृत भू रेखा के ऊपरी छोर पर दृष्टि उच्छ्रिति तुल्य एक और अन्य रेखा करनी चाहिए । तथा दृष्टि की उच्छ्रिति से प्रतिबिम्बित वंश रेखा तक कर्ण रेखा करनी चाहिए कर्ण और भूरेखा के सम्पात बिन्दु पर जल में वंश के अग्र भाग को दृष्टा देखता है । अतः जल के दोनों तरफ दो त्रिभुज होते हैं, जल और वंशमूल = भुज, प्रतिबिम्बित वंश = कोटि, कर्ण का अधो खण्ड = कर्ण, आत्मजलान्तर = भुज, दृगुच्छ्रिति = कोटि । ऊर्ध्व कर्ण खण्ड = कर्ण । ये त्रिभुज परस्पर सजातीय होते हैं, जो यष्टिवेधित भुज कोटि के तुल्य होते हैं । इसलिये वंश के जलस्थ प्रतिबिम्ब से भी पूर्ववत् अनुपात द्वारा वंश की ऊँचाई आदि का ज्ञान कर ऊँचाई में दृष्टि की ऊँचाई को बांस की ऊँचाई में कम करना युक्तियुक्त होता है क्योंकि प्रतिबिम्बित वंश की स्थिति जल में नीचे होतो है । ॥४८॥४९॥ अथ स्वयंवाहमाह— लघुदारुजसमचक्रे समसुषिराराः समान्तरा नेम्याम् । किंचिद्वक्रा योज्याः सुषिरस्याधः पृथक् तासाम् ॥५०॥ रसपूर्णं तच्चक्रं दूचाधाराक्षस्थितं स्वयं भ्रमति । वा० भा०—ग्रन्थिकीलरहिते लघुदारुमये भ्रमसिद्धे चक्र आराः । किवि- शिष्टाः । समप्रमाणाः समसुषिराः समतौल्याः समान्तरा नेम्यां योज्याः । ताश्च नद्यावर्तवदेकत एव सर्वाः किंचिद्वक्रा योज्याः । ततस्तासामाराणां सुषिरेषु पारदस्तथा क्षेप्यो यथा सुषिरार्धमेव पूर्णं भवति । ततो मुद्रिताराग्रं तच्चक्रमय- स्कारशाणवद्दृग्धारास्थं स्वयं भ्रमति । अत्र युक्तिः । यन्त्रैकभागे रसो ह्यारामूलं प्रविशति । अन्यभागे त्वाराग्रं धावति । तेनाऽऽकृष्टं तत् स्वयं भ्रमतीति ॥५०॥