सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयन्त्राध्यायः ४८१ ययोर्ध्वस्थनिर्दिष्टवेधयोः कल्पितौ दृगुच्छ्रायौ द्विसप्ततिचतुर्विंशत्यङ्गुलमितौ ७२। २४ निजभुज ९६। ९०। भक्ते १। १ कोटी। अनयोः समच्छेदपूर्वकन्तरम् ६। अनेन च्छेदंलवं १६। ४० परिकर्त्त्येत्यादिना दृगोच्छ्रयविशेषो ८६४० ४८। भक्तः। भूमनाङ्गुलानि ६९१२०। एभ्यो वंशमानाङ्गुलानि ७९२। एवं दृष्ट्युच्छ्रायकल्पनाभ्या- मनेकधा ॥४७॥ केदारदत्तः—वंश के अग्रवेध से आत्मवंशान्तर भूमिज्ञान— खड़े होकर यष्टि से वांस का अग्रवेध, पुनः बैठ कर वंश का अग्रवेध करने से कोटियों में अपनी अपनी भुजाओं से भाग देकर उसमें आत्मवंशान्तर से भाग देने से दोनों ऊँचाइयों के अन्तर से भाग देने से लब्ध भूमि ज्ञान से पुनः पूर्ववत् पृथक् पृथक् भुज कोटिज्ञान के अनन्तर पूर्व में प्राप्त आत्मवंशान्तर को कोटि से गुणा कर भुज से भाग देने से दृष्टि उच्छ्रिति + बांस की ऊँचाई प्राप्त हो जाती है। जैसे—ऊर्ध्ववेध में भुज = ९६, कोटि = १, बैठे हुये भुज = ९० कोटि = १, कल्पित दृष्ट्युच्छ्राय = ७२, २४, पूर्व भाँति भूमान = २८८०, और बांसों की ऊँचाई = ३३ हाथ। उपपत्ति—कल्पना से आत्म वशान्तर भूमि मान = या। यदि यष्टि के ऊर्ध्व वेध भुज ९६ में कोटि प्राप्त होतो है तो या भुज में या / ९६ , या / ९० अतः ७२ + या / ९६ = २४ + या / ९० (६९१२ + या) / ९६ = (२१६० + या) / ९० = ६२२०८० + ९० या = २०७३६० + ९६ या ∴ ६ या = ४१४७२० या + ६९१२ / ९६ = या + २१६० / ९० ∴ या = ६९१२० अंगुल ∵ २४ अंगुल = १ हाथ, अतः ६९१२० ÷ २४ = २८८० = भूमान उपपन्न होता है ॥४५॥४६॥४७॥ अथ जलान्तर्वेधमाह— एवं तोयेऽप्यौच्च्यं तत्र दृगौच्च्योदितं भवति । किंवा यष्ट्या कोटी दृष्ट्युच्छ्रायौ जलान्तके वाहू ॥४८॥ अत्र प्रश्नः— दूरस्थस्य न दूरगस्य यदि वाऽदृष्टस्य दृष्टस्य वा वंशस्य प्रतिबिम्बितस्य सलिले दृष्ट्वाऽग्रमात्रं सखे । ३१