भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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यहाँ पर, दोनों स्थितियों में दृष्टि की कल्पित ऊँचाई = ७२, और २४ मानने से पूर्वं गणित प्रक्रिया से भूमान = ८८ और बांस की ऊँचाई = ६३ हाथ होती है । स्वयं भ्रमणशील स्वयंवह यन्त्र बताया जा रहा है— दरार और खूंटे आदि से रहित सुदृढ़ एक लघु हल्के वजन के काष्ठ की भ्रमण- शील परिधि आकार का यह यन्त्र होता है । काष्ठ के तुल्य छिद्रात्मक काठ के पंखे के आकार के तुल्य संख्या के तुल्य कीलक की रचना करते हुये । उक्त काष्ठ कीलक एक दम सरल न होकर कुछ वक्राकार होने चाहिए । ये कीलक समान और परस्पर एक दूसरे के समानान्तरित भी होने चाहिए । उक्त परिधि आकार चक्र के केन्द्र बिन्दुस्थ अर्द्धच्छिद्र की पारे से भर देना चाहिए । इस चक्र को भूमि आधार में स्थापित आधार द्वयप्रोत अग्र कीलक मध्य के शिथिल केन्द्र में स्थापित करना चाहिए । अर्थात् दो लकड़ी के खम्भों के मध्य स्थित यन्त्र जो स्वयं चलायमान हो जाता है । मध्य में आधेच्छिद्र में पारद होने से उक्त अर्थात् स्वयंवह यन्त्र चक्र भ्रमण करने