सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९४ गोलाध्याये निर्मितग्रन्थे प्रेक्षावत्प्रवृत्त्यनुपपत्तिस्तत्तद्रीतिसंरक्षणार्थं यन्त्रस्वयं वहयन्त्रयोः कालज्ञान- रूपैककार्यत्वादेककार्यत्वसंगत्या प्रसङ्गसंगत्या वा संक्षिप्तं तन्निरूपणं संगतमेवेति । भावः ॥५८॥ अथ प्रारब्धयन्त्रनिरूपणं समाप्तमित्यग्रिमग्रन्थसंगतिसूचनार्थं फक्किकयाऽऽह— इति यन्त्राध्याय इति । स्पष्टम् । दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपाश्वंश्रीरङ्गनाथगणकात्मजनिमितेऽस्मिन् । यातः शिरोमणिमरीच्यभिधे समाप्ति यन्त्राधिकार इति बुद्धिविलासगम्यः ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमश्रीरङ्गनाथगणकात्मजविश्वरूपापरनामक- मुनीश्वरविरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचावुत्तराध्याये यन्त्राध्यायः सम्पूर्णः केदारदत्तः—कुहुक (जादू) विद्याओं के अनेक यन्त्र— इस प्रकार स्वयं वह नाम के अनेक यन्त्र हैं जो कुहुक (जादू की) विद्याओं से भले ही उपयोगी हो सकते हैं किन्तु खगोल ज्योतिर्विद्या में इनकी उपयोगिता आवश्यक सी नहीं है। "उक्त प्रकार के अनेक यन्त्रों का उल्लेख मेरे से पूर्ववर्त्ती आचार्यों ने अपने रचित ग्रन्थों में किया है जिनका समयानुसार मैंने भी यहाँ उल्लेख सा कर दिया है" इत्यादि ऐसा कहने से— तात्पर्यतः आचार्य को उक्त स्वयं वह यन्त्रों पर आस्था नहीं है ॥५८॥ इति सिद्धान्त शिरोमणि ग्रंथ के ग्रहगोलाध्याय यन्त्राध्याय :—१२ की श्री पं० हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोपपत्तिक “केदारदत्त :” हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न ।