भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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प्रश्नाध्यायः ५४७ केवलदत्तः—उदाहरण से समझाया जा रहा है— गत अधिमास क्षयदिन अधिशेष और अवशेष के योग ज्ञान, ब्रह्मगुप्त कृत ब्रह्म- सिद्धान्त ग्रह गणित से ६४८४''''के तुल्य ज्ञात विषय से कल्पगत वर्ष ज्ञान जो गणक बताता है उसे मैं ब्रह्मसिद्धान्त वेत्ता मर्मज्ञ कहूँगा ।।१२।। अहर्गण साधन के अवसर पर प्राप्त अधिक मास और क्षयदिन तथा अधिशेष और अवम शेष का जो योगफल ६४८७२६०००१७१ इसे ८६३३७४४९१६८४ से गुणा करने पर ५५९८२४४६८२९२३२६४२२०७७९६४ इसमें चान्द्र दिन = १ = १६१२- ९९८९९९९९९ से भा. देकर लब्धि ३४९२४१९३२३३६ तथा अवमशेष = १०३०० यह चान्द्राहर्गण होता है । इस चान्द्र अहर्गण से पूर्ववत् आवम = १६०१ और अवम शेष = २६७४२६- ०००००० और सावन अहर्गण १०१३९ । तथा गत चान्द्राहर्गण को अधिक मास से गुणा करने तथा युग चान्द्र दिन से भाग देने पर लब्ध गताधिमास = १० । अधिक मास शेष ३८१००००००००० । लब्ध अधिक मास × ३० = १० × ३० = ३०० दिनों से चान्द्राहर्गण १०३००-३०० = १०००० = सौराफहर्गण होता है इससे कल्पगत वर्ष साधन हो जाता है जो २७ वर्ष ९ मास और १० दिन के तुल्य होता है । उपपत्ति—बीज गणित से उपपत्ति— गत सौर दिनों से जितने अधिक मास और जितना अधिक शेष, संख्यात्मक माप एकता से उतने ही चान्द्र मास और अवम शेष भी होता है । अवमदिन और अवमशेष का साधन चान्द्र दिनों से ही साबित होता है जो अहर्गण साधनोपपत्ति से सुस्पष्ट है अतः और भी स्पष्ट होगा कि— अधिक मास + अधिशे + चान्द्रन + चान्द्रशेष''''को युगाधिमास और अवमयोग से गुणा करने पर युग चान्द्र दिनों से भाग देने पर लब्धि प्रमाण = या कल्पना से । या गुणाक ———— = लब्धि = का हर का × गुणक ————— = फल, हर या — फल = शेष = या २६६७५८५००००—का १६०२९९९०००००० = अधिमास + अवम शेष अतः या २६६७५८५००००—का १६०२९९९०००००० इन चारों के योग का पूर्व योग के साथ समान पक्ष समीकरण से अधिक मास + अधिमास + अवम शेष—उद्दिष्ट योग —————————————— चान्द्र दिन—१