सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 666, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ें५६४ गोलाध्याये शुक्रवारेऽहर्गणः ५९९५०२९। अनयोः सप्तगुणदृढकुदिनयोजनाभ्यामनेकधासोमशुक्र- वारेऽहर्गण इति। अत्रोपपत्तिः प्रागुक्ता ॥१७–२१॥ केदारदत्तः—शेष रहित चक्रभगण से अहर्गण साधन— किसी चन्द्रवार को चन्द्रमा के, कला/२ ±१० = विकला। कला विकला का त्रिगुणित अन्तर = अंश होते हैं। अंश/२ = राशियां होती हैं। सबका योग = ३० दृष्ट है। हे विद्वन् यदि आप व्यक्त और अव्यक्त युक्त गणित को जानते तो बताइये शुक्र के दिन में इसी प्रकार की राशियाँ कब होगी ? राश्यादिक की विकलाओं को अपवर्तित कुदिन से गुणा कर भगण विकलाओं से भाग देकर, शेषव्यक्त लब्धि में १ जोड़ देने से भगण शेष हो जाता है। शेष को भाजक में कम करने से विकला शेष हो जाते हैं। यदि विकलाशेष कल्प- कुदिन से अधिक हो तो ऐसे प्रश्न का ग्रह गलत समझना चाहिए। शुद्ध प्रश्न में विकलाशेष से अहर्गण या अपवर्तित भगणों को जिससे गुणा करते हैं उसमें भगणशेष कम करने पर उसे अपवर्तित कुदिन में कम करने से वह अहर्गण हो जाता है। अहर्गण में अपवर्तित कल्प कुदिन तब तक जोड़ते जाइये जब तक अभीष्ट वार की उपलब्धि न हो जाय। उदाहरण से—चन्द्रमा का भगण शेष में १६५०००० में भाग देने पर लब्ध फल यदि अपवर्तित कुदिन में नहीं घटता है तो प्रश्न अशुद्ध समझा जाना चाहिए। भगणशेष को ८८६८३४ से गुणा कर ९४६३१३ से भाग देने पर शेष तुल्य अहर्गण होता है। अहर्गण में दृढ़ भाज्य तक जोड़िये जब तक अभीष्ट वार न प्राप्त हो। उपपत्ति—भगणशेष को चक्र की विकला से गुणित करने और कल्प कुदिन से भाग देने पर विकलात्मक ग्रह होता है। शेष = विकलाशेष होता है। तदुपरि विलोम गणित से भगणशेष साधन करना चाहिए। राश्यादि ग्रह की विकला = १२७०७१९, को दृढ़ कुदिन = ९५६३१३ से गुणाकर चक्रकला = १२९६००० से भाग देने पर लब्धि = ९३७६५८ शेष = ३३१०४० यह शेष त्याग और लब्धि में १ जोड़ देने से होता है। इसमें विकलाशेष जोड़ कर चक्रकला से भाग देने पर होता है। यहाँ विकलाशेष अज्ञात है। तो विकलावशेष ज्ञान प्रकार—पूर्व में व्यक्त अवशेष को चक्रकला में कम करने से भी विकला पूर्ति नहीं होने से इन्हें भी पूर्वसाधित में जोड़ दे और भाग देने से तब लब्धि मान १ होने से लब्धि में एक जोड़ा गया है। क्योंकि विकला- शेष को कुदिन संख्या से कम होना ही चाहिए। इस प्रकार के गणित साधन से फल अधिक होता है जो असत् अशुद्ध होता है इसलिये कि उद्दिष्ट ग्रह अशुद्ध है ॥१७–२१॥