सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 673, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्नाध्यायः ५७१ पवर्ते सिद्धिः । अपवर्ते तु दृढसौरा एकैकादिगुणितास्ते इत्यपवर्तनं क्षेपाभावेऽप्यावश्यकम् । वर्गप्रकृतिज्ञानाविशेषस्य क्षेपरूपस्यानपवर्तेन खिलत्वावगमात्कुट्टकाप्रवृत्त्या कल्पगतज्ञाना- नुत्पत्तेरिति निरपवर्तनकथनमावश्यकम् । नचैवं भवत्पितृव्यचरणैर्बीजटीकायां तदुदाहरणविवरणान्ते स्वोक्तार्थे उद्दिष्टं कुट्टके इत्यादिपक्षसंमतिः कथमुक्ता विषयैक्याभावादिति वाच्यम् । यथा तत्र क्षेपस्य निरपवर्तनमुक्तं तथा अत्र भाज्यहरयोर्निरपवर्तनमिति निरपवर्तनत्वेन संमत्युक्तेरित्थलं दोषगवेषणया ॥२३-२४॥ केदारदत्तः— वर्गप्रकृतिविषयक प्रश्न— अधिक मास शेष वर्ग को १० से गुणा करने पर उसमें १ जोड़ देने से संख्या वर्गात्मक हो जाती है । तथा एक कम करने पर शेष के वर्ग को १० से गुणा करने पर वह संख्या मूलप्रद (अर्थात् वर्गात्मक) हो जातो है तो ऐसी स्थिति में जो कल्पगत वर्ष प्रमाण बताता है उसके चरण कमलों की विद्वान् लोग सदा सेवा (संस्तुति) करते हैं । प्रमाण प्रमेय के आकाश में भ्रमर की तरह भ्रमण करने वालों से उद्दिष्ट निरवयव, अपवर्तन रहित उद्दिष्ट कुट्टक जिन्होंने कहा है उनके गणित में कहीं व्यभिचार है नहीं पर अशुद्धि जन्य आपत्ति तो हैं ही । उपपत्ति—कल्पना किया कि अधिमास शेष = या/आलापोक्ति से या² १० + १ यह कनिष्ठ का मान है । अतः वर्ग प्रकृति गणित से । क = ६ ज्ये = १९ अथवा २८८, ज्ये = ७२१ ह्रस्व = या का मान = अधिमास शेष = ६ । अथवा २८८ । दूसरे उदाहरण में अधिशे = या, ततः उक्तवत् या² १०,-रु १ इसका मूलमान = का । अतः कालक वर्ग समीकरण से शोधनादि द्वारा प्रश्न का मूल या, पर पक्ष का मू = का² १० + १ वर्ग प्रकृति से मूल पूर्व तुल्य, ६ और १९ या २८८ । ७२१ यहाँ भी कनिष्ठ = कालक मान, ज्येष्ठ = यावत् का मान । यही अधिमास शेष का मान होता है १९ या ७२१ इसके बाद कुट्टक से कल्पगत वर्ष का आनयन सही होता है । अधिमास = भाज्य, रविदिन = हर, ६ के तुल्य अधिशेष = ऋण = क्षेप । अधिशेष तुल्य क्षेपक कैसे ? भाज्य भाजक को ३ लाख से अपवर्तन देकर भी इस प्रश्न में अशुद्धि का स्पर्श नहीं होता है । इस प्रकार कुट्टक से कल्पगत वर्ष में करने से—४ = २३००, २३०० - ४ = २२९६ वर्ष ६ मास और ६ तिथि ॥२३॥२४॥ इदानीं देशविशेषमुद्दिश्य पलांशमप्रश्नानाह— प्राच्यामुज्जयिनीपुरात् कुपरिधेस्तुर्यंशके यत् पुरं तस्मात् पश्चिमततोऽपि तावति ततोऽप्यन्यत् पुरारेर्दिशि ।