भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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" or "स्याग्रमात्रं"? Wait, look at: "व्यवहितस्याव्यग्रमात्रं" or "व्यवहितस्याग्रमात्रं"? Let's zoom in on that word in L34: गृ, हा, दि, भि, र्व्य, व, हि, त, स्या, ग्र, मा, त्रं Wait! Is there 'व्य'? गृ (gṛ) हा (hā) दि (di) भि (bhi) र्व्य (rvya) व (va) हि (hi) त (ta) स्या (syā) ग्र (gra) मा (mā) त्रं (traṃ)! It is "गृहादिभिर्व्यवहितस्याग्रमात्रं"! Wait, is there 'व्य' between 'स्या' and 'ग्र'? No! It's just 'स्या' then 'ग्र'! "व्यवहितस्य + अग्रमात्रम् = व्यवहितस्याग्रमात्रं"! Of course! "अग्रमात्रम्" means "only the tip/top"! And look at the next word: "सरवे" or "सरले"? वंशस्य (of the bamboo pole): is bamboo 'सरवे' or 'सरले'? सरलस्य वंशस्य -> "सरले वंशस्य" or "सरवे"? Look at the letter: स, र, वे or ले? In this font, 'ल' has a shape like 'ल' or 'वे'? Look at 'ल' in 'मूलमिति' (L33): 'मू', 'ल