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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ
५५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

नेश्वरभेदप्रसङ्ग इति चेत्, मैवम् ; एवं शब्दार्थकल्पने प्रमाणाभावात् । नहि पापजननप्रतिबन्धिका शक्तिः संसाररूपपरिभ्रमणदशायां पापानुत्पत्त्यर्थं कल्पनीया, तदानीं तदुत्पत्तेरिष्टत्वात् । विद्योदयप्रभृति तु विद्यामाहात्म्यादेवाऽश्लेपः 'तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेपविनाशौ तद्व्यपदेशात्' ( उ० मी० अ० ४ पा० १ सू० १३ ) इति सूत्रेण दर्शितः । तत एव मुक्तावप्यश्लेप उपपद्यत इति व्यर्था शक्तिकल्पना । तस्मादुदाहृतश्रुतिसूत्रानुसारिभिर्मुक्तजीवानां यावत्सर्वमुक्ति वस्तुसच्चैतन्यमात्रत्वाविरोधिवद्धपुरुषाविद्याकृतनिरवग्रहैश्वर्यतदनुगुणगुणकलापविशिष्टनिरतिशयानन्दस्फुरण- समृद्धनिस्सन्धिबन्धपरमेश्वरभावापत्तिरादर्त्तव्येति सिद्धम् ॥ ५ ॥

विद्वद्गुरोर्विहितविश्वजिदध्वरस्य
श्रीसर्वतोमुखमहाव्रतयाजिसूनोः ।


अपहतपाप्मत्वका अर्थ करनेमें कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि * पापोत्पत्तिमें प्रतिबन्धक शक्तिकी संसाररूपके विद्यमानत्वकालमें पापके अनुत्पादके लिए कल्पना नहीं कर सकते हैं, कारण कि उस कालमें पापकी उत्पत्ति इष्ट ही है । और विद्याके उदित होनेपर तो विद्याके प्रभावसे ही पापका सम्बन्ध नहीं रहेगा, यह 'तदधिगम०' इत्यादि सूत्रसे स्पष्ट बतलाया गया है, इसीसे मुक्तिमें भी पापका असम्बन्ध हो सकता है, इसलिए शक्तिकी कल्पना व्यर्थ है । इससे उदाहृत श्रुति और सूत्रोंका अनुसरण करनेवालेको यह माननां चाहिए कि जब तक सब जीवोंकी मुक्ति न हो जाय, तब तक मुक्त जीवोंकी — वस्तुसत् चैतन्यमात्रत्वका विरोध न करनेवाले बद्ध पुरुषकी अविद्यासे सम्पादित निरवग्रह ऐश्वर्य और इस ऐश्वर्यके अनुकूल गुणसमूहसे युक्त निरतिशयानन्दके स्फुरणसे समृद्ध — परमेश्वरभावापत्ति है ॥५॥

अनेक विद्वानोंके गुरु, विश्वजित् आदि अनेक याग करनेवाले, श्रीसर्वतोमुखमहाव्रतयाजी आचार्य दीक्षितसे उत्पन्न, भगवान् शङ्करजीके परमभक्त श्रीरङ्ग-


* तत्त्वसाक्षात्कारके प्राप्त होनेसे विद्याके पूर्वकालमें रहनेवाले पापका विनाश होता है और विद्याके उत्तरकालमें होनेवाले पापसे भी सम्बन्ध नहीं होता है, क्योंकि विद्यासे पूर्वोत्तर पापोंका नाश होता है, श्रुति, स्मृति आदि प्रमाणोंसे सिद्ध है, यह 'तदधिगमे' इत्यादि सूत्रका अर्थ है।

मुक्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५५९


श्रीरङ्गराजमखिनः श्रितचन्द्रमौले-
रस्त्यप्पदीक्षित इति प्रथितस्तनूजः ॥१॥

तन्त्राण्यधीत्य सकलानि सदाऽव्यदात-
व्याख्यानकौशलकलाविशदीकृतानि ।
आम्नायमूलमनुरुध्य च सम्प्रदायम्
सिद्धान्तभेदलवसङ्ग्रहमित्यकार्षीत् ॥२॥

सिद्धान्तरीतिषु मया भ्रमदूषितेन
स्यादन्यथाऽपि लिखितं यदि किञ्चिदस्य
संशोधने सहृदयाः सदया भवन्तु
सत्सम्प्रदायपरिशीलननिर्विशङ्काः ॥३॥

॥ इति पदवाक्यप्रमाणपारावारपारीणसर्वतन्त्रस्वतन्त्रश्रीमदप्पदीक्षितविरचिते
शास्त्रसिद्धान्तलेशसङ्ग्रहे चतुर्थः परिच्छेदः ॥


राजाध्वरीके पुत्र प्रसिद्ध विद्वान् अप्पदीक्षितने व्याख्यानकी कुशलकलाओंसे विस्तारित अनेक शास्त्रोंका अध्ययन कर और सदा वेदानुसारी सम्प्रदायका अनुसरण करके अद्वैतवेदान्तसिद्धान्तके पृथक्-पृथक् स्वरूपोंका संक्षेपसे संग्रह किया है ॥ १–२ ॥

यदि भ्रमवश सिद्धान्तोंकी रीतियोंमें मेरे द्वारा कुछ हेर-फेर हो गया हो, तो परिशुद्धसम्प्रदायके परिशीलनसे सन्देहरहित सहृदय पुरुष उसको शोधने की दया करें ॥ ३ ॥

श्रीसिद्धान्तलेशके वेदान्ताचार्यश्रीपं०मूलशङ्करव्यास-विरचित भाषानुवादमें चतुर्थ परिच्छेदका भाषानुवाद समाप्त॥


ankurnagpal108@gmail.com