भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

( ४० ) सिंहासनबत्तीसी. हवेलीमें राजा जाकर रहा और बैठकर कुछ विचार करने लगा, इतनेमें हाथ बाँधकर लक्ष्मी आन खडी हुई और बोली कि-धन्य राजा विक्रम ! तेरे धर्मको. इतना कहकर लक्ष्मी उस वख्त तो चली गई और राजाने तो वहां आराम किया. जब पहर रात रही तब लक्ष्मी फिर आई और कहने लगी कि, राजा ! अब मैं कहां गिरूं ? राजाने कहा-जो तू पड़ा चाहती हो तो पलंग छों- डके जहां तेरी इच्छा हो तहां गिर इतनेमें खूब तरहसे सोनेका मेह तमाम नगरमें बरसा. सुबह हुबा तब राजा उठा और देख कर कहने लगा-हमारी रैयतपर बहुत सीखथी, लेकिन अब कोई दिन निश्चित हो आरामसे रहेगी इतनेमें दीवान आया. और खबर दी कि, महाराज ! तमाम नगरम कंचनकी वृष्टि हो गई है इसवास्ते अब जो हुक्म आप करोगे वैसा हम करें. तब राजाने कहा कि-तमाम नगरमें ढोल बजवादो कि जिसकी हद्दमें जितनी दौलत है सो उसे ले. और कोई किसीको मना न करे. यह राजाका हुक्म पाकर सब दौलत रय्यतने अपने २ घरमें भरी यह बात कहकर चंद्रकला पुतली बोली कि- राजा भोज ! सुन राजाविक्रमके गुण. वह ऐसा राजा था और प्रजाका हितकारी, इससे तू किस तरह उसके सिंहासनपर बैठता हे ? तेरी क्या जान है ? यह पुतलीकी बात सुनकर राजा भोज अज्ञान होगया. और वररुचि पुरोहितभी शरमिंदा हुआ.

पाँचवी पुतली ५. ( ४१ )

पाँचवी पुतली ५. ( ४१ ) वह साअत भी गुजरगई. दूसरे दिन राजा फिर सिंहासनपर बैठने चला. और मनमें चाहा कि, पांव सिंहासनपर धरै, तब लीलावती नामक— पाँचवीं पुतली- बोली-सुन राजा विक्रमके गुण, एक दिन दो पुरुष आप- समें झगडने लगे, एकने कहा-कर्म बड़ा और दूसरेंने कहा बल बड़ा. किस्मतका तरफदार बोला नशीब बड़ा है कि, अदनाको आला कर देता है और जोरका जानिबदार कहने लगा-जोर बड़ा है जोरावर होवे तो तमाम जहानको ज़ेर कर दे. इस तरह दोनों झगडते २ राजा इंद्रके पास गये और हाथ जोडकर कहने लगे-स्वामी ! आप हमारा न्याय करो जो दोनोंमें सच हो उसे फरमाइये. और झगडा निबेडिये. तब राजा इंद्र बोला--इसका न्याय हमसे न होगा. इस इन्साफको वह करेगा, जिसने योग किया होगा. इससे बेहतर यह है कि, तुम मर्त्यलोकमें राजा विक्रमादित्यके पास जाओ, इस न्यायको वह चुकावेगा उन्होंने राजा इंद्रकी आज्ञा पाय राजा विक्रमादि- त्यके पास जाकर अपना अरज किया और कहा कि-हम तीनों भुवनमें फिर आये पर किसीने हमारा न्याय नहीं चुकाया इसका धर्म अधर्म विचारके आप हमारा न्याय करो. यह बात सुन जाने कहा कि, आज तुम अपने अपने घरको जाओ. और छः

( ४२ ) सिंहासनबत्तीसी.

महीनेके बाद हमारे पास आओ. तब हम तुमको इसका जवाब देंगे. यह सुनकर वे दोनों अपने घर गये राजा अपने मनमें चिंता कर बस्तर पहन काछा चढा खांडा फरी ले बिदेश चला और अपने दिलमें यह आहद किया कि, जबतलक इसका भेद न पायेंगे, तबतलक देशमें फिर न आयेंगे तब फिरते फिरते समु- द्रके किनारे जा पहुँचा. तब वहां एक नगर उसने बहुत बड़ा निपट सुहावना खूब आबाद पाया. और उसमें तरह तरहकी हवे- लियां जिनमें करोड़ों रुपये लगे थे और उनसे सिवाय जवा हिरके कुछ नजर न आताथा. वह देखकर राजा कहने लगा कि, जिसका यह नगर है, वह राजा कैसा होगा ? शहरमें फि- रते फिरते शाम होगई और शहर अखीर न हुआ. इतनेमें क्या देखता है कि, एक दूकानमें महाजन शिर निहुड़ाये हुए बैठा है. तब राजा उसीके सामने जा खडा हुआ. तब सेठने राजासे कहा तू किस देशसे आया है? और तेरा मन मलीन क्यों हो गया है ? किसे ढूंढता है ? और क्या तेरा काम है ? यह सब अपना अर्थ मुझसे कह ? किसका बेटा है तू ? और क्या तेरा नाम है ? तब वह बोला-सेठजी ! मेरा नाम विक्रम है. मैं आज तुम्हारे पास आयाहूं मेरे दिलका मकसद यह है कि, मैं राजासे मुलाकात करूं सो आज मुलाकात न हुई कल मैं राजासे मि लूंगा और उनकी सेवा करूंगा. जो वो मुझे नौकर रक्खेंगे और

पांचवी पुतली ५. ( ४३ )

पांचवी पुतली ५. ( ४३ )

मेरा महीना कर देंगे तो मैं रहूंगा. यह बात सुनकर वह महा- जन बोला-तुम क्या रोज लोगे ? तब राजा कहने लगा. जो कोई लाख रुपये रोज देगा तो हम उसके यहां नौकर रहेंगे. तब वह बोला-भाई ! तुम क्या काम करतेहो ? जो तुम्हें लाख रुपये रोजको कोई देवे वह काम मुझे बताओ ? तब उसने कहा-जिस राजाके पास मैं रहताहू उसकी गाड़ी मुश्किलमें काम आताहूं. सेठ हँसकर बोला, लाख रुपये रोज हमसे लो और कठिनतामें हमारे सहाय हो सुबह हुए नौकर रक्खा और दूसरे दिन लाख रुपये दिये. उसने उनमेंसे आधे रुपये भगवानके नाम संकल्प कर ब्राह्मणोंको दिये, आधेके आधे कंगालोंको दिये. और जो बाकी रहे उनका खाना पकवाकर भूखोंको खिला दिया. रातहुए पर फिर जो एक फकीरने सवाल किया उसेभी खङ्ग रेहन रखकर और भोजन पेटभर करवाया और आप चने चबाकर गुजरान की कितनेएक दिन उस साहूकारके पास रहकर रुपये हररोज योंही खर्च करते रहे. गरज किस्म- तने तो यारी की तब जोर बोला-अब मेरी बारी है, कि, एकाएक सेठके दिलको कुछ उचाटी हुई और एक जहाज तैयार कर किसी देशमें जानेका उसने इरादा किया और विक्रमसे कहा-मैं किसी देश जाताहूं. वह बोला-स्वामी मैंने यह बचन दियाथा कि, गाढ़ी भीड़में तुम्हारे काम आऊंगा. अब मैं तुम्हारे

( ४४ ) सिंहासनबत्तीसी.

साथ हूं; क्योंकि तुमने प्रतिपाल किया है. तब उसेभी सेठने जहाजपर चढालिया. और रवाना हुआ कितनेक दिनोंके बाद जहाज मॅझधारमें तुफानसे तबाह होने लगा. तब वहां लंगर डालकर उसी जगह चंदरोज रहा. उससे आगे टापू था सिंहावती नाम राजकन्या रहतीथी. हजार कन्या उसके साथ थीं इसमें जब वह तुफान होगया तब सेठने कहा कि, अब लंगर उठाओ और चलो. लंगर जलके बीच कहीं अटक रहाथा. मुश्किलसे उठ न सकताथा. जोर कर रहेथे, निदान निराश होकर सब परमेश्वरका स्मरण करने लगे और कहने लगे । कि-इस मझधारसे पार करनेवाला तेरे सिवाय कोई नहीं. जहां जहां जिस जिसके तईं मुश्किल पडी है, तहां तहां सहाय हुआ है दीनदयालु तेरा नाम है, इसवास्ते तुझको हम शरण है और हमपरभी दया करो इतनेमें बनियां घबरा कर विक्रमसे यह कहने लगा. अब अथाहमें पडे हुए हैं, किनारा हमें नजर नहीं आता, और एक बात तेरेही इस वखत याद आई है जब तू हमारे पास नौकर रहाथा तब तूने इकरार किया था कि, मुश्किल काम मैं आशान करूंगा. तो इससे और क्या कठिन होगा ? कालके मुँहमें अब पड गये हैं. यह सेठजीकी बात सुनकर विक्रम उठा और फरी खाडा हाथमें ले रस्ता पकड जहाजके नीचे उतर गया. जाकर बहुतसी हिकमत की पर काई हिकमत

[Header] पाँचवीं पुतली ५. ( ४५ )

[Header] पाँचवीं पुतली ५. ( ४५ )

न चली और कहने लगा कि, सेठजी ! अब पालें इसकी चढ़ावो, लोगोंने पालें चढ़ाई और उसने कूदकर लंगर काटदिया. पानी- की तेजीसे और हवाकी तुंदीसे जहाज चल निकला. और कोई रस्सा उसके हाथ न लगा उसी जगह रहगया. जो कुछ विधा- ताने कर्ममें लिखा है उसको कोई मिटा नहीं सकता. अलकिस- वह राजा वहांसे बहताहुआ चला. और जाते जाते उसे एक नगर नजर आया. वह वहां जानेलगा. उस नगरका जो दर- वाजा था उसपर ज्योंही निगाह की त्योंही देखा कि, चौखटपर लिखा हुआहै कि सिंहावतीकी राजा विक्रमादित्यसे शादी होगी. यह देख राजाको अचरज हुआ कि, यह किस पंडितने लिखा है ? जब उस दरवाजेके अंदर गया तो वहां जाकर एक महल देखा और वहां रांडियां हैं. मर्द कोई नहीं है. और एक अच्छे पलँगपर सिंहावती सोती है. और चौकीकी सहेलियां बैठी हैं यहभी जाकर पलँगपर बैठगया. और तुर्त उसको जगा दिया वह उठकर बैठगया तब राजाने हाथ पकड़लिया और दोनों सिंहा- सनपर जा बैठे. सब सखियां हाजिर हुईं और इस भेदसे वाकिफ थीं कि राजा विक्रमादित्य यहां आवेगा और इससे उसकी शादी होगी. राजाको जो देखा तो फूलोंकी माला ले आईं और गंधर्बब्याह किया. राजा जैसा दुःख पाकर पहुँचाथा वैसा हँसा. इसवख्त उसने सुखोपभोग किया. अलगरज वे दोनों आप-

यह बातें कह लीलावती पुतलीने फिर कहा कि-राजा भोज !

( ४६ ) सिंहासनबत्तीसी.

समें रहने लगे. और नौजवानीकी ऐश करने. हर एक तरहका लुत्फ उठाने लगे और सखियांभी खिदमतमें हाजिर थीं. और मानिंद चकोरके चांदसा राजाका मूँह देखतीथीं चंदमुद्दत राजाको इसी तरह गुंजरी. अपने राजकी सुध कुछ न रही. यह बातें कह लीलावती पुतलीने फिर कहा कि-राजा भोज ! जैसा राजाने बल किया वैसाही विधाताने उसको सुख दिया. किस्मतने यह तमाशा दिखाया. फिर कहने लगी कि, उन सखि- योंमेंसे एक सखीसे राजा विक्रमादित्यकी बहुतसी प्रीति हुई और वह राजाकी दया विचार वहाका भेद कहनेलगी. ऐ राजा ! तुम यहां आन फंसेहो जीते यहांसे कभी न निकलोगे. तुम्हारा नाम सुनकर और तुम्हारे राजका ध्यान करके मुझको रहम आता है, क्योंकि तुम्हारे सरीखे धर्मात्मा दयावंत, दाता, परोपकारी होकर यहां रहना इसमें तुम्हारा भला नहीं है. उधर लाखों आदमी तुझबिना दुःख पाते होंगे. उस सखीकी बात सुनकर राजाको ज्ञान हुआ और अपने राजका ध्यान आया. तब सखीसे पूछा- यहांसे जानेका भेद मुझे बताओ तब वह बोली-एक घोडी इस राजकन्याकी घुडसालमें है, सो उदयसे अस्ततलक जा सक- तीहै. यह बात सुनकर दूसरे दिन राजा रानीको अपने साथ लेकर टहलता हुआ अश्वशालामें जा निकला. घोडोंको देख कर तारीफ करने लगा. रानी बोली-जो तुझे शौक होय तो

पांचवी पुतली ( ४७ )

पांचवी पुतली ( ४७ ) इस घोडोंमेंसे किसी घोडेपर चढाकरो. भेद तो इसे वहांका मालूमही था. दूसरे दिन घोडा उसने वहांसे मँगवाया. और उसपर सवार हो बर्ता फेरने लगा. वह राजाका अहवाल देख रानीभी खुश होती थी. और राजाभी खुश होताथ.. इसी तरह कईएक दिन आर २ घोडोंपर सवार होतारहा. एक दिन उस घोडीको मँगाया और रानीके हुक्मसे उस घोडीपरभी सवार होगया. रानी तो गफलतमें रही, कि इसने कोडा किया. घोडी- मानिंद हवाके राजाको ले उडी और सखियाँ पछता रहगईं. इतनेमें राजा अवानती नगरीको आन पहुँचा. वहां नदीके किनारे एक सिद्ध बैठा देखा, तब राजा उतर दंडवत कर उसके पास जाकर बैठा. सिद्धका जब ध्यान खुला तब उसने इसे देखा, देखकर खुश हुआ और एक फूलकी माला इसे दी और कहा कि-राजा ! विजयमाला मैने तुझे दी है. इसका गुण यह है कि, जहां जायगा वहां फतह पावेगा. और यह माला पहिनेपर तू सबको देखेगा पर तुझे कोई न देखेगा. फिर एक छडी राजाको दी और उसका ब्यौराभी समझाकर कहा कि, इस लकडीका यह ख्याल है कि पहले पहर रातको इसके पास सोनेका जडाऊ गहना जो मांगोगे तो यह देगी, और दूसरे पहर रातको एक खूबसूरत नारी ऐसी देगी कि जिसे देख राजा तुम आशिक होजायगा और तीसरे पहर रातको जो इसे

राज ! आपके द्वारपर हमने बहुत दिन सेवा की पर हमारा भाग्यही

( ४८ ) सिंहासनबत्तीसी. हाथमें लोगे तो तुम सबको देखोगे और तुम्हें कोई न देखेगा. चौथे पहर रातको मानिंद कालके यह होजायगी इसके डरसे कोई दुस्मन तुम्हारे पास आ न सकेगा. यह बात सुनकर योगीने राजाको रुखसत किया. राजा जब उज्जैन नगरीके पास जाकर पहुँचा तब उधरसे एक ब्राह्मण और एक भाटको आते देखा और जब नजदीक जाकर पहुँचे तो उन्होंने आशीर्वाद देकर कहा महा- राज ! आपके द्वारपर हमने बहुत दिन सेवा की पर हमारा भाग्यही ऐसा था कि कुछ इसका फल न मिला. तब राजाने सुनतेही ब्राह्मणको छड़ी दी और भाटको माला दी. और उसका सब भेद कह दिया. तब आशीर्वाद देकर वे दोनों कहने लगे, महा- राज ! इस समयमें तुम राजा कर्ण हो. तुम्हारे बराबर दानी आज पृथ्वीमें दूसरा और नहीं. यह कहा और दोनों बिदा होकर गये. राजाभी अपने स्थानको गया. तब दीवान प्रधान सब आनकर हाजिर हुए. जहरकी तमाम रंयत खुश हुई और वे दोनों झगड़लूनी यह खबर सुन तूर्त आकर राजाके सामने खड़े रहे और कहा—महाराज ! आपने जो छ महीनेका करार कियाथा सो बीत गया अब हमारा न्याय करदीजिये. यह सुन कर राजा बोला कि-बिना बल कर्म कुछ कामका नहीं और बिना कर्म बल काम नहीं आता, इससे वे दोनों बराबर हैं इसको सुन संतोषकर बाद दोनों अपने अपण घरको गये. ऐ

छठी पुतली ६. ( ४९

छठी पुतली ६. ( ४९ राजा भोज ! यह अहवाल मैंने तुझसे इस लिये कहा है कि, तू समझकरके यह खयाल अपने जीसे उठावेगा. इसवास्ते कि, जो ये लियाक़त रक्खे वह सिंहासनपर बैठे. वहभी जोग राजाका बीत- गया. फिर उसके दूसरे दिन भोर होतेही सिंहासनपर बैठनेको तैयार हुवा कि, इतनेमें कामकंदला— छठी पुतली— हँसी और कहने लगी, कि-जिस आसनपर राजा विक्रमने पाँव धरा है तू उसपर बैठनेके लायक कहाँ है? ऐ पापी ! तू अपने होशको गुम न कर और पांव खाली रक्खे; क्योंकि तुझे देख मेरा मन मलीन होजाताहै. इस सिंहासनपर वही बैठे जो विक्रमसा राजा हो. तब राजा बोला-तू अपने मुँहसे कह कि, विक्रम राजाने क्या क्या कर्म किये है ? वह बोली-तू सूचित होकर बैठ. मैं नृपतिकी कथा कह- तीहूं. एकदिन नृपती अपनी सभामें बैठाथा. वहां एक ब्राह्मणने आकर एक अचरजकी बात कही कि, उत्तर दिशामें एक बड़ा बन है और उस वनमें एक पर्वत और उसके आगे एक तालाव है, और उस तालाबमें एक खंभ स्फटिकका है. जब सूर्य निक- लताहै तब उस सरोवरमेंसे वह खंभभी निकलता है और ज्यों ४

( ५० ) सिंहासनबत्तीसी. ज्यों सूरज चढताहै त्यो त्यों खम्भभी बढताहै. जब ठीक दो पहर होतीहै तब वह खंभ सूर्यके रथके बराबर जाकर पहुँचता है. तब उस जगह रथभी खडा रहता है. वहां सूर्य जब कुछ भोजन कर लेतेहैं तब रथ फेर आगे ले चलतेहैं. और खंभभी घटता जाताहै. निदान सामके वख्त पानीमें लोप हो जाता है. इसको देवता या देव कोई नहीं जानता. यह बात ब्राह्मणके मुँहसे सुनकर राजाने अपने मनमें रक्खी, जाहीर न की और उसके तंई कई रुपये दे बिदा किया और अगिया कोयला बेता- लोंको याद किया वे दोनों वीर वहा आकर हाजिर हुए. और उन्होने कहा कि, हमें जो इस वख्त आपने याद किया है सो आज्ञा कीजिये. कहिये स्वर्गको जावें ? कहिये पातालका ? या कहिये समुद्रपार ? इन तीनों लोकोंमें जहां आपकी मर्जी हो तहां लेचलें. तब हँसकर राजाने कहा-एक कौतुक देखने हम जाया चाहते हैं सो वह उत्तरखंडमें है तहा तुम लेचलो. यह सुनकर वीर कांधेपर चढा, राजाको लेउडे और उस जगह तुर्त जा पहुँचे. तब राजाने वह तालाब देखा कि, चारों घाट उसके पक्के हैं. हंस बगुले उसमें फिरतेहैं. और मुरगावियां चकोर पनडुब्बियां कलोल करतीहैं. कमलके फूलोपर भौरे गूँज रहे हैं. मोर बोल रहे हैं. कोयल कूक रही है, और तरह तरहके पछी हुलराने हैं. फूलोंकी सुगंधोंके साथ पौन चली आती है. और मेवेदार दर- ख्तकी डालियां तो लचके खाती हैं. राजा यह सामा देखकर मनमें

छठी पुतली ६. ( ५१ )

छठी पुतली ६. ( ५१ )

बहुतही खुश हुआ, रातभर वहीं रहा. जब सुबह हुई तब सूर्य निकला जो कुछ अहवाल ब्राह्मणने कहाथा वह सब वहा देखकर वीरोंसे कहा-एक बात मेरे जीमें आती है. कि मेरे तईं ले जाकर इस खंभपर बिठलादो. और भगवानका ध्यानकर अपने स्थानको जाओ. तब वीरोंने उसे खंभ पर ले जाकर बिठा दिया और वे अपने मकानको गये. ज्यों ज्यों वह बढ़ने लगा त्यों त्यों राजा अपने दिलमें खौप करने लगा जितना सूर्यके नजदीक पहुँचताथा उतनाही गर्मीसे जला जाताथा। निदान सूर्यके निकट पहुंच जलकर अंगार होगया. जब खंभ बराबर रथके पहुंचा और रथवान्ने एक मुर्दा जला हुवा देखा तब अपने रथके घोडोंकी बाग खेंची. सूर्यने बैंककर देखा कि, खंभपर जला हुआ एक आदमी लग रहा. है. सूर्य त्राहि त्राहि कर बोले कि-यह साहस आदमीका नहीं. यह कोई योगी है या देवता या कोई गंधर्व. इस मुर्देके होते मैं इस जगह किसतरह भोजन करूंगा ? यह कहकर सूर्यने अमृत ले, इसपर छिडकाया तब राजा राम रामकर पुकार उठा और देखकर सूर्यको दंड- वत् कर हाथ जोड़ कहने लगा कि, धन्य, है भाग्य मेरा और मेरे कुलका जो आपके दर्शन पाये और मैंने इस जन्ममें यज्ञ दान किये थे इसीके सबबने तुम्हारे चरण देखे जिन्दगीका जो फल था सो मुझे मिला. इच्छा संसारमें सबकी है, लेकिन जिस

राजा था उसका मैं बेटा हूं. मेरा नाम विक्रम है. आपकी कथा मैंने

( ५२ ) सिंहासनबत्तीसी. पर तुम्हारी मिहरबानी हो उसीको दर्शन मिलताहै. यह सुनकर सूर्य बोले कि-तू कौन है ? तेरा क्या नाम है ? तुझे देख देख के मेरे जीमे तरस आतीहै. अपना नाम तू जल्दीसे कह तब राजा बोला कि-स्वामी ! नगर अंबावतीमें गंधर्वसेन नाम जो राजा था उसका मैं बेटा हूं. मेरा नाम विक्रम है. आपकी कथा मैंने एक ब्राह्मणके मुंहसे सुनीथी. तब मुझे आपके दर्शनकी इच्छा हुई और आपकी तवज्जोहसे आपके चरण देखे. अब मेरे ताईं आज्ञा दीजिये तो मै विदा हूं. यह सुन सूर्यने हँसकर अपना कुंडल उतारकर राजाको दिया और कहा अब तूं निडर राज कर. फिर सूर्यका रथ आगे बड़ा और खंभभी घटने लगा. जब राजा अकेला रहगया तब बीरोंको अपने पास बुलाया वे आकर हाजिर हुये. उनके कांधेपर सवार होके अपने मकानको आया. जब शहरमें दाखिल होने लगा तब सामनेसे एक गुंसाई आया, और राजासे अपने योगकी मतिसे कहा-महाराज ! जो आप सूर्यके पाससे कुंडल लायेहो सो मुझे दान दीजिये, और यश धर्म, बड़ाई लीजिये. राजा बोला-ऐ मतिहीन ! ऐसा योग तूने कब कमाया ? जो तू कुंडल मांगता है. वह संन्यासी कहने लगा कि-महाराज ! मैंने योग तो कुछ नहीं साधा. पर सुनाथा, कि, राजा विक्रम बडा दानी है इससे मैंने आपको जांचा. राजाने हँसकर कुंडल उतार उसके हाथ दिया. वह खुश होता हुआ अपने घरमें गया. कामकंदला यह बात सुनाकर कहने लगी-

सातवीं पुतली ७. ( ५३ )

सातवीं पुतली ७. ( ५३ ) राजा ! तुझमें इतनी शक्ती हो तो तूभी इस सिंहासनपर बैठ. यह बात सुन राजा मनमलीन तो महलमें गया. दूसरे दिन राजा मनमें गुस्सा खाताहुआ फिर सिंहासनपर बैठनेको चला और वररुचि पुरोहितसे कहा कि-इस बेर में पुतलीके रोकनेसे न रुकूँगा आज सिंहासनपर मै जरूर बढूंगा. जब राजाने अपना पांव उठाकर सिंहासनपर बैठनेको चाहा कि, पांव रक्खूं तब कामोदी नाम— ━━━━━━━━━━━━━━━━ सातवीं पुतली- ❧❧❧ कहने लगी- और पांव तले आन गिरी, तब राजाने यह देख दुखित होके पांव खेंचलिया. और उस पुतलीसे कहा-तू किस कारण पांवतले आन गिरी ? तब इसने कथा शुरू की कि, हम जो हैं अबला सो रातयुगकी हैं. राजा ! तेरा अवतार कलियुगमें हुआ. हमैं पहले एक मर्दको छोड दूसरेका मुँह नजरसे नहीं देखा. हम पहले अपना माजरा कहती हैं कि, विश्वकर्माने तो हमें जन्म दिया और बाहुबल राजाके पास आकर रहीं उसने राजा वीर वि- क्रमादित्यको हमें दिया, वह अपने घर ले आया. जब हम वहांसे बि- छुड़ीं तबसे कभी सुख नहीं पाया. जो उस राजाके बराबर होवै सोही इस

बयान कर. तब पुतली बोली-सुन राजा ! विक्रमका अहवाल.

( ५४ ) सिंहासनबत्तीसी.

सिंहासनपर बैठे राजा बोला-विक्रममें वस्फ क्या थे ? तू वे मुझसे बयान कर. तब पुतली बोली-सुन राजा ! विक्रमका अहवाल. एक दिन राजा वीर विक्रमादित्य अपने घरमें दोपहर रातको सोता था और-तमाम शहर नींदमे यहांतरु गाफिल था कि, जो किसी आदमीकी आवाज न आतीथी. इतनेमे उत्तर दिशाकी तरफ नदीके पार एक स्त्री ढाढे मारके रो उठी. उसका आवाज राजाके कान पडगया. तब राजा अपने मनमें चिन्ता करने लगा कि, हमारे नगरमें कोई दुखी आया है कि, वह अपने दुःखमे कूक मार मार रो रहा है. यह बात दिलमें बिचार ढाल तलवार हाथमें ले उधरको चला. और नदीके किनारेपर पहुँचकर वस्त्र छोड लंगोट मार पैरकर पार हुआ और थोडा आगे बढ़कर देखा तो एक अति सुंदरी जवान नारी खड़ी कूकमार रो रही है. उसके पास जाकर राजाने पूंछा कि, पुरुषका तुझे वियोग है ? या पुत्रका शाक है ? सो कह ! या तुझे सौनका साल है ? इनने दुःखोंमें किस दुखरो तू रोतीहै ? जो कुछ तुझे व्यापा है सो मुझे कह ? तब वह कहने लगी-सुन राजा ! हमारा बालम चोरी करताथा इतनेमें शहरके कोतवालने उसे पकड़कर शूली दिया है. और मैं उसकी मुहब्बतसे कुछ खाना खिलानेको लाईहूं और चाहती हूं उसे भोजन करवाऊं. पर शूली ऊंची है और मेरा हाथ उसके मुंह तलक नहीं पहुंचता. इस दुःखसे रोतीहूं और बहुत यत्न करतीहूं पर पहुंचने नहीं पाती. अब नरपतिने कहा यह तो थो-

[शीर्षक] सातवी पुतली ७. (५५)

[शीर्षक] सातवी पुतली ७. (५५)

डीसी बात है इसके वास्ते तू क्या रोतीहै ? उससे जवाब दिय कि, मुझे यह थोडी बहुतही है. तब राजा बोला-मेरे कांधेपर चढ उसे खिलादे. तब वह कंकालिन राजाके कांधेपर चढी, उस शूलीपर चढ जो टेंगाथा उसे खवाने लगी. तब रक्त राजाके बदनपर गिरन लगा. राजाने मनमें सोचा कि, यह कोई और है। यह मनुष्य नहीं इसने मुझे धोखा दिया. तब अपने जीमें राजाने सोचकर पूंछा कि, कह सुंदरी ! तेरा पिया भोजन करता है कि नहीं ? तब कंकालिन बोली-रुचिसे खा चुका, अब इसका पेट भरगया. इसवास्ते मुझे कांधसे उतार. जब हेठ उतरी तब राजाने कहा उसने चाहसे खाया ? तब कंकालिन हंस- कर बोली-तू मांग जो मुझे चाहिये होय ? मैं तुझसे बहुत खुश हुई. मैं कंकालिन हूं अपने जीमें मुझसे मत डर. तब वह बोला- मैं तुझसे क्या डरूंगा और क्या मागूंगा ? तैंने तो मईको मेरे कांधपर चढ खवाया सो तू मुझे क्या देगी ? वह फिर बोली कि-राजा ! तू इसके ख्यालमें मत पड़ कि, मैंने क्या किया और क्या न किया ? जो तुझे इच्छा होय सो मांगले. राजाने हंसकर कहा कि-अन्नपूर्णा मुझे दो और जगत्में यश लो. वह बोली-अन्नपूर्णा मेरी छोटी बहन है. तू मेरे साथ चल मैं तुझे दूंगी. इस तरह आपसमें दोनो वहांसे बचन कर चले. आगे २ कंकालिन पीछे पीछे राजा नदीके किनारे जा पहुंचे वहां एक मंदिर था, उसके द्वारे कंकालिनने ताली मारी और अन्नपू-

र्गाने प्रकट होके उससे कहा कि-यह भूपाल कौन है? वह बोली कि-यह राजा विक्रम है इसने मेरी सेवा की है. और मैंने इससे वचन हारा है अगर मेरी मोहब्बत तेरे दिलमें हो तो अन्नपूर्णा इसे दे. तब हंसकर उसने राजाको एक थैली दी. और कहा कि-इसमेंसे जितनी खानेकी चीज तुम मागोगे उतनी पाओगे. तब राजाने हाथ फैला लेली. और वहांसे खग हो नदीके किनारे आन स्नान ध्यान कर निश्चिन्त हुआ कि इतनेमें एक ब्राह्मण वहां आन पहुंचा. उसको राजाने पास बुलाया और कहा कि-कुछ भोजन करोगे? उसने कहा-मुझे भूख लगी है, जो आप देओगे तो मैं खाऊंगा! राजा बोला-क्या खाओगे? किस चीजपर तुम्हारी रूरत है? तब ब्राह्मण बोला-इस वखत मिले तो पकवान खाऊंगा. राजा अपने मनमें सोचने लगा:- जो इसदम पकवान न पहुँचेगा तो मैं ब्राह्मणसे झूठा हूगा. इतनी बात मनमें बिचार थैलीमें हाथ डालकर जो निकाला तो देखा कि पकवानही निकला. ब्राह्मणने पेट भरकर खाया और बोला-महाराज! भोजन तो मैं किया, अब इसकी दक्षि- णाभी दीजिये. तब राजाने कहा-महाराज! आप जो दक्षिणा मांगोगे सो मैं दूंगा, ब्राह्मण बोला-यह थैली मैं दक्षिणा पाऊ तो आनंदसे अपने घर जाऊं थैली ब्राह्मणको देकर राजा अपने महलमें आया. इतनी कथा कहकर वह राजा भोजसे

आठवी पुतली ८. ( ५७ )

आठवी पुतली ८. ( ५७ ) फिर बोली कि-इतनी मेहनतसे थैली पाई और ब्राह्मणको देनेमें बार न लगाई. ऐसा साहसी और ऐसा दानी जो तू हो तो इस सिंहासनपर बैठ और नहीं तो पातक होगा. वहभी मुहूर्त राजाका टल गया जब दूसरे दिन फिर राजा सिंहासनपर बैठनेको आया, तब पुष्पावती - आठवीं पुतली- बोली-हे राजा भोज ! तूने जो सिंहासनपर बैठनेका चित्त किया है सो इसकी आशा मनसे छोडदे. राजा बोला-मैं किसतरह छोड़ं? तब पुतलीने कथा शुरू की कि, एक दिन राजा बीर विक्रमा- दित्य अपने दरबारमे बैठाथा उसवखत सब राजा मुजरेको हाजिर थे. इतनेमें एक बढई ने आकर सलाम किया और कहा, महाराज ! मैं आपके दर्शनको आयाहूं और एक घोड़ा आपके लिये लाया हूं. राजाने आज्ञा की कि-ले आ. बढ़ईने जो हिकमतका घोडा बनाया था सो नजर किया. राजाने घोडेको देख उससे पूंछा-कि, इसमे क्या २ गुण हैं ? बढ़ईने कहा-महाराज ! इसमें ये गुण हैं कि, न यह कुछ खाता है. न कुछ पीता है. और जहां चाहो तहां ले जाता है. दर्याई घोडेके बराबर है. घोडा इस वख्त चालाकीसे एक जगह

(५८) सिंहासनबत्तीसी. ठहरता न था. कूद फांद रहा था. ज्यों ज्यों राजा' देखताथा त्यों त्यों रीझताथा. आखिर पसंद करके कहा कि, इसको इस मैदानमे फेरकर दिखायो. ज्योंही उसने कोडा किया. फिर तो गर्दही नजर आतीथी. और घोडा मालूम न होताथा. जब ऐसे गुण घोडेमे राजाने देख, तब दीवानको बुलाकर कहा कि- एक लाख रुपये इसे दो. दीवानने अर्ज की-कि, महाराज ! यह काठका घोडा और लाख रुपये इनाम मुनासिब नहीं. राजाने दो लाख रुपये फरमाया. तब उस दीवानने उसके हवाले कर दिये. और अपने दिलमें सोचा जो कुछ और तकरार करूंगा तो रुपये और बढेंगे. वह बढई रुपय ले अपने घरको गया. घोडा थानपर बांधा और वह यह कहतेहुये चला गया, कि, इसपर सवार होते कोडा न कीजो, न ऐड मारियो पर किस्मतका लिखा कोई मिटा नहीं सकता. जो बात हुई चहती है, सो होतीही है कई दिनके बाद राजाने घोडा मंगवाया और अपने मुसाहिबोंसे फरमाया कि, कोई तुममेंसे सवार होकर इस घोडेको फेरे तो हम देखें यह बात सुनकर वे एकेकका मुंह देखने लगे. घोडेकी चालाकीसे कोई न चढा. तब राजा झुंझलाकर बोला - घोडेको साज लगाकर तैयार कर आओ. यह बात सुनक' एककी जगह हजार आदमी दौडे और जल्दी तैयार कर लाए. तब राजा सवार होकर वहां फेरने लगा, कि, वह चाहताथा कि आसन जमाकर घोडेको अपने काबूमें लावे पर वह रानोंसे

आठवीं पुतली ८. ( ६१ )

आठवीं पुतली ८. ( ६१ )

निकला जाताथा और पारेकी तरह जगहपर ठहरता न याथे. छलावेकी मानिंद छलवल कर रहाथा. राजा खुशीके मारे बढ़- ईकी बात भूल गया. और घडेको कौडा दिया. चाबुक लगा तेही वो आग बबूला होकर ऐसा उडा कि समुद्रपार लेगया. और एक जंगलमे दरख्तके ऊपरसे गिरा आप रानोंसे निकल गया. राजाभी दरख्तपरसे लडखडाता हुआ नीचे गिर पडा और यह हालत हुई कि मृतकसा हो गया. जब कितनी देर गयी. तब कुछ उसे होश आया, तब अपने दिलमें कहने लगा कि- देश, नगर, राजपट, रैयत और अपने पराये सबके सब छूटे किस्मत, यहां मुझे लेआई देखिये आगे क्या होय ! यह मनमें बिचार कर धीरज बाध उठकर वहांसे आगे चला, ऐसे महाब- नमें जा पडा कि निकलना फिर मुश्कील हुआ, पर ज्यों त्यों उस जंगलसे भूला भटका दश दिनम सातकोस राह चलकर फिर ऐसे एक बनमे जा पहुँचा कि, उसमें ऐसा अँधियारा था कि, हाथको हाथ न सूझताथा और चारो तरफ, झेग, गैंडे चिते बल्कि सब परिंदे बोल रहेथे. उनकी डरावनी आवाजें सुनकर राजा सहमा जाता था. कभी पूर्व, कभी पश्चिम, कभी दक्षिण, कभी उत्तर, भटका भटका फिरता था पर कहीं राह न मिलतीथी. इस तरह दुःख भोगता हुआ पंद्रह दिनके बाद एक तरफ जा निकला. वहां एक तमाशा नजर आया कि, एक. मकान है और उसके बाहर बडा दरख्त और दो बड़े