भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1000, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1000
  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९७१

पुरूरवा बोले—महादेव! मैं प्राण जानेपर भी दूसरा वर नहीं माँगूँगा।

राजाका यह निश्चय जानकर तथा उग्र तपस्या-द्वारा उनके किये हुए साधनको देखकर महादेवजीने नर्मदाको आज्ञा दी—सुरेश्वरि! तुम पृथ्वीपर उतरो और पुरूरवाकी तपस्याके फलसे मृत्युलोकके हितका साधन करो।

नर्मदाने कहा—महेश्वर! मैं बिना किसी आधारके स्वर्गलोकसे पृथ्वीपर कैसे जाऊँगी?

नर्मदाकी यह बात सुनकर देवाधिदेव महादेवजीने आठ पर्वतोंको बुलाया और उन सबसे पूछा—'तुममेंसे नर्मदा नदीको धारण करनेमें कौन समर्थ है?' तब विन्ध्यगिरिने कहा—'सुरेश्वर! आपके प्रसादसे मेरा पुत्र नर्मदाको धारण करनेमें समर्थ है। उसका नाम पर्यंक है।' तत्पश्चात् महादेवजीकी आज्ञा मिलनेपर पर्यंकने कहा—'महेश्वर! आपके प्रसादसे मैं नर्मदा नदीको धारण करूँगा।' तदनन्तर नर्मदादेवी पर्यंकगिरिके शिखरपर स्थित होकर उतरीं। उनकी जलराशिके वेगपूर्वक भ्रमणसे पर्वत, वन और काननोंसहित समस्त पृथ्वी जलसे आप्लावित हो उठी। सम्पूर्ण जगत् अकालमें ही प्रलयकालसे ग्रस्त हो गया। तब सम्पूर्ण देवताओंने मेकलकन्या नर्मदाकी स्तुति की और कहा—'कल्याणि! तुम मर्यादा धारण करो। किसी नियत सीमामें स्थित रहो और इस प्रकार विश्वके लिये हितकारिणी बनो।' देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर महादेवजीकी आज्ञासे नर्मदादेवीने पुनः अपने रूपको संकुचित कर लिया। अब वे संवृतरूपसे बहने लगीं। उस समय नर्मदाजीने पुरूरवासे कहा—'वत्स! तुम अपने हाथसे मेरे जलका स्पर्श करो।' उनकी आज्ञा पाकर पुरूरवाने उनके जलका स्पर्श एवं आचमन करके पितरोंका तिल और नर्मदा-जलसे तर्पण किया। उस जलसे तर्पण करनेपर राजाके समस्त पितर उस परम पदको प्राप्त हो गये, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। समस्त चराचर जगत् सब ओरसे पवित्र हो गया। वे देश, पर्वत, ग्राम और आश्रम भी पवित्र हैं, जहाँ नर्मदाजी विद्यमान हैं। सरस्वतीका जल तीन दिनमें पवित्र करता है। यमुना-जल सात दिनमें पावन बनाता है, गंगा-जल स्नान करनेपर तत्काल पवित्र करता है, परंतु नर्मदा नदी दर्शनमात्रसे ही मनुष्योंको पवित्र कर देती है। नर्मदाके संगममें जहाँ-कहीं भी स्नान, दान, जप, होम, वेदपाठ, पितृपूजन, देवाराधन, मन्त्रोपदेश, संन्यास और देहत्याग आदि जो कुछ भी किया जाता है, उसके फलका अन्त नहीं है। वैशाख, माघ अथवा कार्तिककी पूर्णिमाको, विषुवयोगमें, संक्रान्तिके समय, व्यतीपात और वैधृतियोगमें, अमावास्यामें, तिथिकी हानि और वृद्धिके दिन, मन्वादि युगादि और कल्पादि तिथियोंमें, माता-पिताके क्षयाहमें नर्मदा-तटवर्ती ॐकार भृगुक्षेत्र तथा विशेषतः संगममें जो सहस्र, शत अथवा एक गोदान एवं सम्पूर्ण महादान करता है तथा जो श्रेष्ठ मनुष्य नर्मदामें स्नान, दान, जप, होम और पूजन आदि करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। युधिष्ठिर! मनुष्य नर्मदामें जहाँ-जहाँ स्नान करता है, वहीं-वहीं उसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर नर्मदाका कीर्तन करता है, उसका सात जन्मोंका किया हुआ पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है तथा जहाँ संगम और बाणलिंगसे युक्त नर्मदा नदी स्थित है, वहाँ स्नान करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता और अन्तमें शिवधामको जाता है।

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