भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रेवाखण्ड

राजा युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा पुरूरवाकी तपस्यासे नर्मदाजीके मर्त्यलोकमें आगमनका वर्णन

सूतजी बोले— तपोधनो! एक समय महातेजस्वी मार्कण्डेयमुनि तीर्थयात्राका फल पाकर नर्मदाके तटपर बैठे हुए थे। वहीं उनका दर्शन करनेके लिये बहुत-से ऋषि-महर्षि आये। पुलस्त्य, वसिष्ठ, पुलह, क्रतु, भृगु, अत्रि, मरीचि, भारद्वाज, काश्यप, मनु, यम, अङ्गिरा, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, शम्बकाव्य (शुक्राचार्य), कात्यायन मुनि, गौतम, शंख, लिखित, दक्ष, कात्यायन, जामदग्न्य, याज्ञवल्क्य, ऋष्यशृंग, विभाण्डक, गर्ग, शौनक, दाल्भ्य, व्यास, उद्दालक, शुक, नारद, पर्वत, दुर्वासा, उग्रतापस, शाकल्य, गालव, जाबालि, मुद्गल और कौशिक-कुलोत्पन्न विश्वामित्र आदि देवसम्मानित महर्षि तथा धर्म, शतानन्द, वैशम्पायन, वैष्णव, शाकलायन, वार्धक्य, जुहुति, आवसु, भूमण्डल-निवासी महात्मा बालखिल्य आदि भी वहाँ उपस्थित हुए।

उसी समय तीर्थयात्राका फल सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर वेदवेत्ता एवं ज्ञानी ब्राह्मणों तथा अपनी प्रिया द्रौपदीके साथ नर्मदातटपर मार्कण्डेय मुनिके आश्रमपर आये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने भाइयोंसहित तीन बार मुनिकी परिक्रमा की और उन्हें साष्टांग प्रणाम करके बैठ गये। राजाको बैठा देख महामुनि मार्कण्डेय बोले—‘नृपश्रेष्ठ! भाइयों और ब्राह्मणोंके साथ कुशलसे तो हो न?’ युधिष्ठिरने हँसकर कहा—‘मुने! आज आपके चरणारविन्दोंका दर्शन पाकर मैं कृतकृत्य हो गया। मेरे अन्तःकरणका मल नष्ट हो गया। तीनों लोकोंमें प्रवाहित होनेवाली गंगा, यमुना और सरस्वती, गंगाद्वार, हिमालय, कुब्जार्क, ब्रह्मयोनि, उग्रतीर्थ, कनखल, केदार, भैरवक्षेत्र, नैमिषारण्य, गया, कुरुक्षेत्र, पुष्कर इत्यादि पवित्र तीर्थोंको छोड़कर आप किस प्रयोजनसे केवल महानदी नर्मदाका ही सेवन करते हैं, इस बातको हम सब लोग सुनना चाहते हैं। आप कृपा करके इस रहस्यको बतावें।’

मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! पूर्वकालकी बात है, चन्द्रवंशमें पुरूरवा नामसे विख्यात एक चक्रवर्ती राजा हुए थे। वे स्वर्गलोकका शासन करनेवाले इन्द्रकी भाँति समूची पृथ्वीका पालन करते थे। एक समय राजसभामें उन नृपश्रेष्ठने बड़े-बूढ़े ब्राह्मणोंसे पूछा—‘विप्रवरो! पापमोहित मनुष्य किस उपायसे यज्ञ आदि कर्मोंके बिना ही स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं और हो सकते हैं, यह बताइये।’

ब्राह्मणोंने कहा— महाराज! नर्मदा नदी सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाली हैं। वे सम्पूर्ण विश्वका पापहरण करनेमें समर्थ हैं। उन्हें स्वर्गलोकसे आप इस पृथ्वीपर उतारें। अपने मनको वशमें रखनेवाले उन ब्राह्मणोंका यह वचन सुनकर राजा पुरूरवाने कन्द, मूल, फल, शाक और जलका आहार करके निर्मल अन्तःकरणसे महादेवजीकी आराधना की। तब महादेवजीने प्रसन्न होकर कहा—‘बेटा! वर माँगो। मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छाके अनुसार वस्तु प्रदान करूँगा।’

पुरूरवा बोले— महादेव! आप समस्त लोकोंके हितके लिये नर्मदा नदीको पृथ्वीपर उतारिये। आज लाख योजनका विशाल जम्बूद्वीप निराधार हो रहा है। न देवता तृप्त होते हैं, न पितर और न मनुष्योंको ही तृप्ति हो रही है।

महादेवजीने कहा— राजन्! तुम तो अयाच्य वस्तुकी याचना करते हो। ऐसा वर तो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। नर्मदाको छोड़कर दूसरा जो कुछ भी वर माँगो, मैं दूँगा।

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