संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९६९ ---|---
सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वे जो पृथ्वीके पुत्र अंगारक देव (मंगल) हैं, उनका उत्तम तीर्थ सब तीर्थोंका फल प्रदान करनेवाला है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य मंगलेश्वरका पूजन करे। जहाँ गंगा और आकाशगंगाका संगम है, उस तीर्थमें स्नान करके गंगेश्वरका दर्शन करे। इससे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त होता और विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। ऋणमोचनतीर्थ सब पापोंका अपहरण करनेवाला है। उसमें स्नान करके मनुष्य ऋणर्तेश्वरका पूजन करे। फिर अपनी शक्तिके अनुसार दान करके घृत-श्राद्ध करे। इससे मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। ऋणमोचन तीर्थसे चलकर पापरहित शक्तिभेद नामक तीर्थमें जाय। वह सब तीर्थोंमें उत्तम और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर विद्वान् पुरुष समस्त मातृकाओंका दर्शन करे। फिर वहाँ विधिपूर्वक श्राद्ध करके शय्या आदि दान करे। ऐसा करनेवाला पुरुष माताके ऋणसे छूटकर सायुज्य मोक्ष पाता है। पापमोचन नामक जो श्रेष्ठ तीर्थ है, वहाँ श्राद्ध करके मनुष्योंको छायादान करना चाहिये। ऐसा करनेसे वे शुद्धचित्त हो जाते हैं। तत्पश्चात् विश्वविख्यात प्रेतशिला नामक तीर्थमें जाय, जो प्रेतोंको मोक्ष देनेवाला है। उसमें स्नान करके मनुष्य श्राद्धका दान करे, क्योंकि वहाँ तिलसहित जलद्वारा तर्पण करनेसे पितर उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। वहाँ रस और नमकके साथ अन्नका दान करना चाहिये। यमेश्वरकी पूजा करके मनुष्य कभी नरकमें नहीं पड़ता और उसके पितर प्रसन्न होकर सनातन ब्रह्मपदको प्राप्त होते हैं। जहाँ नवनदीका संगम है, वहाँ त्रिभुवन-वन्दित उत्तम तीर्थ है। वहीं पार्वती माता निवास करती हैं। उसमें स्नान करके पवित्र हो एकाग्रचित्तसे कल्याणमयी भगवती पार्वतीकी विधिपूर्वक पूजा करे, महादान दे। ऐसा करनेसे शुद्धचित्त मानव साक्षात् शिव होता है। नवनदी-संगमसे चलकर मन्दाकिनी तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान करके पवित्र हो जो मनुष्य भगवान् सदाशिवका पूजन करता है और अन्न आदि देकर एक दोन तिलका दान करता है, वह सब पापोंसे शुद्ध होकर कुबेरके समान हो जाता है। तदनन्तर व्रतका पालन करनेवाला पुरुष ब्रह्माजीके उत्तम तीर्थमें जाय। विधिपूर्वक स्नान करे और सब प्रकारके दान दे। तत्पश्चात् यात्रेश्वर शिवका तुलसी, बिल्वपत्र तथा नाना प्रकारके सुगन्धित पुष्पोंद्वारा पूजन करके उन्हें धूप, दीप, नैवेद्य, मुखशुद्धि तथा उत्तरीय आदि अर्पण करे और व्रतकी पूर्तिके लिये उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे—
यात्रेश्वर नमस्तुभ्यमुमानाथ जगत्पते।
त्वत्प्रसादात्कृतां यात्रां सफलां कुरु मे प्रभो॥
'यात्रेश्वर! उमानाथ! जगत्पते! आपको नमस्कार है। प्रभो! आपके प्रसादसे मैंने यह यात्रा की है। कृपया इसे सफल बनाइये।'
सनत्कुमारजी कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार जो अवन्तीकी यात्रा करता है, उसे अवन्तीतीर्थमें निवास करनेका पुण्य प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है। वह इस लोकमें नाना प्रकारके भोग, धन, स्त्री तथा सम्पत्ति आदिका सुख भोगकर सब पापोंसे शुद्धचित्त हो मृत्युके पश्चात् भगवान् शिवके लोकमें जाता है। जो मनुष्य इस पवित्र एवं पापहारिणी कथाको सुनते हैं, उनके लिये इस लोक और परलोकमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती।
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अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य सम्पूर्ण।
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