संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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राजा हिरण्यतेजाके तपसे नर्मदाका अवतरण
युधिष्ठिरने पूछा— भगवान्! राजा पुरूरवासे पहले महाराज हिरण्यतेजाने नर्मदादेवीको किस प्रकार इस पृथ्वीपर उतारा था, यह बतानेकी कृपा करें।
मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! चन्द्रवंशमें हिरण्यतेजा नामसे प्रसिद्ध एक राजर्षि हो गये हैं, जो समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा प्रजापतिके समान थे। वे पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वीका एकछत्र शासन करते थे। उनकी राजधानी चन्द्रपुरी थी, जो इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी। एक समय अमावास्याको सूर्यग्रहण लगनेपर इस जम्बूद्वीपमें बावली, कुआँ और सरोवर होनेपर भी कोई नदी नहीं उपलब्ध हो सकी, जहाँ देवताओं और पितरोंका विशेष सत्कार हो सके। उस समयतक जम्बूद्वीपमें कोई नदी थी ही नहीं। राजाने लाखों गौएँ, सुवर्ण, मणि, रत्न, खजाना, घोड़े और अगणित मतवाले हाथी ब्राह्मणोंको दानमें दिये। हव्य और कव्यसे पितरोंको भी तृप्त किया। उस समय उन्होंने देखा, पितरोंको जलपानका बड़ा कष्ट है। वे पितरोंसे बोले—'आपलोग कौन हैं और किस कर्मसे पवित्र हो सकते हैं?'
पितर बोले— महाभाग! यह द्वीप नदियोंसे रहित होनेके कारण यहाँका सब धर्म-कर्म नष्ट हो चुका है। नदीके अभावमें न तो देवता तृप्त होते हैं, न पितर। यदि इस द्वीपमें नर्मदा उतर आवे तो हम सब लोगोंकी मुक्ति हो जायगी। महाराज! यह यथार्थ बात हमने आपसे बता दी है। अब आपकी जैसी रुचि हो, वैसा करें।
हिरण्यतेजाने कहा— अब मुझे पितरोंका उद्धार करना ही उचित प्रतीत होता है। अन्यथा इस राज्यसे क्या काम? यदि मैं पितरोंको तृप्त न कर सका तो मेरा जीवन भी व्यर्थ है।
ऐसा कहकर राजा हिरण्यतेजा उदयाचल पर्वतपर गये और कन्द, मूल एवं फलका भोजन करते हुए भगवान् शिवकी उपासना करने लगे। उन्होंने बड़ी कठोर तपस्या की। उनकी उत्तम भक्ति जानकर त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने प्रत्यक्ष दर्शन दिया। राजाने देवाधिदेव महादेवके दिव्य रूपका दर्शन पाकर उनकी तीन बार परिक्रमा की और साष्टांग प्रणाम करके उनका स्तवन किया।
राजा बोले— सुरेश्वर! आपको नमस्कार है। शूलपाणे! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध, बुद्धि, मन, अहंकार, प्रकृति और उसके तीनों गुण हैं। आप ही सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक, सर्वत्र व्यापक, समस्त कलाओंसे युक्त तथा कलारहित अविनाशी परमेश्वर हैं। ब्रह्मा और विष्णु आदि देवताओंको भी आपके आदि-अन्तका पता नहीं लगता। महातेजाका किया हुआ यह स्तोत्र सुनकर देवदेव जगदीश्वर शिवने कहा—'महाभाग! तुम अपने इच्छानुसार वर माँगो।' तब राजाने कहा—'देवेश्वर! सात कल्पोंतक प्रवाहित होनेवाली नर्मदादेवीको आप मर्त्यलोकमें उतारें। पितर घोर नरकमें डूब रहे हैं। उनका उद्धार हो और वे तृप्त होकर मुक्ति एवं परम गतिको प्राप्त हों, इसके लिये नर्मदादेवीका अवतरण आवश्यक है।'
महादेवजी बोले— तात! नर्मदाजी तो ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं, दैत्यों तथा अन्य अल्पजीवी प्राणियोंद्वारा पृथ्वीपर नहीं उतारी जा सकतीं। अतः तुम कोई दूसरा वर माँगो। उसे अभी दे दूँगा।
तब महाभाग राजा हिरण्यतेजाने कहा— प्रभो! आपके प्रसन्न होनेपर तीनों लोकोंमें कुछ भी असाध्य नहीं। मैं तो सहस्रों जन्म धारण करनेपर भी दूसरा वर नहीं माँगूँगा। देवेश्वर! मैं आपके सेवकोंका भी सेवक हूँ। मुझे नर्मदाजीको ही दीजिये।
राजाका यह निश्चय जानकर भगवान् शंकरने लोकपावनी नर्मदादेवीका आवाहन किया। वे मगरके आसनपर आरूढ़ हो दिव्यरूपसे आकर शिवजीके आगे खड़ी हुईं और उमा-महेश्वर दोनोंके चरणोंका