संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | ९७३ |
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| स्पर्श करके नतमस्तक हो बोलीं—‘देवेश! किसलिये मेरा स्मरण किया गया?’<br><br>महादेवजीने कहा—नर्मदे! राजा हिरण्यतेजाने अपना राज्य छोड़कर यहाँ चौदह हजार दिव्य वर्षोंतक घोर तपस्या की है; अतः तुम इनकी इच्छाके अनुसार पृथ्वीपर उतरो। शीघ्र जाओ और नरकमें पड़े हुए सब पितरोंका उद्धार करो।<br><br>नर्मदा बोलीं—देव! मैं बिना किसी आधारके जम्बूद्वीपमें कैसे जाऊँगी।<br><br>यह सुनकर महादेवजीने पर्वतोंसे कहा—तुम सब लोग क्षणभर स्थिर हो जाओ, जिससे सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा पृथ्वीपर जाय।<br><br>तब पर्वतोंने कहा—देव! हम नर्मदादेवीको धारण करनेमें असमर्थ हैं। उसी समय उदयाचलने खड़े होकर कहा—‘महादेवजीकी कृपासे मैं नर्मदाको धारण करनेमें समर्थ हूँ।’<br><br>तदनन्तर उदयाचलकी चोटीपर चरण देकर नर्मदादेवी आकाशसे पृथ्वीपर आयीं और वायुके समान वेगसे पश्चिम दिशाको बह चलीं। उस समय तीनों लोकोंमें बड़ा हाहाकार मचा। नर्मदाके जलका वह भयंकर कल-कल नाद सुनकर पाताललोकसे एक तेजोमय प्रज्वलित लिंग प्रकट हुआ और हुंकारपूर्वक बोला—‘सब पापोंको हरनेवाली तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली नर्मदे! मर्यादा धारण करो। तुम्हें धारण करनेके लिये महादेवजीने तीन पर्वतोंकी सृष्टि की है— | मेरु, हिमवान् और कैलाश तथा चौथा पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य भी तुम्हें धारण करनेमें समर्थ है। इन पर्वतोंकी लंबाई पूर्वसे पश्चिम दिशाकी ओर बत्तीस हजार योजन है और दक्षिणसे उत्तरकी ओर चौड़ाई पाँच सौ योजनकी है।’<br><br>तत्पश्चात् राजर्षि हिरण्यतेजाने नर्मदासे कहा—देवि! आपने हमारे पितरोंका उद्धार करनेके लिये बड़ा अनुग्रह किया है। नर्मदाने उत्तर दिया—‘राजन्! तुमने मेरे लिये महादेवजीकी आराधना एवं तपस्या की है, इसलिये जो तुम्हारे माता-पिताके वंशके लोग हैं, वे और तुम्हारी रनिवासमें रहनेवाली स्त्रियोंके भी जो सगे-सम्बन्धी हैं, वे सब मेरे प्रभावसे उमा-महेश्वरके लोकमें चले जायँगे।’<br><br>तब राजाने नर्मदामें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण तथा श्राद्ध और पिण्डदान किया। इससे उनके सब पितर नरकसे निकलकर देवयानमार्गपर स्थित हुए। यह नर्मदाका पहला अवतरण आदिकल्पके सत्ययुगमें हुआ था। दूसरा अवतार दक्षसावर्णि मन्वन्तरमें हुआ और तीसरा अवतार राजा पुरूरवाके द्वारा वैष्णव मन्वन्तरमें सम्पन्न हुआ है। राजन्! यह प्राचीन वृत्तान्त जैसा मैंने अपनी आँखों देखा है, वैसा बतलाया। नर्मदामें स्नान करने, गोता लगाने, उसका जल पीने तथा स्मरण और कीर्तन करनेसे अनेक जन्मोंका घोर पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। |
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नर्मदाका मर्त्यलोकमें आकर पुरुकुत्सुको अपना पति बनाना तथा नर्मदास्नानकी महिमा
| मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! क्षत्रियकुलमें उत्पन्न पुरुकुत्सु नामक राजा महान् यशस्वी हो गये हैं। उन्होंने पहले एक सहस्र वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना की। उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने पूछा—‘राजन्! तुम कौन-सा वर चाहते हो?’ राजाने कहा—‘देव! नर्मदा नामसे | प्रसिद्ध परम सौभाग्यशालिनी नदी है, उसे आप इस भूतलपर उतारें।’ महादेवजी बोले—‘राजन्! इसे न माँगकर कोई दूसरा वरदान माँगो।’ इतना सुनते ही वे महाभाग क्षत्रिय पुरुकुत्सु मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। यह देख शिवजीने कहा—‘राजन्! तुम स्वस्थ हो जाओ। मैं सरिताओंमें |