भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1003

९७४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


श्रेष्ठ नर्मदाको मर्त्यलोकमें उतारता हूँ।' तदनन्तर महादेवजीके कहनेपर पर्यङ्क नामक पर्वतने महानदी नर्मदाके वेगको धारण करना स्वीकार किया। राजा और देवताओंके साथ देवी नर्मदा बड़े वेगसे चली और पर्यङ्क-पर्वतकी चोटीपर होती हुई उस स्थानपर पहुँची, जहाँ पूर्वकालमें राजा पृथुने अश्वमेध यज्ञ किया था। वहीं एक बाँसके मूलभागसे महानदी नर्मदा निकली। उस समय सब देवता, गन्धर्व, यक्ष, मरुत्, अश्विनीकुमार, पिशाच, राक्षस, नाग और तपोधन ऋषि—सब लोग अर्घ्य और पाद्यसे पूजन करके नर्मदाजीकी शरणमें प्राप्त हुए और बोले—'आज हमलोगोंका जन्म सफल हुआ। हमारी तपस्या भी सफल हो गयी। देवि! यहाँ तुम्हारा दर्शन करके हम सब देवता कृतार्थ हो गये। हम उसीको पुरुष मानते हैं, जिसने नर्मदाजीको यहाँ उतारा है। नर्मदे! तुम अपने हाथसे देवताओंका स्पर्श करो, जिससे हम सब लोग पवित्र हो जायें।'

यह सुनकर नर्मदा बोलीं—मैं अबतक कुमारी हूँ, मेरा पति नहीं है। अतः मैं देवगणोंका स्पर्श नहीं कर सकती। नर्मदाका यह उत्तर पाकर देवता चिन्तासे व्याकुल हो उठे और बोले—'देवि! तुम्हारे समान रूप-गुणसे सम्पन्न उत्तम वर कहाँसे प्राप्त हो सकता है। जिसने तुम्हें इस लोकमें प्रकट किया है, वही तुम्हारा पति हो। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके शापसे समुद्र मर्त्यलोकमें जाकर राजा पुरुकुत्सके रूपमें उत्पन्न हुआ है। वह इक्ष्वाकुकुलके आनन्दको बढ़ानेवाला है। वह देवतुल्य क्षत्रिय पुरुकुत्सु तुम्हारे लिये श्रेष्ठ वर हो।'

नर्मदा बोलीं—जिनमें इस प्रकार देवत्व है, जिनकी समस्त प्रजा धर्ममें स्थित है, उन महात्मा पुरुकुत्सुके लिये और क्या कहा जा सकता है। स्वयम्भू ब्रह्माजीके मानसपुत्र जिस प्रकार धर्मनिष्ठ बताये गये हैं, उसी प्रकार ये पुरुकुत्सु भी सब धर्मोंके पालनमें तत्पर हैं। अतः मैं इनको पतिरूपमें स्वीकार करती हूँ।

राजा पुरुकुत्सु बोले—नर्मदे! तुम देवकन्या हो। मुझपर कृपा करो, जिससे मेरे पितर स्वर्गको जायें और मेरा भी महान् यश हो।

नर्मदाने कहा—राजेन्द्र! ऐसा ही हो। आप मुझसे जो-जो चाहते हैं, वह सब मेरे प्रसादसे आपको प्राप्त हो।

ऐसा कहकर देवी नर्मदा पर्यङ्कपर्वतसे निकलकर पश्चिम दिशाकी ओर चली गयीं। वे धनुषसे छूटे हुए बाणकी भाँति पृथ्वीको विदीर्ण करती और पर्वत-शिखरोंको तोड़ती-फोड़ती हुई बड़े वेगसे चली जा रही थीं। उस समय विन्ध्य पर्वतके प्रदेशमें वे जहाँ-जहाँ गयीं, वहाँ-वहाँ स्नान किया जाता है। वहाँ तीर्थवर्जित स्थानमें भी स्नान करनेपर सहस्रों गंगास्नानका फल होता है। तदनन्तर वेदज्ञ महर्षियोंने सुखका विस्तार करनेवाली लोकपावनी महादेवी नर्मदाका स्तवन किया। वेद धर्मके मूल हैं, स्मृतियाँ फूल और फल हैं, अग्निहोत्रपरायण पुण्यात्मा द्विज उस फलका उपभोग करते हैं। परंतु वे भी नर्मदाको स्वर्गकी सीढ़ी समझकर उसका सेवन करते हैं। जहाँ-जहाँ भगवान् शिवके शुभ मन्दिरके समीप पुण्यमयी नर्मदा विद्यमान हैं, वहाँ-वहाँ नर्मदा नदीका स्नान एक लाख गंगास्नानके समान होता है। अग्निहोत्रसे जो पुण्य होता है और पितरोंके श्राद्धसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब नर्मदाके जलसे उपलब्ध हो जाता है। नर्मदाके नामका कीर्तन करना और उसके संगमतीर्थमें दान देना, इसके समान दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जो बुद्धिमान् प्रातःकाल उठकर नर्मदा नदीका स्नान करते हैं, उनका पहले जन्मका और इस जन्मका किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है। कोई भी मनुष्य यदि नर्मदामें जहाँ-कहीं भी स्नान कर लेता है, उसका किया हुआ सौ जन्मोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। जो नर्मदाके तटपर मृत्युको प्राप्त होता है, वह भगवान् शंकरके स्वरूपको प्राप्त होता है। जहाँ नर्मदा नहीं हैं,