संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1004, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९७५
वहाँ पापोंका प्रायश्चित्त करनेकी प्रेरणा की जाती है; परंतु नर्मदाजल प्राप्त होनेपर तो प्रायश्चित्तकी आवश्यकता ही नहीं रह जाती है।
विन्ध्यगिरिके आठ मानसपुत्र बताये गये हैं, जिनमें पर्यंक प्रथम है। उसे सब पर्वतोंमें श्रेष्ठ जानना चाहिये। नर्मदाके डेढ़ सौ स्रोत कहे गये हैं। आधे कोसके तृतीय भाग (पाँच सौ सत्तासी गज)-की चौड़ाईमें उसकी धारा बहती है, ऐसा विज्ञ पुरुषोंने बताया है। युधिष्ठिर! परमेश्वरी नर्मदाने देवताओं और मनुष्योंके हितके लिये स्वयं ही अपने-आपको धारण किया है। वे समस्त सरिताओंमें श्रेष्ठ हैं और सम्पूर्ण जगत्को तारनेके लिये ही यहाँ अवतीर्ण हुई हैं। उनके तटपर स्वर्ग और मोक्ष दोनों ही स्थित हैं।
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नर्मदा-तटवर्ती अनन्तपुर एवं व्यासतीर्थकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके उत्तर 'अनन्तपुर' नामक एक स्थान है, जहाँ सब पापोंका हरण करनेवाला अनन्तसिद्धि नामक लिंग है। उस अनन्तपुरमें ही वैश्रवण तीर्थ, कौबेरतीर्थ, घनदतीर्थ, मणिभद्रतीर्थ और यज्ञतीर्थ हैं, जो परम पवित्र, सर्वलोकप्रसिद्ध, मनोवांछित फल देनेवाले तथा मोक्षदायक हैं। वहीं ऋषियोंके पवित्र आश्रम भी हैं, जो सर्वदेवमय एवं शुभ हैं। वहाँ सावर्णि, कौशिक, अघमर्षण, शाकल्य, कुशाकर्ण्य, शरभंग, अग्निगर्भ—ये तथा और भी बहुत-से उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि रहे थे, जो तपस्या करके इस नर्मदा तीर्थके माहात्म्यसे स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं। ऋषियोंमें श्रेष्ठ वाल्मीकिजीने भी इसी तीर्थके प्रभावसे ब्रह्मतेजसे सम्पन्न शरीर प्राप्त किया था। इक्ष्वाकु, कुवलयाश्व, दिलीप, नहुष, वेणु, राजा ययाति, अजपाल और हैहय—ये तथा अन्य भी बहुत-से राजाओंने अनन्तपुरमें निवास किया है। इस अनन्तपुरके क्षेत्रमें ही नर्मदाके तटपर जो भगवान् महेश्वर निवास करते हैं, उनका विधिपूर्वक पूजन करके वे सभी नरेश स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं। अनन्तपुरमें सप्तर्षितीर्थ, सप्तसारस्वत-तीर्थ, अमर्त्यसम्भव लिंग, अरण्यकेश्वर लिंग, अघौघनाशन तीर्थ, कल्मषापहतीर्थ, पंचब्रह्ममयतीर्थ, सहस्रशीर्षा महादेव, वाराहतीर्थ, वामनतीर्थ, यमतीर्थ, सौरभंगतीर्थ, सहस्राश्वमेधतीर्थ, हिरण्यगर्भतीर्थ, सावित्रीतीर्थ और चतुर्वेदतीर्थ—ये सभी तीर्थ सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाले और श्रेष्ठ हैं। पर्यंक पर्वतसे पश्चिम जहाँतक अनन्तपुरका क्षेत्र है, वह परम शुभ है। इसके भीतर जिनकी मृत्यु होती है, वे दान-धर्मसे रहित हों तो भी चौदह इन्द्रोंके समयतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं। तदनन्तर द्वीपेश्वर नामक उत्तम तीर्थ है, जो व्यासतीर्थ कहलाता है। वहाँ स्नान करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। वह इच्छानुसार उत्तम फल देनेवाला श्रेष्ठ तीर्थ है। द्वीपेश्वरमें स्नान करके जो वृषभ-दान करता है, वह सुवर्णमय विमानसे स्वर्गलोकमें जाता है। जो मनुष्य कार्तिकके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए वहाँ भगवान् शिवको स्नान कराता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकमें सम्मानित होता है। ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता और तपोधन ऋषि, व्यासतीर्थमें जाकर भावितात्मा भगवान् शंकरकी स्तुति करते हैं। दूसरे भी जो सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर और नाग आदि हैं, वे नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे भगवान् शंकरका स्तवन करते हुए कहते हैं कि 'जिनके हाथमें शक्ति है, जिनके समान शक्तिशाली वीर दूसरा कोई नहीं है, वे समस्त देवताओंद्वारा आराधित और पूजित सुरश्रेष्ठ भगवान् भूतनाथ जिसको चाहें ऊँचा उठा सकते हैं और जिसे चाहें अवनतिमें डाल सकते हैं। जिनके एक बाणसे त्रिपुर भस्म कर दिया गया, जिनके ललाटवर्ती नेत्रद्वारा देखनेमात्रसे कामदेव