संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भस्म हो गया और जिन्होंने अपने श्रेष्ठ त्रिशूलसे अन्धकासुरको चीर डाला, उनके साथ कौन विरोध कर सकता है? जिन्होंने अपनी जटाके अग्र भागमें जलराशिकी उत्ताल तरंगोंसे संयुक्त गंगाजीको धारण कर रखा है, जिनके चरणारविन्दके अंगुष्ठका तनिक-सा दबाव पाकर लंकापति रावण मूर्च्छित होकर गिर पड़ा था, जिन्होंने समस्त देवताओं और असुरोंके समक्ष दक्षके यज्ञका क्षणभरमें विध्वंस कर डाला था, जिनके लिंगमय विग्रहके पूजनसे मनुष्य मनोवांछित फल प्राप्त करता है, उन भगवान् शंकरके समान या उनसे बढ़कर दूसरा कौन देवता है?' जो विधिपूर्वक महादेवजीकी आराधना करके 'यस्यास्ति शक्ति' इत्यादि स्तोत्रका प्रातःकाल प्रयत्नपूर्वक पाठ या स्मरण करता है, वह भगवान् शंकरका पार्षद होता है। जो इस स्तोत्रका महादेवजीके समीप पाठ करता है, उसके ऊपर व्यासेश्वर शिव तथा नर्मदा दोनों ही प्रसन्न होते हैं।
तदनन्तर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनियों तथा व्यासजीने नर्मदाके तटपर पितरोंका श्राद्ध किया। यहाँ श्राद्ध करनेसे पितृगण बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं।
वरांगना-नर्मदा-संगम तथा कपिलातीर्थका माहात्म्य, महाराज मनुकी त्रिपुरीयात्रा और नर्मदासे वरदान पाना
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! व्यासतीर्थके अतिरिक्त एक दूसरा परम पुण्यमय तीर्थ है जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ अश्वमेध यज्ञसे प्रकट हुई 'वरांगना' नदी बहती है। वहाँ नर्मदा और वरांगनाके संगममें स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है। स्त्री हो या पुरुष—सभी वहाँ स्नान करनेसे रोगमुक्त हो जाते हैं। त्रिपुरीके पूर्वभागमें दक्षिण-दिशाकी ओर सब लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान् शंकर विराजमान हैं। अतः विद्वान् पुरुष उसे 'शिवक्षेत्र' कहते हैं। सूर्य-ग्रहणके समय इस शिवक्षेत्रको कुरुक्षेत्रके समान बताया गया है। कुरुक्षेत्रमें पचासी तीर्थ हैं और यहाँ भी उतने ही हैं। इस क्षेत्रमें देवेश्वर भगवान् मधुसूदन भी उत्पलावर्त नामसे निवास करते हैं, जिनके सहस्रों मस्तक हैं। भगवान् श्रीहरि, महादेवजी और तीसरी नर्मदा नदी—ये तीनों इस क्षेत्रके परम आराध्य देवता हैं। राजन्! इन्द्र आदि देवता भी नर्मदा नदीकी महिमाका क्या वर्णन कर सकते हैं? वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता। उक्त स्थानमें देवदेव महादेवके पूजनसे मनुष्य गणपति-पदको प्राप्त होता है। उस तीर्थमें प्रकट हुए शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुकी ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओंद्वारा उपासना की जाती है। श्रीविष्णुके क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त हुए कीट-पतंग आदि भी हरिधामको चले जाते हैं। मनुष्य अपने वशमें हो या परवश, जो संगम-तीर्थमें प्राण-त्याग करता है, वह दस हजार वर्षोंतक विद्याधरलोकमें राजा होता है। युधिष्ठिर! जो यहाँ तिल और जलसे पितरोंका तर्पण और उन्हें पिण्डदान करता है, उसके पितर तृप्त होकर परम गतिको प्राप्त होते हैं। एकादशीको निराहार रहकर गन्ध और पुष्पोंसे भगवान् विष्णुका पूजन करे, रातमें जागकर दीप जलावे; फिर द्वादशीको पंचगव्य लेकर हविष्यान्नसे पारण करे। पारणके पूर्व ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणा दे। जो मनुष्य पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर उस क्षेत्रमें 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करता है, वह फिर गर्भमें नहीं आता और न उसका कभी जन्म ही होता है। वह अपने अनेक जन्मोंके भयंकर पापोंको उसी प्रकार तत्काल भस्म कर देता है, जैसे आग रूईके ढेर और सूखे काठको जला देती है।