संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९७७
पूर्वकालमें महादेवजीने सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह तथा समस्त देवताओंका हित करनेके लिये पवित्र जलके भवाँरमें अवतार लिया था। उस स्थानमें भगवान् शिवके अट्ठाईस स्वयंभू लिंग हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—१ स्थानेश्वर, २ महादेव, ३ शूलपाणि, ४ सप्तेश्वर, ५ कल्पेश्वर, ६ हिरण्य, ७ जातवेदः, ८ प्राजापत्य, ९ सिद्धनाथ, १० शशांकनायक, ११ अनुकेश, १२ स्कन्द, १३ आश्विन, १४ तैजस, १५ ब्रह्मेश्वर, १६ अग्नि-गर्भ, १७ श्रीकण्ठ, १८ उमापति, १९ नीलकण्ठ, २० खट्वांग, २१ महाकाल, २२ घटेश्वर, २३ त्रिलोचन, २४ त्र्यम्बक, २५ देवदेव, २६ महेश्वर, २७ अनंग और २८ कामदेव—ये तथा और भी बहुत-से सिद्ध लिंग वहाँ हैं।
महाभाग युधिष्ठिर! तदनन्तर नर्मदाके उत्तर तटपर परम उत्तम कपिलातीर्थ है जो सब पापोंको हरनेवाला है। पुरुष हों या स्त्रियाँ—यदि वे जितेन्द्रिय होकर उस तीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् देवताओं और पितरोंका तर्पण करते हैं, तो तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाते हैं। उस तीर्थमें ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है।
उसके बाद नर्मदाके उत्तर तटपर त्रिपुरी नामक विख्यात एक उत्तम तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। भारत! वहाँ सवा लाख तीर्थोंका निवास है। उस तीर्थमें एक सौ आठ स्वयंभू शिवलिंग विद्यमान हैं। यह वही स्थान है, जहाँ त्रिशूलधारी देवाधिदेव महादेवने त्रिपुरको मार गिराया था। यहाँ देवदेव महादेवके नाम-कीर्तनसे तथा नर्मदाजीके जलद्वारा उनका स्नान और पूजन करनेसे ब्रह्महत्या नष्ट हो जाती है। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा वैभव-विस्तारसे पूजन करनेपर जो पुण्य होता है, उसकी गणना सहस्रों वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती। भगवान् शिवके उद्देश्यसे जब दान किया जाता है, तब उस दानका पुण्य असंख्य हो जाता है। राजन्! वे मनुष्य धन्य हैं जो त्रिपुरीमें स्नान करके महादेवजीका दर्शन करते हैं। जो मानव त्रिपुरीमें निवास करता है, वह साक्षात् कैलाशमें निवास पाता है। जो इच्छा या अनिच्छासे भी त्रिपुरीमें प्राण-त्याग करता है, वह विमानद्वारा महादेवजीके परम धाममें जाकर वहाँके दिव्य विभवका उपभोग करता है। वहाँ देवेश्वर त्रिपुरारि शिव तैंतीस कोटि प्रसिद्ध देवताओंके साथ निवास करते हैं। इसलिये त्रिपुरी क्षेत्रको शिवक्षेत्र कहा गया है। उसकी लम्बाई-चौड़ाई दो कोसकी है। इस बीचमें जिनकी मृत्यु होती है, वे शुभ गतिको प्राप्त होते हैं।
यहीं सब सिद्धियोंको देनेवाले गोकर्ण, महादेव, वटेश्वर, सिद्धलिंग, सुरेश्वर, ईश्वर, कामेश्वर, अश्विनीकुमारेश्वर, अनंगेश्वर, वामदेव, कपोतेश्वर, सर्वेश्वर, सोमनाथ, ऋणमोचन, कपालमोचन, पापनाशन, इन्द्रेश्वर, ब्रह्मेश्वर, शिव, नारायण, भव, विश्वेदेव, सिद्धनाथ, अमरेश्वर, चान्द्रलिंग, सिद्धेश्वर, विद्याधरेश्वर, यज्ञेश्वर, तुलनारहित वासवेश्वर, ईशान, अग्निगर्भ, कुबेर, गायत्रलिंग, सावित्रलिंग तथा रोहिणीतीर्थ हैं। विष्णु, मरीचि, मैत्रेय, विभाण्डपुत्र ऋष्यशृंग, तपस्वी शौनक तथा उग्र तपस्वी दुर्वासा आदि पचास हजार सिद्ध त्रिपुरीमें निवास करते हैं। इस पुरीकी स्तुति सहस्रों वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती।
जिसमें कपिल मुनिका अवतार हुआ था, वह कालसंज्ञक स्वयंभू मन्वन्तर प्राप्त होनेपर अयोध्यापुरीमें महायशस्वी मनु नामक एक चक्रवर्ती राजा हुए थे। उनका जन्म सूर्यवंशमें हुआ था। उन्होंने भगवान् शंकर और विष्णुकी आराधना करके अयोध्यापुरी प्राप्त की थी। जैसे कुबेरकी अलकापुरी विख्यात है तथा जिस प्रकार इन्द्रकी अमरावतीपुरी बड़ी मनोहर है, अयोध्या भी वैसी ही शोभासम्पन्न थी। वहाँ रहकर महाराज मनु सात द्वीप, नौ खण्ड तथा पर्वत, वन और काननोंसहित समस्त पृथ्वीका पालन करते थे। एक दिन पूर्णिमाको एक पहर रात व्यतीत होनेके पश्चात् राजाके कानोंमें आकाशमें विचरनेवाले विमानोंकी क्षुद्रघण्टिकाका शब्द सुनायी पड़ा।