संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९७७
पूर्वकालमें महादेवजीने सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह तथा समस्त देवताओंका हित करनेके लिये पवित्र जलके भवाँरमें अवतार लिया था। उस स्थानमें भगवान् शिवके अट्ठाईस स्वयंभू लिंग हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—१ स्थानेश्वर, २ महादेव, ३ शूलपाणि, ४ सप्तेश्वर, ५ कल्पेश्वर, ६ हिरण्य, ७ जातवेदः, ८ प्राजापत्य, ९ सिद्धनाथ, १० शशांकनायक, ११ अनुकेश, १२ स्कन्द, १३ आश्विन, १४ तैजस, १५ ब्रह्मेश्वर, १६ अग्नि-गर्भ, १७ श्रीकण्ठ, १८ उमापति, १९ नीलकण्ठ, २० खट्वांग, २१ महाकाल, २२ घटेश्वर, २३ त्रिलोचन, २४ त्र्यम्बक, २५ देवदेव, २६ महेश्वर, २७ अनंग और २८ कामदेव—ये तथा और भी बहुत-से सिद्ध लिंग वहाँ हैं।
महाभाग युधिष्ठिर! तदनन्तर नर्मदाके उत्तर तटपर परम उत्तम कपिलातीर्थ है जो सब पापोंको हरनेवाला है। पुरुष हों या स्त्रियाँ—यदि वे जितेन्द्रिय होकर उस तीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् देवताओं और पितरोंका तर्पण करते हैं, तो तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाते हैं। उस तीर्थमें ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है।
उसके बाद नर्मदाके उत्तर तटपर त्रिपुरी नामक विख्यात एक उत्तम तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। भारत! वहाँ सवा लाख तीर्थोंका निवास है। उस तीर्थमें एक सौ आठ स्वयंभू शिवलिंग विद्यमान हैं। यह वही स्थान है, जहाँ त्रिशूलधारी देवाधिदेव महादेवने त्रिपुरको मार गिराया था। यहाँ देवदेव महादेवके नाम-कीर्तनसे तथा नर्मदाजीके जलद्वारा उनका स्नान और पूजन करनेसे ब्रह्महत्या नष्ट हो जाती है। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा वैभव-विस्तारसे पूजन करनेपर जो पुण्य होता है, उसकी गणना सहस्रों वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती। भगवान् शिवके उद्देश्यसे जब दान किया जाता है, तब उस दानका पुण्य असंख्य हो जाता है। राजन्! वे मनुष्य धन्य हैं जो त्रिपुरीमें स्नान करके महादेवजीका दर्शन करते हैं। जो मानव त्रिपुरीमें निवास करता है, वह साक्षात् कैलाशमें निवास पाता है। जो इच्छा या अनिच्छासे भी त्रिपुरीमें प्राण-त्याग करता है, वह विमानद्वारा महादेवजीके परम धाममें जाकर वहाँके दिव्य विभवका उपभोग करता है। वहाँ देवेश्वर त्रिपुरारि शिव तैंतीस कोटि प्रसिद्ध देवताओंके साथ निवास करते हैं। इसलिये त्रिपुरी क्षेत्रको शिवक्षेत्र कहा गया है। उसकी लम्बाई-चौड़ाई दो कोसकी है। इस बीचमें जिनकी मृत्यु होती है, वे शुभ गतिको प्राप्त होते हैं।
यहीं सब सिद्धियोंको देनेवाले गोकर्ण, महादेव, वटेश्वर, सिद्धलिंग, सुरेश्वर, ईश्वर, कामेश्वर, अश्विनीकुमारेश्वर, अनंगेश्वर, वामदेव, कपोतेश्वर, सर्वेश्वर, सोमनाथ, ऋणमोचन, कपालमोचन, पापनाशन, इन्द्रेश्वर, ब्रह्मेश्वर, शिव, नारायण, भव, विश्वेदेव, सिद्धनाथ, अमरेश्वर, चान्द्रलिंग, सिद्धेश्वर, विद्याधरेश्वर, यज्ञेश्वर, तुलनारहित वासवेश्वर, ईशान, अग्निगर्भ, कुबेर, गायत्रलिंग, सावित्रलिंग तथा रोहिणीतीर्थ हैं। विष्णु, मरीचि, मैत्रेय, विभाण्डपुत्र ऋष्यशृंग, तपस्वी शौनक तथा उग्र तपस्वी दुर्वासा आदि पचास हजार सिद्ध त्रिपुरीमें निवास करते हैं। इस पुरीकी स्तुति सहस्रों वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती।
जिसमें कपिल मुनिका अवतार हुआ था, वह कालसंज्ञक स्वयंभू मन्वन्तर प्राप्त होनेपर अयोध्यापुरीमें महायशस्वी मनु नामक एक चक्रवर्ती राजा हुए थे। उनका जन्म सूर्यवंशमें हुआ था। उन्होंने भगवान् शंकर और विष्णुकी आराधना करके अयोध्यापुरी प्राप्त की थी। जैसे कुबेरकी अलकापुरी विख्यात है तथा जिस प्रकार इन्द्रकी अमरावतीपुरी बड़ी मनोहर है, अयोध्या भी वैसी ही शोभासम्पन्न थी। वहाँ रहकर महाराज मनु सात द्वीप, नौ खण्ड तथा पर्वत, वन और काननोंसहित समस्त पृथ्वीका पालन करते थे। एक दिन पूर्णिमाको एक पहर रात व्यतीत होनेके पश्चात् राजाके कानोंमें आकाशमें विचरनेवाले विमानोंकी क्षुद्रघण्टिकाका शब्द सुनायी पड़ा।
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उनमें संगीत और वाद्यकी भी ध्वनि हो रही थी। वह सब देख-सुनकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे 'ये विमान किसके हैं, जो मेरे ही भवनके ऊपर खड़े हैं। यह कितना साहसपूर्ण कार्य है?' इस प्रकार सोच-विचारमें पड़े हुए राजाकी वह रात्रि व्यतीत हो गयी। सूर्योदय होनेपर नैत्यिक धर्म-कर्मका अनुष्ठान पूरा करके राजर्षि मनुने वसिष्ठ मुनिसे कहा—'महामुने! यह मेरे महलके ऊपर किसके विमान हैं तथा ये किस कर्मके फलसे या किस-किस दान और नियमके पालनसे प्राप्त होते हैं? क्षत्रियवंशमें उत्पन्न होकर जो पृथ्वीका शासन करता है, वह यज्ञोंका अनुष्ठान करके माता और पिताके कुलको स्वर्गलोकमें पहुँचाता है। वास्तवमें उसी राजाका जन्म लेना सार्थक है, जिसके शासनमें इस भूमण्डलपर किसी प्रकारका पापकर्म नहीं हो पाता। दूसरे लोग तो केवल माता-पिताको क्लेश देनेके लिये ही उनके पुत्ररूपसे जन्मग्रहण करते हैं।'
राजा मनुके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी बोले—महाभाग! पुराण और वेदोंसे बाहर जो कर्म किया जाता है, उसकी साधुपुरुष प्रशंसा नहीं करते; क्योंकि उसके द्वारा धर्मकी हानि होती है। नर्मदाके तटपर त्रिपुरी नामसे विख्यात एक तीर्थ है। वहाँ जिन लोगोंने यज्ञ, दान और होम आदि सत्कर्म किये हैं, उन्हींके विमान महलोंके ऊपर खड़े थे। महाराज! एकमात्र नर्मदादेवी ही ऐसी हैं, जिन्होंने समस्त पापियों और दुराचारियोंको स्वर्गलोकमें पहुँचाया है। संसार-समुद्रमें डूबे हुए पापसे दूषित चित्तवाले जीवोंको भी स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये यह नर्मदा नदी दिव्य विमानस्वरूप है। महाभाग! ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीको छोड़कर दूसरा कोई एक मुखवाला पुरुष नर्मदा नदीके पुण्योंका वर्णन नहीं कर सकता। नर्मदा तटपर किये हुए तप, दान और सत्कर्मोंके पुण्यकी कोई भी गणना नहीं कर सकता। जम्बूद्वीपमें जो-जो तीर्थ और समुद्र हैं, उनमेंसे कोई भी नर्मदा नदीकी समता नहीं कर सकते। पुण्यक्षेत्रमें किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है। यही बात धर्मके लिये भी है। वहाँ किया हुआ धर्म भी अक्षय होता है। यह जीवन चंचल है—क्षणभंगुर है। इसलिये मनुष्य कभी पाप न करे।
राजा मनुने नर्मदाके सुयशका वर्णन सुनकर अपने मन्त्रियों, सदस्यों तथा सेवकोंको आज्ञा दी—तुम सब लोग राजकीय सामग्री लेकर शीघ्र ही नर्मदाकी यात्रा करो, विलम्ब नहीं होना चाहिये।
तदनन्तर राजा वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके साथ देव दानववन्दित त्रिपुरी पुरीको गये। वहाँ रानियों तथा समस्त परिवारके साथ नर्मदाजीके जलका दर्शन करके वे जन्मभरके पापोंसे मुक्त हो गये। उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् राजाने चन्दन और पुष्प आदिसे महादेवजीकी पूजा की और नर्मदाके तटपर दस योजनका विशाल यज्ञमण्डप निर्माण कराया। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, यज्ञकर्ममें कुशल, चारों विद्याओंके ज्ञाता तथा वेदज्ञ महर्षि एवं ब्राह्मण उस यज्ञके लिये निमन्त्रित किये गये। जैसे पुष्करतीर्थ ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवताओंका स्वरूप है, उसी प्रकार यह त्रिपुरीतीर्थ भी है। वहाँ राजाने परमोत्तम अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ किया। उस यज्ञमें सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया गया। देवराज इन्द्र भी पधारे थे। मनुने अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क और विष्टर आदि देकर सबको सन्तुष्ट किया। वेदोक्त विधिके अनुसार यज्ञका कार्य पूर्ण हुआ। ब्राह्मणोंको वैभवके अनुसार दक्षिणा देकर प्रसन्न किया गया। देवता, पितर और मनुष्य सभी तृप्त होकर परम गतिको प्राप्त हो गये। ब्रह्मा, विष्णु और शिव राजाको वरदान देकर अपने-अपने लोकमें गये। इस तीर्थमें किया हुआ तप और दान सब कुछ अक्षय होता है।
इस प्रकार महातेजस्वी महाराज मनुका यज्ञ जब पूरा हो गया तब उन्होंने हाथ जोड़कर नर्मदासे कहा—देवि! केवल सहस्रों चान्द्रायण और सैकड़ों
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सोमयागका जो फल है, वह तुम्हारे जलका पान करनेमात्रसे होनेवाले पुण्यकी समता नहीं कर सकता। तुमने सम्पूर्ण जगत्को तथा समस्त चराचर जीवोंको व्याप्त कर रखा है। जैसे आग रूईके ढेरको जला देती है, उसी प्रकार तुम्हारा जल स्नान, अवगाहन, पान, स्मरण और कीर्तन करनेसे मनुष्यके अनेक जन्मोंकी पापराशिको भस्म कर देता है। देवि! तुम पितरोंके हितकी कामनासे स्वर्गकी सीढ़ी बनकर आयी हो। चारों प्रकारके जीवोंको स्वर्गलोकमें पहुँचाओ। नर्मदे! लोकमें जो कोई भी नदियाँ और नाना प्रकारके तीर्थ हैं, उन सबकी जननी तुम्हीं हो। तुम पितरोंका उद्धार करनेवाली पराशक्ति हो। जैसे सूर्य और चन्द्रमाका प्रभाव सब जीवोंपर समानरूपसे पड़ता है, जैसे बादल अन्नके पौधों और घासोंपर समानरूपसे जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम सम्पूर्ण विश्वपर समानरूपसे स्नेह रखनेवाली गौरवमयी माता हो। शुभे! ब्रह्मा और बृहस्पतिजी सहस्रों वर्षोंतक लगे रहनेपर भी तुम्हारे गुणोंका पूर्णतया वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं।
अमिततेजस्वी मनुके द्वारा किये हुए इस स्तवनको सुनकर परम सौभाग्यशालिनी नर्मदादेवी बोलीं—महाभाग! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो। तब महादेवी नर्मदाको नमस्कार करके राजाने कहा—'देवि! तुम सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करो और अयोध्या प्रदेशमें अनेक नदियाँ प्रकट हो जायँ। देवलोकमें गंगा आदि अनेकों सरिताएँ बहती हैं, ऐसा सुना जाता है। वे सब इस भूलोकमें भी जिस प्रकार उतर आवें, वैसा उपाय करो।'
नर्मदा बोलीं—नृपश्रेष्ठ! त्रेताके प्रथम भागमें तुम्हारे कुलमें भगीरथ नामसे विख्यात एक राजा होंगे। वे इस लोकमें गंगाजीको लावेंगे। त्रेताके द्वितीय भागमें इस भारतवर्षके भीतर कालिन्दी, सरस्वती, सरयू तथा महाभागा गण्डकी आदि नदियाँ भी प्रकट हो जायेंगी। तुम्हारे वंशमें उत्पन्न भगीरथके ही नामपर सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजी 'भागीरथी' कहलायेंगी। भागीरथीके ही समान उनका दूसरा नाम 'जाह्नवी' भी होगा। उक्त सभी नदियाँ कन्या-द्वीपमें प्रसिद्धिको प्राप्त होंगी।
भृगुतीर्थ और भास्करतीर्थका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! त्रिपुरी क्षेत्रमें ही मर्कटीतीर्थ है और मर्कटीतीर्थके पूर्वभागमें परम उत्तम भृगुतीर्थ स्थित है। कार्तिककी पूर्णिमाको इस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। वहीं नरकेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव हैं, जो स्वर्ग और मोक्ष देनेवाले हैं। उनके आगे बाँसका वृक्ष दिखायी देता है। उसके पूर्वभागमें त्रिलोचन नामक महादेवजी विराजमान हैं। उनके ललाटमें स्थित तृतीय नेत्रका दर्शन करके मुनिश्रेष्ठ भृगुने पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम किया और इस प्रकार उनकी स्तुति की।
भृगु बोले—जो सब जीवोंके भीतर उनके आत्मारूपसे विराजमान हैं, समस्त भूतोंके ईश्वर हैं, कल्याण एवं ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले हैं, सबका पाप हर लेनेके कारण जिन्हें हर कहते हैं, जो कल्याणस्वरूप, तेजस्वरूप, पशुपति एवं अखिल विश्वके स्वामी हैं, जिनमें दोषमात्रका सर्वथा अभाव है तथा जो नित्य विज्ञानानन्दस्वरूप हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। प्रभो! मैं दूसरोंका तिरस्कार करनेके पापसे पराजित हूँ। मेरी उस पापसे रक्षा कीजिये। परमेश्वर! इस क्षणभंगुर शरीरके प्रति मेरे मनमें आत्माभिमानका उदय हो गया है—मैं देहको ही आत्मा मानने लगा हूँ। अतएव कुमार्गकी ओर दृष्टि रखनेवाले मुझ दीनकी आप रक्षा करें। प्रभो! मुझ दीन ब्राह्मणको ज्ञान देनेके लिये उद्यत होइये। आप तो
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सदा सबका कल्याण करनेवाले हैं, फिर मुझे मूढ़ देखकर भी (ज्ञानदानमें) विलम्ब क्यों करते हैं? हर! आप मेरी बढ़ी हुई तृष्णाको हर लें और मुझे स्थिर रहनेवाली लक्ष्मी प्रदान करें। महेश्वर! आपके तीर्थोंमें जानेमात्रसे जो पुण्य होता है, वह सदा ही मोहका उच्छेद, पापोंका विनाश और संसार-सागरसे उद्धार करता है, परंतु मुझ भाग्यहीनने उस पुण्यका संचय भी नहीं किया है।
महर्षि भृगुके द्वारा कहे हुए इस 'करुणाहृदय' नामक स्तोत्रका जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। इस स्तोत्रसे सन्तुष्ट होकर भगवान् शिवने भृगुसे कहा—'विप्रवर! तुम्हारे मनमें जिस-जिस वरकी अभिलाषा है, वह सब मैं तुझे दूँगा। साथ ही तुम्हें देवदुर्लभ उत्तम सिद्धि भी प्रदान करूँगा।'
भृगुने कहा—देवेश्वर! यदि आप सन्तुष्ट हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो पृथ्वीपर मेरे ही नामसे इस तीर्थकी प्रसिद्धि हो। महेश्वर! मेरी दूसरी प्रार्थना यह है कि आप अपनेको उस भृगुक्षेत्रमें अवतरित करें, यहाँ सदा ही आपकी स्थिति बनी रहे।
भगवान् शंकर बोले—विप्रवर! ऐसा ही हो। तुम्हारे ही नामसे इस क्षेत्रकी ख्याति होगी।
युधिष्ठिर! इस भृगुक्षेत्रमें आठ रुद्र बताये गये हैं—भृगु, शूली, वेद, चन्द्र, मुख, अट्टहास, काल तथा कराली। इन सबके कारण भृगुक्षेत्र बहुत ही मनोरम और धन्य-धन्य हो गया है। अयन, विषुव, संक्रान्ति, ग्रहण, व्यतीपात, दिनक्षय और गजच्छाया आदि योगोंमें इस तीर्थके भीतर जो स्नान, दान, होम, तर्पण और देवपूजन आदि सत्कर्म किये जाते हैं, वे सब अक्षय होते हैं। जो भृगुक्षेत्रमें स्नान करके वहाँ एक रात्रि निवास करता है, उसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह सैकड़ों यज्ञोंद्वारा भी उपलब्ध होनेवाला नहीं है। संयमी मनुष्य भृगुतीर्थकी प्रदक्षिणा करके तत्काल विशुद्ध होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस तीर्थके माहात्म्यसे मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
प्राचीन कालमें मोहन नामसे प्रसिद्ध एक गन्धर्वराज था। वह ब्रह्माजीकी सभामें स्थित होकर सदा उनकी आराधनामें तत्पर रहता था। एक दिन महर्षि दुर्वासाको वहाँ उपस्थित देख उसने उनकी हँसी उड़ायी। यह देख मुनिने शाप दिया, 'अरे! तुझे अपने सुन्दर रूपका बड़ा अभिमान है, तू जा चित्रकुष्ठ (चितकबरी कोढ़)-से पीड़ित रह।' उस शापसे भयभीत होकर गन्धर्वराजने मुनिसे कहा—'विप्रवर! मुझ अज्ञानीपर प्रसन्न होकर आप अपने शापका अन्त कीजिये।'
दुर्वासा बोले—गन्धर्वराज! तू त्रिपुरीमें नर्मदाके तटपर जा। वहाँ समस्त भयोंका नाश करनेवाले साक्षात् भगवान् सूर्य निवास करते हैं। नर्मदाके उत्तर तटपर उनका स्थान भास्करतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। उसमें स्नान करनेसे तुमपर लगा हुआ शाप निवृत्त हो जायगा।
तब वह गन्धर्वराज दुर्वासामुनिको प्रणाम करके नर्मदातटपर गया। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उसने भगवान् भास्करकी आराधना की। तीन राततक आराधना होनेपर चौथे दिन प्रातःकाल भगवान् सूर्यने कहा—'महाभाग! तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।' गन्धर्वने कहा—'देवेश्वर! आपके प्रसादसे मेरा यह चित्रकुष्ठ निवृत्त हो जाय।' भगवान् सूर्य बोले—'एवमस्तु।' तदनन्तर वह शापसे मुक्त होकर अपने लोकको चला गया।
युधिष्ठिर! भास्करतीर्थमें पुत्रकी कामनासे सावित्री-देवीकी आराधना की जाती है। यहाँ स्नान करके सूर्यदेवका पूजन करनेसे मनुष्य पुत्रवान् एवं रोगमुक्त होता है। वहीं दक्षिणभागमें कोटीश्वर महादेव हैं। उनका विधिपूर्वक पूजन करनेसे मनुष्य कोटि लिंगोंकी पूजाका फल पा लेता है। जो स्वाधीन अथवा पराधीन होकर भी वहाँ प्राणोंका त्याग करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
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सोमतीर्थ, ब्रह्मकुण्ड, ब्रह्मेश्वर लिंग, सिद्धेश्वर लिंग तथा संगमतीर्थकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! कोटितीर्थके दक्षिण भागमें नर्मदाके तटपर ही सोमतीर्थ है, जो भगवान् सोम (चन्द्रमा)-द्वारा आराधित है। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु होती है, वे फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते हैं। सोमदेवके दक्षिण भागमें शक्रेश्वर महादेव विराजमान हैं। पूर्वकालमें इन्द्रने वहाँ सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये भगवान् शिवकी आराधना की थी। वहीं ब्रह्मकुण्ड नामसे प्रसिद्ध एक दूसरा तीर्थ है जहाँ नर्मदा नदीकी धारा उत्तरकी ओर बहती है और जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु निवास करते हैं। महाराज! वहाँ स्नान करके मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है। अमावास्या तथा व्यतिपात योगमें वहाँ तिल और जलकी अंजलि देने तथा श्राद्ध करनेसे पितरोंको अक्षय तृप्ति होती है। नृपश्रेष्ठ! जहाँ उत्तरवाहिनी नर्मदा, पश्चिमवाहिनी गंगा और पूर्ववाहिनी सरस्वती प्राप्त हों, उस क्षेत्रकी अवश्य यात्रा करो। ब्रह्मकुण्डके उत्तर भागमें सनातनदेव लक्ष्मीपति भगवान् मधुसूदन अम्बरीषके नामसे विख्यात हैं। राजन्! जो एकादशीको वहाँ स्नान करके भगवान्की पूजा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। उसीके पश्चिम भागमें हंसतीर्थ है। वहाँ भी स्नान करके जो श्राद्ध और दान करता है, वह हंसतीर्थके प्रभावसे तिर्यग्योनि (पशु-पक्षियोंकी योनि)-में नहीं जन्म लेता। उसके पश्चिम भागमें महाकाल नामसे प्रसिद्ध शिवलिंग है, जिसकी विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य भगवान् शिवके लोकमें जाता है। वहीं मातृतीर्थ नामसे प्रसिद्ध जो पुण्यस्थान है, उसमें मातृकेश्वर लिंग प्रतिष्ठित है। वहाँ स्नान करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। सप्तविंशोद्भवतीर्थमें स्नान करके पितरोंको जल और पिण्ड देनेसे मनुष्य समस्त मनोवांछित कामनाओंसे सम्पन्न होकर भगवान् शिवके लोकमें सम्मानित होता है। वहाँसे पश्चिम ब्रह्मेश्वर लिंग है, जिसकी आराधना साक्षात् ब्रह्माजीने की है। वह शीघ्र ही समस्त कामनाओंके अनुसार फल देनेवाला है। ब्रह्मेश्वरदेवके दर्शनसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। मंगल और चतुर्दशीको विधिपूर्वक उनकी पूजा करके शिवभक्तिमें तत्पर रहनेवाला मानव शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। उससे पश्चिम भागमें सिद्धेश्वर नामक प्रसिद्ध शिवलिंग है। उसीके समीप सब पापोंका नाश करनेवाला सिद्धेश्वर तीर्थ है। वहाँ स्नान करनेसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है और जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका फिर संसारमें जन्म नहीं होता। पौषमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको विधिपूर्वक उनकी पूजा करके मनुष्य स्वर्गलोकमें आदर पाता है।
उससे उत्तर भागमें विश्वविख्यात संगमतीर्थ है। वहाँ गंगा, यमुना और नर्मदाका नित्य संगम जानना चाहिये। महाराज! उसमें स्नान करनेवालेको अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। उस तीर्थमें पितरोंका श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। वह उनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला होता है।
**राजाने पूछा—**मुनिश्रेष्ठ! इस तीर्थमें गंगा और यमुना कैसे आयीं, यह प्रसंग विस्तारपूर्वक बतलाइये।
**मार्कण्डेयजी बोले—**राजन्! त्रिपुरीमें मतंग नामसे प्रसिद्ध एक धर्मपरायण राजर्षि रहते थे। वे भगवान् शिवके भक्त, महान् योगी और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे। एक दिन तपस्वी मतंग मुनिके समीप उसी मार्गसे जाते हुए सप्तर्षिगण आये। उन्होंने उन ऋषियोंको नमस्कार करके अर्घ्य और पाद्य आदिके द्वारा उन सबकी पूजा की। जब वे सब लोग कुशासनपर विराजमान हो गये, तब मतंग मुनि विनयपूर्वक बोले—‘महर्षियो! आज मैं धन्य हो गया; क्योंकि आज मेरे यहाँ श्राद्धके दिन आप-जैसे महात्मा ब्राह्मण पधारे हैं।'
९८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
महामुनि मतंगका यह वचन सुनकर वसिष्ठजी बोले—महर्षे ! हमलोग तो गंगा-यमुनाके संगममें स्नान करके ही भोजन करेंगे। तब मतंगजीने हँसकर कहा—'अच्छा, आज यहीं गंगा-यमुनाके संगममें आपलोगोंका स्नान होगा।' ऐसा कहकर मुनिने ध्यानमें स्थित होकर गंगा-यमुनाका आवाहन किया। उनके आवाहनसे गंगा और यमुना दोनों नदियाँ तत्काल वहाँ चली आयीं। तब मतंगजीने कहा—'मुनिवरो ! अब आपलोग गंगा-यमुनाके संगममें स्नान करें।' सप्तर्षि महात्मा मतंगका यह अद्भुत कर्म देखकर मन-ही-मन बड़े विस्मित हुए। तदनन्तर उन मुनीश्वरोंने विधिपूर्वक स्नान किया और मतंग मुनिका पितृ-यज्ञ सम्पन्न कराकर स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। गंगा और यमुना दोनों ही नर्मदामें समा गयीं। इस प्रकार वहाँ सब पापोंका नाश करनेवाला श्रेष्ठ संगमतीर्थ प्रकट हुआ। जो मनुष्य सब धर्मोंसे सम्पन्न और शिवभक्तिमें तत्पर होकर सोमवती अमावास्याके दिन संगमतीर्थमें स्नान करता है, वह पहले और पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंका उद्धार करके तत्काल विशुद्ध होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। उसे सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। जो क्रोध और इन्द्रियोंको जीतकर लगातार छह महीनेतक प्रतिदिन वहाँ स्नान और महेश्वरकी पूजा करता है, वह किसी कारणसे यदि कभी म्लेच्छदेशमें या जहाँ कहीं भी मृत्युको प्राप्त हो जाय, अन्तमें भगवान् शिवके समीप ही जाता है।
धुवेश्वर, वाराह, चान्द्रायण, द्वादशादित्य तथा गांजालतीर्थकी महिमा, राजा हरिकेशकी शुद्धि
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! जो मानव ध्रुवतीर्थमें स्नान करके ध्रुवेश्वर महादेवजीका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह शुभ विद्याधरलोकमें एक लाख वर्षोंतक राजाके पदपर प्रतिष्ठित होता है। नर्मदातटपर एक नाक्षत्र नामक तीर्थ है, जहाँ सब पापोंका नाश करनेवाले ऋक्षेश्वर महादेव प्रतिष्ठित हैं। वहाँ सत्ताईस नक्षत्र सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। उस तीर्थमें स्नान करके लोग स्वर्गमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु होती है, वे फिर जन्म न लेकर मुक्त हो जाते हैं।
तदनन्तर 'वाराह' नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जहाँ कल्याणदायिनी नर्मदा 'शूकरा' कहलाती हैं। वहाँ एकादशी तिथिको स्नान करके शास्त्रोक्त दानादि सत्कर्म करनेके पश्चात् जो विष्णुपरायण व्रती पुरुष द्वादशीको शुद्ध भावसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदिके द्वारा भगवान् वाराहकी पूजा करता है, वह भगवान् विष्णुके वैकुण्ठधाममें सदा आनन्द भोगता है। जो ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए क्रोधको जीतकर वैष्णवधर्ममें तत्पर हो भक्तिपूर्वक वैष्णव ब्राह्मणोंको भोजन कराता है तथा विष्णुधर्म लिखवाकर श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको निवेदन करता है, उसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों देवता वर देते हैं। विद्यादानसे बड़ा और कोई दान नहीं है। उसके प्रभावसे दाताको सब फल प्राप्त हो जाता है।
तदनन्तर चान्द्रायण नामक एक उत्तम तीर्थ है। पूर्णिमा तिथिको जब चन्द्रमाका रोहिणी नक्षत्रसे योग हो, तब उस महोत्सवकी वेलामें सब सिद्धियोंको देनेवाले भगवान् चन्द्रभूषणकी पूजा करके मानव स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो परम धर्मात्मा पुत्र पूर्णिमा तथा सूर्यग्रहणके अवसरपर पितरोंके लिये तिल और जलकी अंजलि अथवा पिण्डदान देता है, उसके पापात्मा पितर भी तृप्त हो जाते हैं।
वहीं द्वादशादित्यतीर्थ है। वह उत्तरायण कालमें पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। राजन्! वहाँ संक्रान्तिकाल और विषुवयोगमें स्नान एवं सूर्यदेवका
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९८३
पूजन करके मनुष्य सूर्यलोकमें सम्मानित होता है। उत्तर दिशामें शंकर नामक शिवलिंग बताया गया है। जो अमावास्यामें भगवान् शंकरका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। उसके बाद विश्वविख्यात संगमतीर्थ है, जहाँ नर्मदाके साथ दत्तात्रेया नदी मिली हुई है। वह उत्तरकी ओरसे आकर मिलती है। देवता और दैत्य सभी दत्तात्रेया नदीको मस्तक झुकाते हैं। वहाँ संगममें स्नान, दान और भगवान् विष्णुका पूजन करके मनुष्य श्रीहरिके लोकमें जाते हैं। मेधातिथि, कर, स्कन्द, सावार्णि, कौशिक, मनु, काश्यप, गालव तथा तपोनिधि मैत्रेय—ये और दूसरे भी उत्तम व्रतका पालन करनेवाले बहुत-से महर्षि इस तीर्थके प्रभावसे उत्तम सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं।
चन्द्रवंशमें सत्यधर्मपरायण देवानीक नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम हरिकेश रखा गया। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न महान् बलवान् चक्रवर्ती राजा हुआ। महात्मा हरिकेशने अनेक यज्ञ किये। उनकी राजधानी कन्यापुरमें थी, जो कुबेरकी अलकाके समान शोभा पाती थी। कन्यापुरकी समस्त प्रजा दीर्घायु और धन-धान्यसे सम्पन्न थी। श्रीशैल नामक पर्वतपर त्रिपुरारेके समीप तुंगभद्रा नामवाली एक नदी है जो मल्लिकार्जुनके दर्शनसे पाताल-गंगा कही गयी है। उस पुण्यतीर्थमें प्रतापी हरिकेशने सूर्यग्रहणके समय एक लाख गौ और एक सहस्र स्वर्णमुद्राकी व्यवस्था की। फिर सूर्यग्रहणसे पाँच दिन पूर्व उन्होंने वेदोंके विद्वान् एवं बहुश्रुत ब्राह्मणोंको बुलवाया। वे ग्रहणके समय इन सब गौओंका दान करना चाहते थे। ग्रहणसे पूर्व उन्होंने आग्नेयी इष्टि प्रारम्भ कर दी। दैवयोगसे उनके आहवनीय अग्निमें अत्यन्त तेजस्वी रुद्र देवतासम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा आहुति डाली गयी। उस समय पातालसे प्रलयकालके समान प्रज्वलित अग्नि प्रकट हुई, जिसने वहाँके दस हजार ब्रह्मचारियों और एक लाख गौओंको जलाकर भस्म कर दिया। वहाँका यज्ञमण्डप और नगर भी भस्मसात् हो गया। यह सब देखकर हरिकेशके मनमें बड़ा विषाद हुआ। वे अग्निमें समा जानेके लिये अपनी रानियों और समस्त मन्त्रियोंके साथ आसनसे उठकर खड़े हो गये। उस समय सब ओर बड़ा हाहाकार मचा। तब एक ब्राह्मणने कहा—‘महाभाग ! तुम श्रेष्ठ नगर कल्पग्राममें चले जाओ।’
राजा हरिकेश वहाँ जाकर मुनियोंकी आज्ञा पाकर तत्पश्चात् सोमयज्ञ करनेके लिये कुरुक्षेत्रको गये और वहाँ सरस्वती नदीकी शरण ली। वहाँ पहुँचकर उन्होंने शिव, विष्णु और सरस्वतीका स्तोत्र एवं जप किया। वे बोले—‘मैं कुरुक्षेत्रको जाऊँगा और कुरुक्षेत्रमें ही निवास करूँगा। कुरुक्षेत्रका नाम लेनेसे भी मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। सम्पूर्ण शब्दरूपी महौषधोंसे जिन्होंने समस्त जीवोंके कलंकको धो डाला है, जिनके तीर्थोंका मुनिगण सेवन करते हैं, वे सरस्वती-देवी मेरे पापोंका नाश करें।’
राजाका यह वचन सुनकर पापोंका अपहरण करनेवाली सरस्वतीने कहा—राजन् ! विषाद छोड़ो और मेरा श्रेष्ठ वचन सुनो। तुम्हारे यज्ञमें दस हजार ब्रह्महत्या तथा एक लाख गो-हत्या हुई है। इतने महान् पापसे छुटकारा दिलानेमें इस चराचर जगत्के भीतर एकमात्र नर्मदा नदी ही समर्थ है। नर्मदा समस्त पापोंका नाश करनेवाली है। मैं सूर्यग्रहणके अवसरपर बारहवें या चौबीसवें वर्ष सदैव नर्मदाके कोटितीर्थमें स्नान करनेके लिये जाया करती थी। इससे मैं भी परम शुद्ध हो गयी हूँ। नृपश्रेष्ठ ! नर्मदामें स्नान और शिवका पूजन करके एक श्रेष्ठ यज्ञ करो और उसमें बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा दो। उससे तुम्हारा उद्धार हो जायगा। जो ब्राह्मण और गौएँ वहाँ मृत्युको प्राप्त हुई हैं, उनकी हड्डियोंको ले जाकर नर्मदाजीके जलमें बहा दो। उस जलका स्पर्श होनेसे उन सबको देवलोककी प्राप्ति हो जायगी और नर्मदाके
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जल एवं तिलकी अंजलि देनेसे उन सबकी उत्तम मुक्ति हो जायगी।
सरस्वतीका यह वचन सुनकर राजाने उनको प्रणाम किया और रानियों तथा परिवारके साथ प्रसन्नतापूर्वक कन्यापुरमें लौट आये। वहाँ जाकर राजाने सेवकोंको आज्ञा दी कि 'तुम सब लोग सब आवश्यक सामान एकत्र करके यज्ञकी सामग्री भी साथ लेकर नर्मदा नदीके तटपर चलो।' यह आदेश पाकर सेवकोंने अन्य सामानोंके साथ-साथ उचित रीतिसे उन ब्राह्मणों और गौओंका अस्थिभस्म भी वहाँ पहुँचा दिया। तदनन्तर वह अस्थिभस्म आदि नर्मदाके जलमें मन्त्रोच्चारणपूर्वक बहा दिया गया और उत्तम विधिसे पूजन करके हाथ जोड़े हुए राजाने देवताओं और ब्राह्मणोंको तृप्त किया। उस स्थानपर एक स्रोत प्रकट होकर नर्मदाके जलमें जा मिला। वह नर्मदासंगम 'गांजाल' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। जहाँ गांजाल है, वहीं एक सिद्ध लिंग भी है। जो ब्राह्मण और गौ उस प्रलयाग्निद्वारा दग्ध हुए थे, वे दिव्य विमानपर आरूढ़ हो आशीर्वाद देते हुए हरिकेशकी प्रशंसा करने लगे—'महाभाग! तुम्हारे प्रसादसे हम सब लोग दिव्यलोकमें देवभावको प्राप्त हो गये।' ऐसा कहकर वे सभी विष्णुधाममें चले गये।
राजाओंमें श्रेष्ठ हरिकेश भी अत्यन्त प्रसन्नताके साथ लोकपावनी नर्मदादेवीको नमस्कार करके एकाग्रचित्त हो उनकी स्तुति करने लगे—सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदे! आपको नमस्कार है। आपके जलमें जहाँ कहीं भी स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है, इस घोर संसार-सागरमें फिर उसका जन्म नहीं होता। कोई भी बलवान् सहस्रों जन्मोंमें भी आपके वेगको रोक नहीं सकता। आपने सम्पूर्ण चराचर विश्वको अपने जलसे व्याप्त कर रखा है। महादेवि! आपके ही प्रसादसे मनुष्यकी इस भवसागरसे मुक्ति होती है।
राजाका यह स्तोत्र सुनकर नर्मदादेवीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और इस प्रकार कहा—महाभाग! तुम अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो। हरिकेशने कहा—'देवि! आप मुझे पवित्र कर दें। आपके जलमें स्नान, अवगाहन, पान तथा आपके नामका स्मरण एवं कीर्तन करनेसे तत्काल ही सात जन्मोंके किये हुए पाप नष्ट हो जायँ।' नर्मदा बोलीं—'नृपश्रेष्ठ! 'एवमस्तु'। ऐसा कहकर नर्मदा देवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं।
तदनन्तर चक्रवर्ती राजा हरिकेशने साष्टांग प्रणाम करके इच्छानुसार चलनेवाले रथपर आरूढ़ हो अपने नगरमें प्रवेश किया। वहाँ अन्तःपुर एवं परिवारके साथ उन्होंने प्रचुर भोगोंका उपभोग किया और अन्तकाल आनेपर वे देवलोकको प्राप्त हुए।
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नर्मदा और मत्स्याके संगमका माहात्म्य, महर्षि आपस्तम्बके द्वारा गौओंकी महत्ताका प्रतिपादन तथा तीर्थके प्रभावसे निषादोंका मछलियोंसहित उद्धार
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! पूर्वकालमें आपस्तम्ब नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि हो गये हैं, जो ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ एवं उपवासव्रतमें तत्पर रहनेवाले थे। उन्होंने काम, क्रोध, लोभ और मोहको सदाके लिये त्यागकर नर्मदा और मत्स्याके संगमके जलमें प्रवेश किया था। जलके भँवरमें बैठे हुए महातपस्वी आपस्तम्बको मल्लाहोंने मछलियोंसहित जाल उठाते समय जलके बाहर खींच लिया। उन्हें इस दशामें देखकर वे निषाद भयसे व्याकुल हो उठे और मुनिके चरणोंमें प्रणाम करके इस प्रकार बोले—'ब्रह्मन्! हमने अनजानमें बड़े भारी अपराध कर डाले हैं, आप उन्हें क्षमा करें। इसके सिवा इस समय आपका प्रिय कार्य क्या है, उसके लिये आज्ञा दें।'
मुनिने देखा कि इन मल्लाहोंद्वारा यहाँकी मछलियोंका बड़ा भारी संहार हो रहा है। यह
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देखकर उनका हृदय करुणासे भर आया। वे दुःखी होकर बोले—'भेददृष्टि रखनेवाले जीवोंके द्वारा दुःखमें डाले हुए प्राणियोंकी ओर जो अपने सुखकी इच्छासे ध्यान नहीं देता, उससे बढ़कर क्रूर इस संसारमें दूसरा कौन है। अहो, स्वस्थ प्राणियोंके प्रति यह निर्दयतापूर्ण अत्याचार तथा स्वार्थके लिये उनका व्यर्थ बलिदान—कैसे आश्चर्यकी बात है? ज्ञानियोंमें भी जो केवल अपने ही हितमें तत्पर है, वह श्रेष्ठ नहीं है; क्योंकि यदि ज्ञानी पुरुष भी अपने स्वार्थका आश्रय लेकर ध्यानमें स्थित होते हैं तो इस जगत्के दुःखातुर प्राणी किसकी शरणमें जायँगे। जो मनुष्य स्वयं अकेला ही सुख भोगना चाहता है, उसे मुमुक्षु पुरुष पापीसे भी महापापी बताते हैं। मेरे लिये वह कौन-सा उपाय है, जिससे मैं दुःखित चित्तवाले सम्पूर्ण जीवोंके भीतर प्रवेश करके अकेला ही सबके दुःखोंको भोगता रहूँ। मेरे पास जो कुछ भी पुण्य है, वह सभी दीन-दुःखियोंके पास चला जाय और उन्होंने जो कुछ पाप किया हो, वह सब मेरे पास आ जाय। इन दरिद्र, विकलांग तथा रोगी प्राणियोंको देखकर जिसके हृदयमें दया नहीं उत्पन्न होती, वह मेरे विचारसे मनुष्य नहीं, राक्षस है। जो समर्थ होकर भी प्राण-संकटमें पड़े हुए भयविह्वल प्राणियोंकी रक्षा नहीं करता, वह उसके पापको भोगता है। अतः मैं इन दीन-दुःखी मछलियोंको दुःखसे मुक्त करनेका कार्य छोड़कर मुक्तिको भी वरण करना नहीं चाहता, फिर स्वर्गलोककी तो बात ही क्या है?'
मुनिका यह वचन सुनकर मल्लाहलोग बहुत घबराये। उन्होंने महाराज नाभागके पास जाकर सब बातें यथार्थरूपसे बतलायीं। नाभाग भी वह वृत्तान्त सुनकर अपने मन्त्रियों तथा पुरोहितोंके साथ मुनिका दर्शन करनेके लिये तुरंत ही वहाँ आये। राजाने उन देवकल्प महर्षिका भलीभाँति पूजन करके कहा—'भगवन्! आज्ञा दीजिये, मैं आपकी कौन-सी सेवा करूँ?'
आपस्तम्ब बोले—राजन्! ये मल्लाह बड़े दुःखसे जीविका निर्वाह करते हैं। इन्होंने मुझे जलसे बाहर निकालकर बड़ा भारी परिश्रम किया है। अतः तुम मेरा जो उचित मूल्य समझो, वह इन्हें दे दो।
नाभाग बोले—भगवन्! मैं इन निषादोंको आपके बदलेमें एक लाख स्वर्णमुद्रा देता हूँ।
आपस्तम्बने कहा—राजन्! मेरा मूल्य एक लाख ही नियत करना उचित नहीं है। मेरे योग्य जो मूल्य हो, वह इन्हें अर्पण करो। इस सम्बन्धमें अपने मन्त्रियोंके साथ विचार कर लो।
नाभाग बोले—द्विजश्रेष्ठ! यदि पूर्वोक्त मूल्य उचित नहीं है तो इन निषादोंको एक करोड़ दे दिया जाय और यदि यह भी आपके योग्य न हो तो आज्ञा होनेपर और अधिक भी दिया जा सकता है।
आपस्तम्ब बोले—राजन्! मैं एक करोड़ या इससे अधिक मूल्यके योग्य नहीं हूँ। मेरे योग्य मूल्य चुकाओ। ब्राह्मणोंसे सलाह ले लो।
राजाने कहा—यदि ऐसी बात है तो मेरा आधा या पूरा राज्य इन निषादोंको दे दिया जाय। मेरे मतमें यह मूल्य आपके योग्य होगा। किंतु आप किस मूल्यको पर्याप्त मानते हैं, यह स्वयं बतानेकी कृपा करें।
आपस्तम्ब बोले—राजन्! तुम्हारा आधा या पूरा राज्य भी मेरे लिये उचित मूल्य नहीं है। मूल्य वह दो, जो मेरे योग्य हो। (समझमें न आता हो तो) ऋषियोंके साथ विचार कर लो।
महर्षिका यह वचन सुनकर मन्त्रियों और पुरोहितोंके साथ विचार-विमर्श करते हुए धर्मात्मा राजा नाभाग बड़ी चिन्तामें पड़ गये। इसी समय महातपस्वी लोमश ऋषि वहाँ आ गये। उन्होंने नाभागसे कहा—'राजन्! भय न करो। मैं मुनिको सन्तुष्ट कर लूँगा।'
राजा बोले—महाभाग! आप ही इनका मूल्य बता दें। अन्यथा ये महर्षि क्रोधमें आकर मेरे कुटुम्ब, कुल, बन्धु-बान्धव तथा समस्त चराचर त्रिलोकीको भस्म कर सकते हैं, फिर मुझ-जैसे
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अत्यन्त तुच्छ, दीन एवं विषयी मनुष्यकी तो बात ही क्या है?
लोमशने कहा—महाराज ! तुम उनका मूल्य देनेमें समर्थ हो। श्रेष्ठ द्विज जगत्के लिये पूजनीय हैं और गौएँ भी दिव्य एवं पूजनीय मानी गयी हैं। अतः तुम उनके लिये मूल्यके रूपमें 'गौ' ही दो।
लोमशजीका यह वचन सुनकर राजा नाभाग मन्त्री और पुरोहितोंके साथ बहुत प्रसन्न हुए और हर्षमें भरकर बोले—भगवन्! उठिये-उठिये। मुनिश्रेष्ठ ! यह आपके लिये योग्यतम मूल्य प्रस्तुत कर दिया गया है।
आपस्तम्बने कहा—अब मैं प्रसन्नतापूर्वक उठता हूँ। राजन् ! तुमने उचित मूल्य देकर मुझे खरीदा है। मैं गौओंसे बढ़कर दूसरा मूल्य कोई ऐसा नहीं देखता जो परम पवित्र एवं पापोंका नाश करनेवाला हो। गौओंकी परिक्रमा करनी चाहिये। वे सदा सबके लिये वन्दनीय हैं। गौएँ मंगलका स्थान हैं, दिव्य हैं। स्वयं ब्रह्माजीने इन्हें दिव्य गुणोंसे विभूषित बनाया है। जिनके गोबरसे ब्राह्मणोंके घर और देवताओंके मन्दिर भी शुद्ध होते हैं, उन गौओंसे बढ़कर अन्य किसको बतावें। गौओंके मूत्र, गोबर, दूध, दही और घी—ये पाँचों वस्तुएँ पवित्र हैं और सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करती हैं। गायें मेरे आगे रहें, गायें मेरे पीछे रहें, गायें मेरे हृदयमें रहें और मैं गौओंके मध्यमें निवास करूँ।*
जो प्रतिदिन तीनों सन्ध्याओंके समय नियमपरायण एवं पवित्र होकर 'गावो मे चाग्रतो नित्यम्' इत्यादि श्लोकका पाठ करता है। वह सब पापोंसे मुक्त होता और स्वर्गलोकमें जाता है। प्रतिदिन भक्तिभावसे गौओंको गोग्रास देनेमें श्रद्धा रखनी चाहिये। जो प्रतिदिन गोग्रास अर्पण करता है, उसने अग्निहोत्र कर लिया, पितरोंको तृप्त कर दिया और देवताओंकी पूजा भी सम्पन्न कर ली। गोग्रास देते समय प्रतिदिन इस मन्त्रार्थका चिन्तन करे। सुरभिकी पुत्री गोजाति सम्पूर्ण जगत्के लिये पूज्य है, वह सदा विष्णुपदमें स्थित है और सर्वदेवमयी है। मेरे दिये हुए इस ग्रासको गौमाता देखें और ग्रहण करें।†
ब्राह्मणोंकी रक्षा करने, गौओंको खुजलाने और सहलाने तथा दीन-दुर्बल-दुःखी प्राणियोंका पालन करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यज्ञका आदि, अन्त और मध्य गौओंको ही बताया गया है। वे दूध, घी और अमृत सब कुछ देती हैं। इसलिये गौओंका दान करना चाहिये और उनकी प्रतिदिन पूजा करनी चाहिये। ये गौएँ स्वर्गलोकमें जानेके लिये सीढ़ी बनायी गयी हैं।
गौओंके इस उत्तम माहात्म्यको सुनकर निषादोंने महाभाग आपस्तम्बजीको प्रणाम करके कहा—प्रभो! हमने सुना है कि साधुपुरुषोंके सम्भाषण, दर्शन, स्पर्श, श्रवण और कीर्तन सभी पवित्र करनेवाले हैं। हमने यहाँ आप-जैसे महात्माके साथ वार्तालाप किया और आपका दर्शन भी कर लिया। अब हम आपकी शरणमें आये हैं, आप हमारे ऊपर अनुग्रह कीजिये।
आपस्तम्बजी बोले—इस गौको तुमलोग ग्रहण करो। इससे तुम सब लोग पापमुक्त हो जाओगे।
* गावः प्रदक्षिणी कार्या वन्दनीया हि नित्यशः। मङ्गलायतनं दिव्याः सृष्टास्त्वेताः स्वयम्भुवा ॥
अप्यागाराणि विप्राणां देवतायतनानि च। यद्गोमयेन शुद्ध्यन्ति किं ब्रूमो ह्यधिकं ततः॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिस्तथैव च। गवां पञ्च पवित्राणि पुनन्ति सकलं जगत्॥
गावो मे चाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च। गावो मे हृदये चैव गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥
(स्क० पु०, आव० रे० १३। ६२-६५)
† तेनाग्नयो हुताः सम्यक् पितरश्चापि तर्पिताः। देवाश्च पूजितास्तेन यो ददाति गवाह्निकम् ॥
गोग्रास-समर्पणमन्त्रः—
सौरभेयी जगत्पूज्या नित्यं विष्णुपदे स्थिता। सर्वदेवमयी ग्रासं मया दत्तं प्रतीक्षताम् ॥
(स्क० पु०, आव० रे० १३। ६८-६९)
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निषाद निन्दित कर्मसे युक्त होनेपर भी प्राणियोंके मनमें प्रीति उत्पन्न करके इन जलचारी मत्स्योंके साथ स्वर्गलोकमें जायँ। मैं नरकको देखूँ या स्वर्गमें निवास करूँ, किंतु मेरे द्वारा मन, वाणी, शरीर और क्रियासे जो कुछ भी पुण्यकर्म बना हो, उससे ये सभी दुःखार्त प्राणी शुभ गतिको प्राप्त हों।
तदनन्तर शुद्धचित्तवाले महर्षि आपस्तम्बकी सत्यवाणीके प्रभावसे वे सभी मल्लाह मछलियोंके साथ स्वर्गलोकमें चले गये। मछलियोंसहित उन मत्स्यजीवी निषादोंको स्वर्गमें गया हुआ देख मन्त्रियों और सेवकोंके साथ राजा नाभागको बड़ा विस्मय हुआ। वे इस प्रकार बोले—'कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सदा संतों एवं पवित्र जलवाले तीर्थोंका सेवन करना चाहिये। इस जगत्में एक क्षणके लिये भी उनका संग किया जाय तो वह कभी निष्फल नहीं होता। अतः साधु-महात्माओंके पास बैठे और उन्हींके साथ उत्तम कथा वार्ता करे।'
तदनन्तर आपस्तम्ब मुनि एवं महातपस्वी लोमशने नाना प्रकारके उत्तम पद सुनाकर राजाको बोध प्राप्त कराया। तब राजाने परम दुर्लभ धर्ममयी बुद्धि धारण की। तत्पश्चात् वे दोनों महर्षि राजा नाभागकी प्रशंसा करते हुए बोले—'अहो! राजेन्द्र! तुम धन्य हो, क्योंकि तुम्हारी बुद्धि धर्ममें तत्पर हुई है। मनुष्योंके लिये धर्म परम दुर्लभ है, विशेषतः राजाओंके लिये तो वह और भी दुर्लभ है। यदि राजा राज्यमदसे उन्मत्त होकर स्वधर्मका परित्याग न करे तो उससे बढ़कर दूसरा कौन हो सकता है? धर्म ही ध्रुव है—वह सदा अटल रहनेवाला है। राज्य तो मोहरूप अथवा मोहका आश्रय है। वह स्थिर रहनेवाला नहीं। परंतु राज्यविषयक मोह होनेपर नरककी प्राप्ति अत्यन्त ध्रुव है। अतः विद्वान् पुरुष राज्यकी निन्दा करते हैं। विषयलोलुप अविवेकी मनुष्य ही राज्यको मान्यता देते हैं। मनीषी पुरुष तो उसे सदा नरकके तुल्य देखते हैं। अतः महाराज! यदि तुम अपने लिये सनातन गति चाहते हो तो तुम्हें अपने मनमें शोक, मोह और मदको कभी स्थान नहीं देना चाहिये।'
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर वे दोनों महात्मा आपस्तम्ब और लोमश अपने-अपने आश्रमको चले गये। राजा नाभागने भी वरदान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपने नगरमें प्रवेश किया। महाराज! इस तीर्थमें स्नान करके मत्स्येश्वरकी पूजा करो। इसी तीर्थके प्रभावसे महाभाग आपस्तम्ब और मत्स्यजीवी निषाद मछलियोंके साथ दिव्यलोकको प्राप्त हुए। वे सब आज भी दिव्य कान्ति धारण करके वैष्णवधाममें विहार करते हैं।
कलहंसेश्वर तीर्थका प्रादुर्भाव और उसका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! अब मैं पापोंका नाश करनेवाले दूसरे तीर्थका माहात्म्य बताऊँगा। नर्मदाके तटपर कलहंस नामसे विख्यात एक देवर्षि ध्यान लगाया करते थे। उनके मनोहर आश्रममें बहुत-से ब्रह्मर्षि निवास करते थे। वे शाक और मूल-फल खाकर जप और ध्यानमें तत्पर रहते थे। युधिष्ठिर! समस्त प्राणियोंके हितमें संलग्न रहनेवाले कलहंसजी भगवान् शिवके ध्यानमें स्थित हो पंद्रह हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़े रहे। उनकी तपस्या और ध्याननिष्ठासे इन्द्रको बड़ा भय हुआ और वे कुबड़े तथा नाटे ब्राह्मणका रूप धारण करके कलहंसके आश्रमपर गये। वहाँ पहुँचकर उन वृद्ध ब्राह्मणने पूछा—'तपोधन! आप किस उद्देश्यसे तपस्या करते हैं?'
कलहंसने हँसते हुए कहा—महाभाग! मैं आपको जानता हूँ। आप देवताओंके स्वामी इन्द्र हैं। मैं इन्द्रपद नहीं चाहता। आप इच्छानुसार राज्य कीजिये। मैं महादेवजीकी आराधना करता हूँ और किसी देवताकी नहीं।
महर्षिका यह वचन सुनकर इन्द्र बोले—महाभाग! आप मुझसे वर माँगिये, जिससे आपको शंकरजीका दर्शन होगा।
९८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कलहंसने कहा—देवराज! मैं भगवान् शंकरको छोड़कर और किसी देवतासे वरदानकी याचना नहीं करूँगा।
उनके ऐसा कहनेपर इन्द्र सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न हो लौट गये। कलहंसकी पराभक्तिको जानकर देवाधिदेव महेश्वरने उन्हें अपने नीलकण्ठ त्रिलोचन स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराया। महादेवजीका वह स्वरूप देखकर मुनिश्रेष्ठ कलहंसने साष्टांग प्रणाम किया और इस प्रकार उनकी स्तुति की—‘महादेव! आपको नमस्कार है। नीलकण्ठ! त्रिलोचन! आपको नमस्कार है। आप कल्याणस्वरूप और परम शान्त हैं, आपको नमस्कार है। हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले महादेव! आपको नमस्कार है। सबको जन्म देनेवाले भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनका दूसरा कोई स्वामी नहीं है, उन महेश्वरको बार-बार नमस्कार है। महादेव इत्यादि नामोंसे जिनकी स्तुतिकी जाती है, उन भगवान् त्रिलोचनको नमस्कार है। ॐ कल्याणकी प्राप्ति करानेवाले देवता शिवको नमस्कार है। भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, चन्द्रमा, रुद्र, अन्धकार और प्रकाशमय सूर्य जिनके स्वरूप हैं, जो भयंकर प्रलयंकर अग्नि हैं, उन भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। पंचमुख शम्भो! आपको नमस्कार है। महाशिव! आपको नमस्कार है। ब्रह्माजीका लोक, वन और पाताल जिनका स्वरूप है तथा जिनके कण्ठमें नील चिह्न शोभा पा रहा है, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। ब्रह्म, शर्व, सुरेशान, हरि तथा हर आदि नामोंसे जिनके ही स्वरूपका बोध होता है, उन भगवान् शिवको बारंबार नमस्कार है। ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और चराचर जगत्स्वरूप आपको नमस्कार है। प्रभो! आप ही पातालनिवासी हाटकेश्वर अथवा स्वर्णरूप हैं, आपको नमस्कार है। उमानाथ! आपको नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव एवं सर्वज्ञ परमात्मा आप ही हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप ही सद्योजात, अघोर एवं तत्पुरुष कहलाते हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आपके द्वारा यह सम्पूर्ण चराचर त्रिलोकी व्याप्त है। आप आदि, मध्य तथा अन्तस्वरूप हैं। कलि और कालस्वरूप! आपको नमस्कार है। श्रीकण्ठ! नागेन्द्रभूषण! आपका आधा शरीर उमास्वरूप और आधा उमावल्लभरूप है, आपको नमस्कार है। आपके गुण तथा रूप अनन्त हैं। आप सर्पोंका यज्ञोपवीत धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, बुद्धि, मन और अहंकार—ये आठ तत्त्व आपकी आठ मूर्तियाँ हैं। अष्टमूर्ते! आपको नमस्कार है। आप ही सूर्य, अर्यमा, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्क, सविता, रवि, गभस्तिमान्, काल, मृत्यु और प्रकाश करनेवाले धाता—ये बारह आदित्यरूप हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश भी आप ही हैं। चन्द्रमा, बृहस्पति, शुक्र, बुध और मंगल भी आपके ही स्वरूप हैं। इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु (सूर्य), शुचि (अग्नि), शौर्य (विष्णु) तथा जनेश्वर (राजा) भी आप ही हैं। विष्णु और ब्रह्मा आदि देवता आप की ही कला हैं। चारों वेद, कुबेर, यमराज भी आपके ही स्वरूप हैं। कला, काष्ठा, मुहूर्त, पक्ष, मास, ऋतु और संवत्सर आदि कालचक्र भी आप ही हैं। विभावसु (अग्नि), पुरुष (अन्तर्यामी), शाश्वत योग, व्यक्त, अव्यक्त, सनातन, परमेश्वर, लोकाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, विश्वकर्मा, अन्धकारनिवारक, जलके अधिष्ठाता वरुण, शीतराशि, मेघ, जीवनरूप जल, शत्रुनाशक, भूत, यज्ञ और भूतनाथ भी आप ही हैं। समस्त लोकपाल आपकी सेवा करते हैं। आप ही मनु, सुपर्ण (बुद्धि) तथा भूतादि (अहंकार) हैं। सदाशिव! आपको नमस्कार है। प्रभो! मैंने स्तुतिके बहाने अपनी जिह्वाकी चपलताका परिचय देकर आपको कष्ट ही पहुँचाया। ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंको भी जिनका अन्त नहीं मिलता, उन्हीं आप शिवकी स्तुति संसार-समुद्रमें डूबे हुए प्राणियोंमेंसे कोई भी प्राणी कैसे कर सकता है। शूलपाणे! मैंने अज्ञान अथवा ज्ञानसे जो कुछ भी अनुचित बात कह दी है, उसके लिये क्षमा करें।'
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मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! कलहंसद्वारा की हुई इस स्तुतिको सुनकर महादेवजी बोले—'महामते! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो।'
कलहंसने कहा—देव! इस स्थानपर कलहंसेश्वर नामक तीर्थ एवं शिवलिंग प्रकट हो और यहाँ किये हुए होम-दान आदि सत्कर्म अक्षय बने रहें। जो मनुष्य स्वाधीन या पराधीन होकर यहाँ मृत्युको प्राप्त हो, वह आपकी आज्ञासे स्वर्गलोकमें जाय। कल्याणकारी महादेव! जो इस स्तोत्रके द्वारा आपकी स्तुति करें, वे बड़े-से-बड़े पापी क्यों न हों, इस तीर्थके प्रभावसे सभी शिवलोकको चले जायँ।
महादेवजी बोले—मुने! इस चराचर त्रिलोकीमें जो जिस-जिस वस्तुकी कामना करेगा, उसे इस तीर्थमें वह सब कुछ निःसन्देह प्राप्त होगी।
ऐसा कहकर भगवान् शिव कैलासपर्वतपर चले गये। तदनन्तर जितेन्द्रिय मुनि कलहंस भी ब्रह्मनिष्ठ मुनियोंके साथ भगवान् शिवके धाममें जाकर दिव्य भोगोंका उपभोग करने लगे। युधिष्ठिर! यह मैंने जिन कलहंसका यश तुम्हें सुनाया है, वे स्वारोचिष मन्वन्तरके आदि कल्पमें हुए थे। कलहंसके इस उपाख्यानका श्रवण और कीर्तन करनेसे कलियुगमें मनुष्य कष्ट नहीं पाते। वे पुत्र और स्त्रियोंसे संयुक्त होते हैं और पाप, माया तथा मोहसे उनका पिण्ड छूट जाता है; क्योंकि इस उपाख्यानके द्वारा वे मन, वाणी और क्रियासे महादेवजीका चिन्तन और स्मरण करते हैं।
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नर्मदापुरका माहात्म्य, जमदग्निको कामधेनुकी प्राप्ति, कार्तवीर्यद्वारा मुनिका वध और धेनुका अपहरण तथा परशुरामद्वारा कार्तवीर्यका वध
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजेन्द्र ! नर्मदाके उत्तर तटपर कपिलासंगमके बाद वैदूर्यके पश्चिम भागमें नर्मदापुर नामक स्थान विख्यात है। वहाँ बहुत-से देवर्षि, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, तपस्वी तथा व्यवसायी लोग भी निवास करते थे। नर्मदापुरके निवासियोंमेंसे एक जमदग्नि नामक मुनि भी थे, जो सदा शिवभक्तिमें तत्पर रहते थे। वे प्रतिदिन नर्मदासंगममें स्नान करके नाना प्रकारके गन्ध-पुष्प तथा अगुरु आदि मनोहर उपचारोंद्वारा भगवान् महेश्वरकी पूजा करते और दक्षिणामूर्तिकी शरण लेकर शिवमन्त्रके जपमें संलग्न रहते थे। एक मासतक इस प्रकार जपमें लगे हुए मुनिको सिद्धेश्वर लिंगस्वरूप देवदेव महेश्वरने प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'ब्रह्मन् ! मैं तुम्हारी भक्ति तथा रुद्र-जपसे सन्तुष्ट हूँ।'
जमदग्नि बोले—परमेश्वर ! मुझे होम और यज्ञ-क्रियाके लिये कामधेनु प्रदान कीजिये। क्योंकि धर्म-कर्म और शुभ अनुष्ठानके लिये, शिवपूजा और तर्पणके लिये तथा देवकार्य और पितृकार्यकी सिद्धिके लिये गौओंको ही अत्यन्त पवित्र माना गया है।
महादेवजीने कहा—महाभाग! तुम्हें समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये यह कामधेनु दी जा रही है।
ऐसा कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। जमदग्निमुनि जिन-जिन कामनाओंके लिये कामधेनुसे याचना करते, वे सब उन्हें प्राप्त हो जाती थीं। अब वे सोनेके पात्रमें भाँति-भाँतिके मनोवांछित भोज्य-पदार्थ परोसकर सहस्रों ऋषियोंको प्रतिदिन इच्छानुसार भोजन कराने लगे। माननीय ब्रह्मर्षि और देवतालोग भी मुनिवर जमदग्निके आश्रमपर आकर उनकी कीर्ति बढ़ाने लगे।
इस प्रकार कुछ समय व्यतीत होनेपर एक दिन राजा कार्तवीर्य अपनी माहिष्मतीपुरी छोड़कर
९९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
शिकार खेलनेके लिये विन्ध्यपर्वतपर आया और नर्मदाके तटपर उसने अपना पड़ाव डाल दिया। शिकार खेलते-खेलते वह जमदग्निके आश्रमपर गया और इस प्रकार बोला— 'मुने! यह गौ तुम्हारे योग्य नहीं है। इसे मुझे दे दो।' कार्तवीर्यकी यह बात सुनकर मुनिवर जमदग्नि बहुत देरतक सोच-विचारमें पड़े रहे। उन्हें कुछ भी उत्तर न देते देख राजाने मुनिको मरवा दिया और स्वयं उनकी कामधेनुको बलपूर्वक हरकर ले जाने लगा। जब वह आश्रमसे बाहर निकला तब उस होमधेनुपर कोड़ोंकी मार पड़ने लगी। बार-बार ताड़ित होनेपर गौने शाप देते हुए कहा— 'अरे ओ नृपाधम! रेणुकानन्दन परशुराम तेरे समस्त कुलका संहार कर डालेंगे।' इस प्रकार शाप देकर कामधेनु पुनः स्वर्गको चली गयी। उस समय लोगोंमें महान् हाहाकार मच गया। सब कहने लगे— 'यह कौन दुराचारी आ गया, जिसने ब्राह्मणोंके कोपको बढ़ाया है।' तदनन्तर महावीर परशुरामने पिताके मारे जानेका समाचार सुना। सुनते ही वे प्रज्वलित अग्निकी भाँति क्रोधसे जल उठे और सहसा आश्रमपर आये। पिताको मारा गया देख क्रोधसे उनका पराक्रम दूना हो गया। वे सहसा उठकर माहिष्मतीपुरीकी ओर चल दिये। वहाँ कार्तवीर्य अर्जुनको देखकर परशुरामने क्रोधपूर्वक कहा— 'अरे ओ नराधम! खड़ा रह। मेरे पिताकी हत्या करके अब तू कहाँ जा सकता है?' ऐसा कहकर उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी हाथमें ली और कार्तवीर्यकी भुजारूपी वनको उसके मस्तकसहित काट डाला। उस समय मुनिवर परशुराम क्षत्रियजातिके लिये प्रलयंकर बन गये थे। महापराक्रमी दुरात्मा कार्तवीर्यके मारे जानेपर देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उसीके प्रति क्रोध होनेसे परशुरामजीने समूची पृथ्वीको क्षत्रियोंसे रहित कर दिया और इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके वे पिताके आश्रमपर लौट आये। माता तथा अन्यान्य मुनीश्वरोंको नमस्कार करके उन्होंने विधिपूर्वक परशुरामेश्वर महादेवकी स्थापना की। उसके समीप ही विशोका, एरण्डिका और पावनी नामवाली तीन शिलाएँ हैं। उन्हींपर परशुरामजीने पिताकी मरणोत्तरकालीन श्राद्ध आदि क्रियाएँ सम्पन्न कीं। उस स्थानपर एक कपिल वर्णकी शिला है, जो देवद्रोणीके नामसे विख्यात है। वहाँ पिण्डदान करनेसे पितर स्वर्गमें जाते हैं। राजन् ! इस प्रकार मैंने तुम्हें नर्मदापुरका माहात्म्य बतलाया है। इसके श्रवण और कीर्तनसे देवलोकमें देवत्वकी प्राप्ति होती है।
## शिवनेत्र कुण्ड तथा जनकतीर्थका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन् ! जहाँ बृहती और नर्मदाका संगम हुआ है, वहाँ एक निषाद प्रतिदिन भगवान् त्रिलोचनका पूजन करता था। एक दिन व्यतिपात और संक्रान्तिका योग आनेपर उसने फूल लेकर शिवमन्दिरमें प्रवेश किया। वहाँ जाकर उसने देखा कि भगवान्का तीसरा नेत्र ही नहीं है। उसके चित्तमें बड़ा विस्मय हुआ और वह सोचने लगा, किस पापात्माने भगवान्के नेत्रका अपहरण किया है। ऐसा कहकर उसने तीखे बाणसे अपना नेत्र उखाड़ लिया और उसे ही देवदेव महादेवके ललाटमें लगा दिया। ऐसा करते समय उसके मनमें तनिक भी भय, कम्पन और दीनता नहीं आने पायी। उसके हृदयका भाव भी नहीं बदला। इससे देवेश्वर महादेवजी उस निषादके ऊपर बहुत प्रसन्न हुए और हँसकर बोले— 'वत्स! तू मनोवांछित वरदान माँग ले।' भगवान् शिवके प्रसादसे उसकी बुद्धि और प्रकारकी (निर्मल) हो गयी और वह उन्हें साष्टांग प्रणाम करके बोला— 'देवेश्वर! ये सभी निषाद अपने मृग, पक्षी,
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पशु, अपने पुत्र और स्त्री आदि परिवारके साथ आपके प्रसादसे आपके ही लोकमें जायें तथा अन्य जितने पापयोनि हों, उनकी भी ऐसी ही गति हो।'
महादेवजी बोले—मेरे प्रसादसे तुम सब कामनाओंको प्राप्त करोगे।
ऐसा कहकर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर सेवकोंसहित वह निषाद इस तीर्थके प्रभावसे शिवजीके धाममें चला गया। राजन्! यह तुमको शिवनेत्र कुण्डका माहात्म्य बताया गया है। सैकड़ों पापयोनि मनुष्य नर्मदा और शिवके संयोगरूप उस तीर्थमें परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं। जो वहाँ स्वतन्त्र या परतन्त्र होकर प्राण त्याग करता है, वह सहस्रों वर्षोंतक उमा-महेश्वरके धाममें निवास करता है। इस प्रसंगको सुनने और कहनेसे भी मनुष्य भव-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
नर्मदाके उत्तर तटपर एक परम उत्तम तीर्थ है, जो सब सिद्धियोंको देनेवाला है। उसे जनकतीर्थ कहते हैं। स्वारोचिष मन्वन्तर आनेपर त्रेतायुगमें राजा जनक अपने उपरोहित ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि याज्ञवल्क्यको साथ लेकर अनेक मुनिवृन्दोंसे सेवित कश्यपजीके पवित्र आश्रमपर गये। उनके साथ यज्ञ करानेवाले ऋत्विज तथा यज्ञका सामान भी था। तदनन्तर वहाँ यज्ञोंमें उत्तम लक्षमेध यज्ञ आरम्भ हुआ। इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंने स्वयं आकर यज्ञभाग ग्रहण किया। तत्पश्चात् यज्ञ पूरा हुआ। राजा नर्मदामें यज्ञान्तस्नान करके पुत्र और पत्नीके साथ सुशोभित हुए। फिर शिव और विष्णुका पूजन करके उनके वरदानके प्रभावसे वे दिव्य विमानपर आरूढ़ हो दिव्य लोकमें जाते हुए देखे गये। मार्गमें उन्हें देखकर धर्मराज उठकर खड़े हो गये और अर्घ्य, पाद्य आदि लेकर पैदल ही उनके विमानके आगे आये। निकट आनेपर उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—'महाराज ! आपने तपस्या, ध्यानयोग, दान और देवपूजन आदिके द्वारा शिव और नर्मदाजीके प्रसादसे सम्पूर्ण दिव्य लोकोंपर विजय पायी है।' यह सुनकर राजा जनकने यशस्वी धर्मराजसे कहा—'प्रभो! सर्वत्र अपनी प्रभा फैलानेवाले भगवान् सूर्य जिस प्रकार जीवोंके आराध्य देव हैं, वैसे ही आपकी भी मूर्ति है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये जीवोंके समस्त कर्मोंके साक्षी हैं।'
इस प्रकार जनक और धर्मराजमें धर्माधर्म-विचारपूर्वक संवाद चल रहा था, इतनेमें ही देवराज इन्द्र, देवर्षि नारद, पर्वत तथा अन्य श्रेष्ठ मुनि राजा जनकका आगमन सुनकर धर्मराजके नगरमें आये। धर्मराजने उन सबका यथायोग्य पृथक्-पृथक् पूजन किया और वे सब लोग यथायोग्य आसनपर बैठे। तदनन्तर नारदजीने पूछा—'धर्मराज ! पृथ्वीपर कौन-से देश, पर्वत, पवित्र नदियाँ, आश्रम और तीर्थ ऐसे हैं, जहाँ किये हुए मनुष्योंके दान, होम, जप, तप आदि कभी क्षीण नहीं होते। यह सब यथार्थरूपसे बताइये।'
धर्म बोले—मुने ! नर्मदाके उत्तर तटपर लक्षमेध नामक तीर्थ है और वहीं लक्षमेधेश्वर नामक एक शिवलिंग भी है, जो परम पवित्र है। भगवान् शिवसे बढ़कर कोई देवता नहीं है। नर्मदासे बड़ी कोई नदी नहीं है। सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है और सब प्राणियोंपर दया करना—यह सबके लिये परम धर्म है।* जो मनुष्य शिवजीके चिन्तनमें तत्पर हो नर्मदा नदीके तटपर निवास करता है, उसपर यमराजका शासन नहीं चलता और वह कभी यमलोकका दर्शन नहीं करता। ब्रह्मा, विष्णु और शिव ही उसके स्वामी होते हैं।
धर्मराजके कहे हुए इस धर्माख्यानको सुनकर नारद आदि महर्षि बड़े प्रसन्न हुए।
* न शंकरत्परो देवो न रेवायाः परा नदी। न सत्यात्परो धर्मः कारुण्यं सर्वजन्तुषु॥ (स्क० पु०, आव० रे० १८।३६)
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सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, शाण्डिल्या और नर्मदाके संगमकी महिमा तथा नर्मदा-कुब्जाके संगमपर रन्तिदेवका यज्ञ
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! सप्तसारस्वत नामसे प्रसिद्ध एक गन्धर्व था जो भगवान् शिवके सुयशका गान किया करता था। वह गाने-बजानेकी विद्यामें बड़ा निपुण था, परंतु कुछ कालके बाद उसे मदिरा पीनेकी लत पड़ गयी और वह उसीमें अचेत रहा करता था। कामपीड़ित एवं काममोहित होकर उसने भगवान् शंकरकी उपासना त्याग दी और वह भक्ष्य-भोज्यके सेवनमें ही आसक्त रहने लगा। इस प्रकार कुछ काल व्यतीत होनेपर गन्धर्व उमापति महादेवजीका दर्शन करनेके लिये कैलास पर्वतपर गया। उसे शिव-भक्तिसे विमुख हुआ देख नन्दीने शाप दिया—‘अरे! तू अपने पापके प्रभावसे चाण्डाल-योनिमें जन्म ले।’ तब गन्धर्वने कहा—‘महाभाग! मुझे मिले हुए इस शापका अन्त कब होगा, इसका निश्चय भी आपको कर देना चाहिये।’
नन्दी बोले—व्यतिपात योग आनेपर जब नर्मदा नदीमें स्नान करके महेश्वरका पूजन करोगे, तब शापका अन्त होगा और तुम पुनः यहाँ आ सकोगे।
यह सुनकर वह गन्धर्व वहाँसे चला गया और चाण्डालयोनिमें उत्पन्न हुआ। उस योनिमें भी उसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण बना रहा और वह तीर्थयात्राके प्रसंगसे पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरण करने लगा। दैवयोगसे नर्मदाके तटपर आया। वहाँ उसने शंकरस्थण्डिल (शिववेदी)-में जाकर भाँति-भाँतिके पुष्प आदि उपचारोंसे भगवान् शिवका पूजन किया। गन्धर्वकी भक्ति जानकर भगवान् शिव उसके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए। उसी स्थण्डिल (वेदी)-से जलमें परम पावन शिवलिंगके रूपमें उनका प्रादुर्भाव हुआ।
महादेवजी बोले—महाभाग! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।
गन्धर्वने कहा—महेश्वर! आपके प्रसादसे भूमण्डलमें यह स्थान मेरे नामपर सप्तसारस्वततीर्थके रूपमें विख्यात हो और यह शिवलिंग भी सारस्वत लिंग कहलाये। जो पापी, चाण्डाल एवं नराधम पशु-पक्षियोंकी योनिमें पड़े हों, वे भी इस तीर्थके प्रभावसे पापमुक्त हो स्वर्गलोकमें चले जायें।
‘एवमस्तु’ कहकर भगवान् महेश्वर अन्तर्धान हो गये तथा वह गन्धर्व भी शापमुक्त हो शिवलोकको प्राप्त हुआ। जो मनुष्य सप्तसारस्वततीर्थमें स्नान करके भगवान् वृषभध्वजकी पूजा करता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो वहाँ स्नान करते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु हो जाती है, वे पुनर्जन्मसे मुक्त होते हैं।
शाण्डिल्या और नर्मदाका संगम सब पापोंको हरनेवाला और श्रेष्ठ तीर्थ है। वहीं शाण्डिल्येश्वर लिंग भी है। उस तीर्थमें स्नान करके महादेवजीकी पूजा करनेसे मनुष्य फिर कभी कर्मभूमिमें जन्म नहीं लेता। वहाँ तिल और जलकी अंजलि देने तथा हविष्यका पिण्डदान करनेसे पितर चौदह इन्द्रोंके समयतक तृप्त रहते हैं। उस तीर्थमें शाण्डिल्य, कौण्डिन्य, भाण्डव्य, कौशिक, कश्यप और भृगु—ये तथा अन्य भी बहुत-से महर्षिगण जप और ध्यानमें तत्पर रहते हैं। वहाँ साठ हजार मुनियोंने उग्र तपस्याका अनुष्ठान किया है। शाण्डिल्या और नर्मदाके संगममें शाण्डिल्यजीका आश्रम बहुत मनोहर है। लोकमें वह शाण्डिल्यपुरके नामसे प्रसिद्ध है। अनेक ब्रह्मर्षि वहाँ निवास करते हैं। नर्मदाके दक्षिण तटपर द्वादशादित्यतीर्थ, देवदारुतीर्थ और देववनतीर्थ हैं। द्वादशादित्यतीर्थ सब पापोंका नाश करनेवाला है, वहीं ज्ञानस्वरूप सिद्धलिंगमय महादेवजी स्थित हैं। उसी तीर्थमें कनकाको मोक्ष देनेवाला कल्याणमय कनकेश्वरलिंग
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है। वहीं ज्वरेश्वरलिंग है, जहाँ ज्वरका अभाव है। उसके पास ही पंचब्रह्मेश्वरलिंग है, जो सब पापोंसे मुक्त करनेवाला है। पंचब्रह्मेश्वर, पुष्येश्वर तथा स्थण्डिलेश्र्वर—ये तीन लिंग वहाँ प्रधान हैं। नित्य-नैमित्तिक कार्योंमें, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय श्रद्धापूर्वक संगममें स्नान करके तीनों लिंगोंका पूजन करनेसे पितर स्वर्गलोकमें जाते हैं। नर्मदाके दक्षिण भागमें गोप्य लिंग है। उसके पूजनसे ब्रह्महत्या आदि पाप सात रातमें नष्ट हो जाते हैं।
राजन्! पितर, पितामह तथा मातामह आदि सभी आपसमें यह गाथा गाते रहते हैं कि ‘क्या हमारे कुलमें भी कोई ऐसा परम धार्मिक पुत्र उत्पन्न होगा जो हमें नर्मदाके जलसे पूजित तिलयुक्त हविष्यका पिण्ड देगा, जिससे कि लाखों वर्षोंतक तृप्त रहकर हम परम गतिको प्राप्त होंगे?’
नर्मदा और कुब्जाके संगममें स्नान करनेके लिये सोमवती अमावस्या प्रसिद्ध पर्व है। एरण्डी और चण्डवेगाका जहाँ नर्मदा नदीसे संगम हुआ है, वहाँ स्नान करनेके लिये सोमवती अमावस्या, व्यतिपात, संक्रान्ति, वैधृतियोग, विषुवयोग, दक्षिणायन और उत्तरायणके प्रारम्भिक दिन—ये पर्व उत्तम माने गये हैं। अमावास्याको स्नान करनेसे बीस गुना पुण्य होता है, व्यतिपात योगमें सौगुना, संक्रान्तिकाल तथा वैधृतियोगमें पचासगुना और सोमवती अमावस्या एवं चन्द्रग्रहणके समय कुरुक्षेत्रसे सौगुना पुण्य होता है। यह साक्षात् महादेवजीका कथन है। वहाँ बिल्वाम्रक नामसे प्रसिद्ध एक सिद्धलिंग है, जो ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला है। उसके दर्शन और स्पर्शसे मनुष्य शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो सोमवती अमावस्याके दिन वहाँ प्राण-त्याग करता है, वह महादेवजीके कल्याणमय धाममें निवास करता है।
राजन्! अयोध्याके चक्रवर्ती नरेश श्रीमान् रन्तिदेव इन्द्रके तुल्य महापराक्रमी राजा थे। वे समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ माने जाते थे। उनके राज्यमें मनुष्योंको शोक, मात्सर्य, रोग और दारिद्र्यका दुःख नहीं होता था। सब प्रजा दीर्घायु तथा धन-धान्यसे सम्पन्न थी, गौएँ स्वयं ही इच्छाके अनुसार दूध देती थीं और पृथ्वी सदा हरी-भरी खेतीसे सुशोभित रहती थी। इस प्रकार पृथ्वीका पालन करते हुए राजा रन्तिदेवने अपने पुरोहित मुनिवर वसिष्ठजीसे पूछा—‘महामुने! किस तीर्थमें निर्विघ्नतापूर्वक यज्ञकी सिद्धि होती है?’
मुनिवर वसिष्ठने कहा—राजन्! पुराणोंमें सब तीर्थोंसे बढ़कर उत्तम तीर्थ उसीको बताया गया है, जहाँ नर्मदा नदी बहती हैं।
तब राजाने सेवक, मन्त्री और पुरोहितको आज्ञा देते हुए कहा—यज्ञका सामान शीघ्र ही तैयार किया जाय। तत्पश्चात् दूतोंको भिन्न-भिन्न देशोंमें शीघ्र जानेकी आज्ञा देते हुए कहा—‘समस्त राष्ट्रमें यह घोषणा करा दी जाय कि ‘सब राजा मेरे यज्ञमें पधारें।’ रन्तिदेवकी आज्ञासे सभी सामन्त नरेश उस यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आये। महाराज रन्तिदेव भी अपनी रानी और यज्ञसामग्रियोंके साथ दिव्य रथपर आरूढ़ हो नर्मदाके तटपर गये। वहाँ यज्ञमण्डप, यज्ञकुण्ड और यज्ञके यूप सभी सुवर्णमय बनाये गये थे। नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ और पकवान तैयार किये गये थे। महाराजने अपनी धर्मपत्नीके साथ यज्ञकी दीक्षा ली। तदनन्तर नर्मदाके सुन्दर तटपर उनका यज्ञ प्रारम्भ हुआ। उसमें धूमरहित अग्निदेव प्रत्यक्ष प्रकट होकर प्रज्वलित हो रहे थे। ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता, लोकपाल, मरुद्गण, विश्वेदेव, साध्य, वसु, चन्द्रमा, सूर्य, नदियाँ, समुद्र, पर्वत, सब तीर्थ, मातृगण, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, उमासहित शिव तथा देवेश्वर विष्णु—इन सबके लिये राजाने पृथक्-पृथक् यज्ञभाग दिये।
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९९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कुब्जा और नर्मदाके संगमकी महिमा, हरिकेश ब्राह्मणका परिवारसहित ब्रह्मराक्षसयोनिसे उद्धार
मार्कण्डेयजी कहते हैं—शालग्रामक्षेत्रमें हरिकेश नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे। वे शिल और उञ्छवृत्तिसे* जीवन-निर्वाह करते थे। बड़े ही धर्मात्मा और सत्यपरायण थे। उनकी धर्मपत्नी ब्राह्मणी भी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली, यशस्विनी, पतिव्रता, परम सौभाग्यवती और पतिसेवामें संलग्न रहनेवाली थी। वह स्त्री समयपर रजस्वला हुई और ब्राह्मणने ऋतुकालमें उसके साथ सहवास किया। ब्राह्मणीके गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न हुए। वे सभी कपिलापुरमें रहते थे। ब्राह्मणदेवता शिलोञ्छवृत्तिके प्रयोगसे एक प्रस्थ अन्न प्रतिदिन उपार्जन करते थे। इससे उनके बच्चे भूखसे दुर्बल होकर बड़े करुण स्वरमें रोते रहते थे। बालकोंको भूखा देख माता शोक और पीड़ासे व्याकुल रहती थी। एक दिन वह अत्यन्त दुःखसे कातर हो पतिसे बोली, 'आर्यपुत्र! बूढ़े माता-पिता, साध्वी पत्नी और छोटी अवस्थावाले बालक—इन सबका प्रयत्नपूर्वक भरण-पोषण करना चाहिये, यही सनातन धर्म है। यों तो सभी पोष्यवर्गका भरण-पोषण आवश्यक है, परंतु पुत्रोंके पालन-पोषणपर तो विशेष ध्यान देना चाहिये।'
युधिष्ठिर! ब्राह्मणीका यह वचन सुनकर हरिकेशजी शोकसे विह्वल हो उठे और इस प्रकार बोले—'देवि! मैं गाँव-गाँवमें भीख माँगकर सबके लिये पृथक्-पृथक् बाँटकर उत्तम अन्न देता ही हूँ। दूसरी कोई वृत्ति करता नहीं, फिर अधिक अन्न मैं कहाँसे लाऊँ?!'
ब्राह्मणी बोली—यदि बालक और वृद्ध भूखसे पीड़ित हों, तो बालहत्याके समान पाप लगता है। अतः दान ग्रहण करके भी अपने बालकोंका पालन-पोषण करना चाहिये। कहते हैं, कुरुक्षेत्रमें अयोध्यानरेश महाराज अम्बरीषका कोई महान् यज्ञ हो रहा है। वहाँ दान लेनेके लिये बहुत-से शालग्राम-निवासी ब्राह्मण गये थे। वहाँसे गौएँ, सुवर्ण और धन पाकर वे सब लोग लौटे हैं। जहाँ सब शालग्रामनिवासी ब्राह्मण गये थे, वहाँ आप भी जाइये।
तब पुत्रोंके भरण-पोषणकी इच्छासे हरिकेशजी भी ब्राह्मणी और बालकोंको साथ ले राजा अम्बरीषके महायज्ञमें गये और जहाँ ऋत्विग् लोग बैठे थे, वहाँ उन्होंने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया। महाराज अम्बरीषने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणको देखकर मस्तक झुकाया और अर्घ्य-पाद्यके द्वारा उन सबका पूजन किया। तत्पश्चात् उन्होंने पूछा—'विप्रवर! आप पत्नी और पुत्रोंके साथ यहाँ किसलिये आये हैं? आपने आतिथ्यके समय यहाँ पदार्पण किया है। अतः जो उचित एवं आवश्यक वस्तु हो उसे माँगिये।'
ब्राह्मणने कहा—राजन्! आप मेरे एक-एक पुत्रको सौ-सौ वर्षोंकी जीविकाके लिये पर्याप्त धन दीजिये। साथ ही यज्ञ और होमके लिये उत्तम धेनु तथा सुवर्णके भारसे विभूषित दस हजार गौएँ प्रदान कीजिये। इसके अतिरिक्त एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ तथा उत्तम-उत्तम वस्त्र और आभूषण अर्पण कीजिये।
ब्राह्मणकी यह बात सुनकर महाराज अम्बरीषने बड़ी श्रद्धाके साथ वह सब कुछ उन्हें समर्पित किया और अपनी सवारियोंसे उन्हें शालग्राम स्थानतक पहुँचा दिया। इस प्रकार उस महान् यज्ञको परिपूर्ण करके वे राजर्षि दीर्घकालतक देवताओंकी भाँति आनन्द भोगते रहे। इधर हरिकेश ब्राह्मण अपनी पत्नी और पुत्रोंके साथ अनेक
* 'उञ्छः कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम्' इस कोष-वाक्यके अनुसार बाजार या खलिहानका अन्न उठ जानेपर वहाँ बिखरे हुए एक-एक दानेको चुनना 'उञ्छ' कहलाता है और खेत कट जानेपर वहाँ गिरी हुई धान या गेहूँकी मंजरी (बाल) बीनना 'शिल' कहा गया है।
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प्रकारके भोग भोगकर कालान्तरमें मृत्युको प्राप्त हुए। मरनेके पश्चात् उन्हें निर्जल मरुप्रदेशमें ब्रह्मराक्षस होना पड़ा। राजाका प्रतिग्रह दोषयुक्त होता है। उसे लेनेसे फिर मानव-जन्म दुर्लभ हो जाता है। जो द्रव्यके लोभसे मोहित और विषयलोलुप होकर राजाका दान ग्रहण करता है, उसका रौरव-नरकमें गिरना अवश्यम्भावी है।
वह ब्रह्मराक्षस अपनी स्त्री और पुत्रोंके साथ कुरुक्षेत्रको गया और बारह वर्षोंतक भूखा रहकर इस चिन्तामें पड़ा कि 'क्या करूँ, मेरा यह शरीर किसी प्रकार छूट नहीं पाता। अब मैं अपने पापकी शुद्धिके लिये अग्निमें प्रवेश करूँगा।' तब उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उसकी पुत्रवती पत्नीने अपने ब्रह्मराक्षस पतिसे कहा—'प्रभो! ब्राह्मणका यह सब धर्म अग्निसे ही सिद्ध होता है। अतः लकड़ी इकट्ठी करके आप उसमें आग जला दीजिये और मैं सौभाग्यवती रहकर पहले स्वयं ही अग्निमें प्रवेश करूँगी। अपनेसे पहले पतिको भयंकर आगमें गिरते नहीं देख सकूँगी।'
उसके ऐसा निश्चय करनेपर आकाशवाणीने उससे कहा—'शुभे! तुम्हें मृत्युका भय नहीं है, कुब्जा और नर्मदाके संगममें स्नान करनेसे ब्रह्मराक्षसयोनि छूट जाती है। उसमें स्नान करके बिल्वाम्रकेश्वरकी पूजासे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है, ब्रह्मराक्षसयोनिसे मुक्त होता है और ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।' ऐसा कहकर आकाशवाणी मौन हो गयी। तब हरिकेशने अपनी स्त्री और पुत्रोंके साथ वहाँ जाकर महादेवजीको प्रणाम किया और कुब्जा एवं नर्मदाके संगममें विधिपूर्वक स्नान करके महादेवजीका पूजन किया। तत्पश्चात् वे सब-के-सब काम और क्रोधसे रहित हो भगवान् विष्णु और शिवका स्मरण करते हुए अपने घरकी भाँति प्रज्वलित अग्निमें बिना क्लेशके ही प्रवेश कर गये। फिर तो उन्हें तत्क्षण दिव्य देहकी प्राप्ति हुई और वे ब्रह्मतेजोमय शरीर धारण करके दिव्य विमानपर बैठकर ब्रह्मलोकको चले गये।
उस पवित्र संगममें एक सौ आठ शिवलिंग हैं।
माहेश्वरतीर्थकी महिमा, राजा सालंकायनका यज्ञ
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! माहेश्वरपुरमें बहुत-से तीर्थ हैं, वहाँसे रौद्रवारुणतीर्थतक जो एक कोसकी भूमि है, उसके भीतरका स्थान शिवक्षेत्र कहा गया है। जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है, वह शिवलोकमें आनन्दका भागी होता है। वहाँ पितरोंको तिल और जलकी अंजलि देनेसे माता और पिता दोनों कुलोंके पितर महाप्रलय-कालतक तृप्त रहते हैं। प्राचीन कालमें ब्रह्माजीके द्वारा वहाँ असंख्य उत्तम यज्ञ किये गये हैं। इन्द्रने भी वहीं यज्ञानुष्ठान करके देवराज-पदको प्राप्त किया है। कार्तवीर्य अर्जुनने भी वहीं पूर्वकालमें सौ यज्ञ किये थे। राजन्! पहलेकी बात है। अयोध्यापुरीमें सूर्यवंशी राजा वैवस्वत मनु, जो साक्षात् भगवान् सूर्यके ही पुत्र थे, चक्रवर्ती नरेशके पदपर प्रतिष्ठित थे। वे सदा यज्ञ और दानमें तत्पर रहते थे। उनके शासनकालमें उत्तम पुरी अयोध्याके भीतर मृत्यु, रोग और वृद्धावस्थाका कष्ट किसीको भी नहीं होता था।
तदनन्तर उन्हींके वंशमें परम धर्मात्मा राजर्षि सालंकायन हुए, जिनके राज्यकालमें समूची पृथ्वी सस्य-श्यामला एवं धन-धान्यसे सम्पन्न थी। गौएँ स्वयं ही इच्छानुसार दूध देती थीं। एक समय अयोध्याके राज्यमें बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं हुई। सम्पूर्ण देशवासी मनुष्य और पशु मरने लगे। घास, फूस, तृण, लता, बेलें तथा चार प्रकारके जीवसमुदाय भी नष्टप्राय हो गये। उस समय देवता, असुर तथा मनुष्योंमें बड़ा भारी हाहाकार मचा। युधिष्ठिर! अपने देशपर आयी हुई इस आपत्तिको देखकर राजर्षि सालंकायनको बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने सोचा 'जन्मसे लेकर अबतक मेरे द्वारा कोई पाप
९९६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
नहीं हुआ, मैं सदा संसार-सागरसे पार उतारनेवाले भगवान् श्रीहरिका पूजन करता हूँ। ब्राह्मण और ऋषि-मुनियोंको भी मैंने इच्छानुसार तृप्त किया है, तो भी मेरे राष्ट्रमें यह विपत्ति क्यों आयी।'
इस प्रकार विचार करते हुए राजाने बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् ब्रह्मवादी वसिष्ठ मुनिको भक्तिभावसे साष्टांग प्रणाम करके पूछा—ब्रह्मन्! यह बारह वर्षोंकी अनावृष्टि क्यों हुई है?
वसिष्ठजी बोले—महाबाहो! जनसमुदायमें महर्षियोंके वचन सुनकर उसीके अनुसार कोई उपाय करना चाहिये।
तब राजाने जनसभामें आसनपर बैठे हुए महर्षियोंके पास जाकर अनावृष्टिका कारण पूछा। उनके पूछनेपर महर्षिलोग इस प्रकार बोले—'राजन्! भूत और भविष्य-कालके तत्त्वको जाननेवाले गुरु एवं महात्मा मार्कण्डेय मुनिके आश्रमपर जाकर ब्राह्मणोंके साथ इस प्रश्नपर विचार करो। वे मुनि जो-जो धर्म बतावें, वह-वह तुम्हें पालन करना चाहिये।'
तदनन्तर राजा सालंकायन ब्राह्मणोंके साथ दिव्य रथपर आरूढ़ हो नर्मदाके तटपर गये और वहाँ मुनियोंके साथ बैठे हुए मुझ मार्कण्डेयको प्रणाम करके बैठ गये। तब मैंने उनसे कुशल-मंगल पूछा।
राजा बोले—ब्रह्मन्! आज आपके चरणारविन्दोंका दर्शन करनेसे मैं सकुशल हूँ। परंतु मेरे राष्ट्रका भविष्य क्या होगा, यह चिन्ता मुझे सदा पीड़ित किये रहती है।
मैंने कहा—प्रजाके कुमार्गगामी होनेसे, देवताओं और ब्राह्मणोंको कष्ट पहुँचानेसे तथा वर्णाश्रमधर्मका लोप करनेसे जो महान् अधर्म होता है, वह धर्मको हानि पहुँचाता है। अतः इस संकटसे मुक्ति पानेके लिये तुम नर्मदाके तटपर आकर रुद्रयज्ञ करो और महादेवजीकी विधिपूर्वक आराधना करो। इससे वर्तमान उपद्रवकी शान्ति होगी, बादल इच्छाके अनुसार वर्षा करेंगे और पुनः सृष्टिका सारा कार्य पूर्ववत् चलने लगेगा। तुम भी पापदोषसे छूट जाओगे तथा राज्य और स्वर्ग पाओगे।
मुनिका यह वचन सुनकर राजाने मुनियोंसहित मुझे नमस्कार किया और कहा—महामुने! आपने कृपापूर्वक जो कुछ बताया है उसे मैं अपने ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह मानता हूँ। यह कहकर राजाने अयोध्यापुरीको सन्देश भेजकर अपनी रानियों और राजकुमारोंको यज्ञसामग्रीके साथ वहीं बुलवाया। उनके बुलानेपर महाराजकी एक हजार आठ रानियाँ, राजकुमार तथा घरका काम-काज करनेवाले अन्य सब लोग भी यज्ञसामग्रीसहित वहाँ उपस्थित हुए। तब राजा सालंकायन मुझे प्रणाम करके इस प्रकार बोले—'मुने! आज्ञा दीजिये कहाँ यज्ञ आरम्भ किया जाय?'
मैंने कहा—वैदूर्यपर्वतके पश्चिम भागमें यज्ञयूप और यज्ञमण्डप निर्माण कराओ तथा यज्ञकी अन्य सब सामग्रियोंका भी वहीं संग्रह कराओ।
तब राजाने यज्ञके लिये वसिष्ठ, वामदेव आदि बहुत-से ऋषियोंका वरण किया। यज्ञमण्डपमें सोनेके बड़े-बड़े खंभे लगाये गये, जिनसे वहाँ बड़ी शोभा हो रही थी। कुण्ड, वेदी और स्रुवा आदि सब सुवर्णमय थे। नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ तथा भाँति-भाँतिके रस तैयार किये गये थे। वेदपाठी ब्राह्मणोंद्वारा देवताओंका आवाहन और पूजन किया गया। होमकुण्डमें अग्निका आधान हुआ। धूमरहित अग्नि प्रज्वलित हो उठी। वेदमन्त्रोंके उच्चारणसे आकाश गूँज उठा। आहुतियाँ दी जाने लगीं। इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञ पूर्ण होनेपर जब सब लोग अवभृथ-स्नानके लिये नर्मदामें गये तब उसका जल सूखा दिखायी दिया। यह देख राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने मुनिवर दुर्वासाजीसे पूछा—'यह क्या हुआ? वर्षा भी कहीं नहीं हुई और नर्मदाका जो पुराना जल था वह भी सूख गया। इसका क्या कारण है?'
राजाका प्रश्न सुनकर दुर्वासा बोले—राजन्! जल तो सभी लोकोंको अभीष्ट है। तप, होम और वेदमन्त्र ब्राह्मणोंके अधीन हैं और यज्ञरक्षा