संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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शिकार खेलनेके लिये विन्ध्यपर्वतपर आया और नर्मदाके तटपर उसने अपना पड़ाव डाल दिया। शिकार खेलते-खेलते वह जमदग्निके आश्रमपर गया और इस प्रकार बोला— 'मुने! यह गौ तुम्हारे योग्य नहीं है। इसे मुझे दे दो।' कार्तवीर्यकी यह बात सुनकर मुनिवर जमदग्नि बहुत देरतक सोच-विचारमें पड़े रहे। उन्हें कुछ भी उत्तर न देते देख राजाने मुनिको मरवा दिया और स्वयं उनकी कामधेनुको बलपूर्वक हरकर ले जाने लगा। जब वह आश्रमसे बाहर निकला तब उस होमधेनुपर कोड़ोंकी मार पड़ने लगी। बार-बार ताड़ित होनेपर गौने शाप देते हुए कहा— 'अरे ओ नृपाधम! रेणुकानन्दन परशुराम तेरे समस्त कुलका संहार कर डालेंगे।' इस प्रकार शाप देकर कामधेनु पुनः स्वर्गको चली गयी। उस समय लोगोंमें महान् हाहाकार मच गया। सब कहने लगे— 'यह कौन दुराचारी आ गया, जिसने ब्राह्मणोंके कोपको बढ़ाया है।' तदनन्तर महावीर परशुरामने पिताके मारे जानेका समाचार सुना। सुनते ही वे प्रज्वलित अग्निकी भाँति क्रोधसे जल उठे और सहसा आश्रमपर आये। पिताको मारा गया देख क्रोधसे उनका पराक्रम दूना हो गया। वे सहसा उठकर माहिष्मतीपुरीकी ओर चल दिये। वहाँ कार्तवीर्य अर्जुनको देखकर परशुरामने क्रोधपूर्वक कहा— 'अरे ओ नराधम! खड़ा रह। मेरे पिताकी हत्या करके अब तू कहाँ जा सकता है?' ऐसा कहकर उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी हाथमें ली और कार्तवीर्यकी भुजारूपी वनको उसके मस्तकसहित काट डाला। उस समय मुनिवर परशुराम क्षत्रियजातिके लिये प्रलयंकर बन गये थे। महापराक्रमी दुरात्मा कार्तवीर्यके मारे जानेपर देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उसीके प्रति क्रोध होनेसे परशुरामजीने समूची पृथ्वीको क्षत्रियोंसे रहित कर दिया और इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके वे पिताके आश्रमपर लौट आये। माता तथा अन्यान्य मुनीश्वरोंको नमस्कार करके उन्होंने विधिपूर्वक परशुरामेश्वर महादेवकी स्थापना की। उसके समीप ही विशोका, एरण्डिका और पावनी नामवाली तीन शिलाएँ हैं। उन्हींपर परशुरामजीने पिताकी मरणोत्तरकालीन श्राद्ध आदि क्रियाएँ सम्पन्न कीं। उस स्थानपर एक कपिल वर्णकी शिला है, जो देवद्रोणीके नामसे विख्यात है। वहाँ पिण्डदान करनेसे पितर स्वर्गमें जाते हैं। राजन् ! इस प्रकार मैंने तुम्हें नर्मदापुरका माहात्म्य बतलाया है। इसके श्रवण और कीर्तनसे देवलोकमें देवत्वकी प्राप्ति होती है।
## शिवनेत्र कुण्ड तथा जनकतीर्थका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन् ! जहाँ बृहती और नर्मदाका संगम हुआ है, वहाँ एक निषाद प्रतिदिन भगवान् त्रिलोचनका पूजन करता था। एक दिन व्यतिपात और संक्रान्तिका योग आनेपर उसने फूल लेकर शिवमन्दिरमें प्रवेश किया। वहाँ जाकर उसने देखा कि भगवान्का तीसरा नेत्र ही नहीं है। उसके चित्तमें बड़ा विस्मय हुआ और वह सोचने लगा, किस पापात्माने भगवान्के नेत्रका अपहरण किया है। ऐसा कहकर उसने तीखे बाणसे अपना नेत्र उखाड़ लिया और उसे ही देवदेव महादेवके ललाटमें लगा दिया। ऐसा करते समय उसके मनमें तनिक भी भय, कम्पन और दीनता नहीं आने पायी। उसके हृदयका भाव भी नहीं बदला। इससे देवेश्वर महादेवजी उस निषादके ऊपर बहुत प्रसन्न हुए और हँसकर बोले— 'वत्स! तू मनोवांछित वरदान माँग ले।' भगवान् शिवके प्रसादसे उसकी बुद्धि और प्रकारकी (निर्मल) हो गयी और वह उन्हें साष्टांग प्रणाम करके बोला— 'देवेश्वर! ये सभी निषाद अपने मृग, पक्षी,