संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1018, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९८९
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! कलहंसद्वारा की हुई इस स्तुतिको सुनकर महादेवजी बोले—'महामते! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो।'
कलहंसने कहा—देव! इस स्थानपर कलहंसेश्वर नामक तीर्थ एवं शिवलिंग प्रकट हो और यहाँ किये हुए होम-दान आदि सत्कर्म अक्षय बने रहें। जो मनुष्य स्वाधीन या पराधीन होकर यहाँ मृत्युको प्राप्त हो, वह आपकी आज्ञासे स्वर्गलोकमें जाय। कल्याणकारी महादेव! जो इस स्तोत्रके द्वारा आपकी स्तुति करें, वे बड़े-से-बड़े पापी क्यों न हों, इस तीर्थके प्रभावसे सभी शिवलोकको चले जायँ।
महादेवजी बोले—मुने! इस चराचर त्रिलोकीमें जो जिस-जिस वस्तुकी कामना करेगा, उसे इस तीर्थमें वह सब कुछ निःसन्देह प्राप्त होगी।
ऐसा कहकर भगवान् शिव कैलासपर्वतपर चले गये। तदनन्तर जितेन्द्रिय मुनि कलहंस भी ब्रह्मनिष्ठ मुनियोंके साथ भगवान् शिवके धाममें जाकर दिव्य भोगोंका उपभोग करने लगे। युधिष्ठिर! यह मैंने जिन कलहंसका यश तुम्हें सुनाया है, वे स्वारोचिष मन्वन्तरके आदि कल्पमें हुए थे। कलहंसके इस उपाख्यानका श्रवण और कीर्तन करनेसे कलियुगमें मनुष्य कष्ट नहीं पाते। वे पुत्र और स्त्रियोंसे संयुक्त होते हैं और पाप, माया तथा मोहसे उनका पिण्ड छूट जाता है; क्योंकि इस उपाख्यानके द्वारा वे मन, वाणी और क्रियासे महादेवजीका चिन्तन और स्मरण करते हैं।
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नर्मदापुरका माहात्म्य, जमदग्निको कामधेनुकी प्राप्ति, कार्तवीर्यद्वारा मुनिका वध और धेनुका अपहरण तथा परशुरामद्वारा कार्तवीर्यका वध
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजेन्द्र ! नर्मदाके उत्तर तटपर कपिलासंगमके बाद वैदूर्यके पश्चिम भागमें नर्मदापुर नामक स्थान विख्यात है। वहाँ बहुत-से देवर्षि, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, तपस्वी तथा व्यवसायी लोग भी निवास करते थे। नर्मदापुरके निवासियोंमेंसे एक जमदग्नि नामक मुनि भी थे, जो सदा शिवभक्तिमें तत्पर रहते थे। वे प्रतिदिन नर्मदासंगममें स्नान करके नाना प्रकारके गन्ध-पुष्प तथा अगुरु आदि मनोहर उपचारोंद्वारा भगवान् महेश्वरकी पूजा करते और दक्षिणामूर्तिकी शरण लेकर शिवमन्त्रके जपमें संलग्न रहते थे। एक मासतक इस प्रकार जपमें लगे हुए मुनिको सिद्धेश्वर लिंगस्वरूप देवदेव महेश्वरने प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'ब्रह्मन् ! मैं तुम्हारी भक्ति तथा रुद्र-जपसे सन्तुष्ट हूँ।'
जमदग्नि बोले—परमेश्वर ! मुझे होम और यज्ञ-क्रियाके लिये कामधेनु प्रदान कीजिये। क्योंकि धर्म-कर्म और शुभ अनुष्ठानके लिये, शिवपूजा और तर्पणके लिये तथा देवकार्य और पितृकार्यकी सिद्धिके लिये गौओंको ही अत्यन्त पवित्र माना गया है।
महादेवजीने कहा—महाभाग! तुम्हें समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये यह कामधेनु दी जा रही है।
ऐसा कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। जमदग्निमुनि जिन-जिन कामनाओंके लिये कामधेनुसे याचना करते, वे सब उन्हें प्राप्त हो जाती थीं। अब वे सोनेके पात्रमें भाँति-भाँतिके मनोवांछित भोज्य-पदार्थ परोसकर सहस्रों ऋषियोंको प्रतिदिन इच्छानुसार भोजन कराने लगे। माननीय ब्रह्मर्षि और देवतालोग भी मुनिवर जमदग्निके आश्रमपर आकर उनकी कीर्ति बढ़ाने लगे।
इस प्रकार कुछ समय व्यतीत होनेपर एक दिन राजा कार्तवीर्य अपनी माहिष्मतीपुरी छोड़कर