भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1017

९८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कलहंसने कहा—देवराज! मैं भगवान् शंकरको छोड़कर और किसी देवतासे वरदानकी याचना नहीं करूँगा।

उनके ऐसा कहनेपर इन्द्र सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न हो लौट गये। कलहंसकी पराभक्तिको जानकर देवाधिदेव महेश्वरने उन्हें अपने नीलकण्ठ त्रिलोचन स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराया। महादेवजीका वह स्वरूप देखकर मुनिश्रेष्ठ कलहंसने साष्टांग प्रणाम किया और इस प्रकार उनकी स्तुति की—‘महादेव! आपको नमस्कार है। नीलकण्ठ! त्रिलोचन! आपको नमस्कार है। आप कल्याणस्वरूप और परम शान्त हैं, आपको नमस्कार है। हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले महादेव! आपको नमस्कार है। सबको जन्म देनेवाले भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनका दूसरा कोई स्वामी नहीं है, उन महेश्वरको बार-बार नमस्कार है। महादेव इत्यादि नामोंसे जिनकी स्तुतिकी जाती है, उन भगवान् त्रिलोचनको नमस्कार है। ॐ कल्याणकी प्राप्ति करानेवाले देवता शिवको नमस्कार है। भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, चन्द्रमा, रुद्र, अन्धकार और प्रकाशमय सूर्य जिनके स्वरूप हैं, जो भयंकर प्रलयंकर अग्नि हैं, उन भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। पंचमुख शम्भो! आपको नमस्कार है। महाशिव! आपको नमस्कार है। ब्रह्माजीका लोक, वन और पाताल जिनका स्वरूप है तथा जिनके कण्ठमें नील चिह्न शोभा पा रहा है, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। ब्रह्म, शर्व, सुरेशान, हरि तथा हर आदि नामोंसे जिनके ही स्वरूपका बोध होता है, उन भगवान् शिवको बारंबार नमस्कार है। ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और चराचर जगत्स्वरूप आपको नमस्कार है। प्रभो! आप ही पातालनिवासी हाटकेश्वर अथवा स्वर्णरूप हैं, आपको नमस्कार है। उमानाथ! आपको नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव एवं सर्वज्ञ परमात्मा आप ही हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप ही सद्योजात, अघोर एवं तत्पुरुष कहलाते हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आपके द्वारा यह सम्पूर्ण चराचर त्रिलोकी व्याप्त है। आप आदि, मध्य तथा अन्तस्वरूप हैं। कलि और कालस्वरूप! आपको नमस्कार है। श्रीकण्ठ! नागेन्द्रभूषण! आपका आधा शरीर उमास्वरूप और आधा उमावल्लभरूप है, आपको नमस्कार है। आपके गुण तथा रूप अनन्त हैं। आप सर्पोंका यज्ञोपवीत धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, बुद्धि, मन और अहंकार—ये आठ तत्त्व आपकी आठ मूर्तियाँ हैं। अष्टमूर्ते! आपको नमस्कार है। आप ही सूर्य, अर्यमा, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्क, सविता, रवि, गभस्तिमान्, काल, मृत्यु और प्रकाश करनेवाले धाता—ये बारह आदित्यरूप हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश भी आप ही हैं। चन्द्रमा, बृहस्पति, शुक्र, बुध और मंगल भी आपके ही स्वरूप हैं। इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु (सूर्य), शुचि (अग्नि), शौर्य (विष्णु) तथा जनेश्वर (राजा) भी आप ही हैं। विष्णु और ब्रह्मा आदि देवता आप की ही कला हैं। चारों वेद, कुबेर, यमराज भी आपके ही स्वरूप हैं। कला, काष्ठा, मुहूर्त, पक्ष, मास, ऋतु और संवत्सर आदि कालचक्र भी आप ही हैं। विभावसु (अग्नि), पुरुष (अन्तर्यामी), शाश्वत योग, व्यक्त, अव्यक्त, सनातन, परमेश्वर, लोकाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, विश्वकर्मा, अन्धकारनिवारक, जलके अधिष्ठाता वरुण, शीतराशि, मेघ, जीवनरूप जल, शत्रुनाशक, भूत, यज्ञ और भूतनाथ भी आप ही हैं। समस्त लोकपाल आपकी सेवा करते हैं। आप ही मनु, सुपर्ण (बुद्धि) तथा भूतादि (अहंकार) हैं। सदाशिव! आपको नमस्कार है। प्रभो! मैंने स्तुतिके बहाने अपनी जिह्वाकी चपलताका परिचय देकर आपको कष्ट ही पहुँचाया। ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंको भी जिनका अन्त नहीं मिलता, उन्हीं आप शिवकी स्तुति संसार-समुद्रमें डूबे हुए प्राणियोंमेंसे कोई भी प्राणी कैसे कर सकता है। शूलपाणे! मैंने अज्ञान अथवा ज्ञानसे जो कुछ भी अनुचित बात कह दी है, उसके लिये क्षमा करें।'