संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1016, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९८७
निषाद निन्दित कर्मसे युक्त होनेपर भी प्राणियोंके मनमें प्रीति उत्पन्न करके इन जलचारी मत्स्योंके साथ स्वर्गलोकमें जायँ। मैं नरकको देखूँ या स्वर्गमें निवास करूँ, किंतु मेरे द्वारा मन, वाणी, शरीर और क्रियासे जो कुछ भी पुण्यकर्म बना हो, उससे ये सभी दुःखार्त प्राणी शुभ गतिको प्राप्त हों।
तदनन्तर शुद्धचित्तवाले महर्षि आपस्तम्बकी सत्यवाणीके प्रभावसे वे सभी मल्लाह मछलियोंके साथ स्वर्गलोकमें चले गये। मछलियोंसहित उन मत्स्यजीवी निषादोंको स्वर्गमें गया हुआ देख मन्त्रियों और सेवकोंके साथ राजा नाभागको बड़ा विस्मय हुआ। वे इस प्रकार बोले—'कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सदा संतों एवं पवित्र जलवाले तीर्थोंका सेवन करना चाहिये। इस जगत्में एक क्षणके लिये भी उनका संग किया जाय तो वह कभी निष्फल नहीं होता। अतः साधु-महात्माओंके पास बैठे और उन्हींके साथ उत्तम कथा वार्ता करे।'
तदनन्तर आपस्तम्ब मुनि एवं महातपस्वी लोमशने नाना प्रकारके उत्तम पद सुनाकर राजाको बोध प्राप्त कराया। तब राजाने परम दुर्लभ धर्ममयी बुद्धि धारण की। तत्पश्चात् वे दोनों महर्षि राजा नाभागकी प्रशंसा करते हुए बोले—'अहो! राजेन्द्र! तुम धन्य हो, क्योंकि तुम्हारी बुद्धि धर्ममें तत्पर हुई है। मनुष्योंके लिये धर्म परम दुर्लभ है, विशेषतः राजाओंके लिये तो वह और भी दुर्लभ है। यदि राजा राज्यमदसे उन्मत्त होकर स्वधर्मका परित्याग न करे तो उससे बढ़कर दूसरा कौन हो सकता है? धर्म ही ध्रुव है—वह सदा अटल रहनेवाला है। राज्य तो मोहरूप अथवा मोहका आश्रय है। वह स्थिर रहनेवाला नहीं। परंतु राज्यविषयक मोह होनेपर नरककी प्राप्ति अत्यन्त ध्रुव है। अतः विद्वान् पुरुष राज्यकी निन्दा करते हैं। विषयलोलुप अविवेकी मनुष्य ही राज्यको मान्यता देते हैं। मनीषी पुरुष तो उसे सदा नरकके तुल्य देखते हैं। अतः महाराज! यदि तुम अपने लिये सनातन गति चाहते हो तो तुम्हें अपने मनमें शोक, मोह और मदको कभी स्थान नहीं देना चाहिये।'
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर वे दोनों महात्मा आपस्तम्ब और लोमश अपने-अपने आश्रमको चले गये। राजा नाभागने भी वरदान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपने नगरमें प्रवेश किया। महाराज! इस तीर्थमें स्नान करके मत्स्येश्वरकी पूजा करो। इसी तीर्थके प्रभावसे महाभाग आपस्तम्ब और मत्स्यजीवी निषाद मछलियोंके साथ दिव्यलोकको प्राप्त हुए। वे सब आज भी दिव्य कान्ति धारण करके वैष्णवधाममें विहार करते हैं।
कलहंसेश्वर तीर्थका प्रादुर्भाव और उसका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! अब मैं पापोंका नाश करनेवाले दूसरे तीर्थका माहात्म्य बताऊँगा। नर्मदाके तटपर कलहंस नामसे विख्यात एक देवर्षि ध्यान लगाया करते थे। उनके मनोहर आश्रममें बहुत-से ब्रह्मर्षि निवास करते थे। वे शाक और मूल-फल खाकर जप और ध्यानमें तत्पर रहते थे। युधिष्ठिर! समस्त प्राणियोंके हितमें संलग्न रहनेवाले कलहंसजी भगवान् शिवके ध्यानमें स्थित हो पंद्रह हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़े रहे। उनकी तपस्या और ध्याननिष्ठासे इन्द्रको बड़ा भय हुआ और वे कुबड़े तथा नाटे ब्राह्मणका रूप धारण करके कलहंसके आश्रमपर गये। वहाँ पहुँचकर उन वृद्ध ब्राह्मणने पूछा—'तपोधन! आप किस उद्देश्यसे तपस्या करते हैं?'
कलहंसने हँसते हुए कहा—महाभाग! मैं आपको जानता हूँ। आप देवताओंके स्वामी इन्द्र हैं। मैं इन्द्रपद नहीं चाहता। आप इच्छानुसार राज्य कीजिये। मैं महादेवजीकी आराधना करता हूँ और किसी देवताकी नहीं।
महर्षिका यह वचन सुनकर इन्द्र बोले—महाभाग! आप मुझसे वर माँगिये, जिससे आपको शंकरजीका दर्शन होगा।