संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अत्यन्त तुच्छ, दीन एवं विषयी मनुष्यकी तो बात ही क्या है?
लोमशने कहा—महाराज ! तुम उनका मूल्य देनेमें समर्थ हो। श्रेष्ठ द्विज जगत्के लिये पूजनीय हैं और गौएँ भी दिव्य एवं पूजनीय मानी गयी हैं। अतः तुम उनके लिये मूल्यके रूपमें 'गौ' ही दो।
लोमशजीका यह वचन सुनकर राजा नाभाग मन्त्री और पुरोहितोंके साथ बहुत प्रसन्न हुए और हर्षमें भरकर बोले—भगवन्! उठिये-उठिये। मुनिश्रेष्ठ ! यह आपके लिये योग्यतम मूल्य प्रस्तुत कर दिया गया है।
आपस्तम्बने कहा—अब मैं प्रसन्नतापूर्वक उठता हूँ। राजन् ! तुमने उचित मूल्य देकर मुझे खरीदा है। मैं गौओंसे बढ़कर दूसरा मूल्य कोई ऐसा नहीं देखता जो परम पवित्र एवं पापोंका नाश करनेवाला हो। गौओंकी परिक्रमा करनी चाहिये। वे सदा सबके लिये वन्दनीय हैं। गौएँ मंगलका स्थान हैं, दिव्य हैं। स्वयं ब्रह्माजीने इन्हें दिव्य गुणोंसे विभूषित बनाया है। जिनके गोबरसे ब्राह्मणोंके घर और देवताओंके मन्दिर भी शुद्ध होते हैं, उन गौओंसे बढ़कर अन्य किसको बतावें। गौओंके मूत्र, गोबर, दूध, दही और घी—ये पाँचों वस्तुएँ पवित्र हैं और सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करती हैं। गायें मेरे आगे रहें, गायें मेरे पीछे रहें, गायें मेरे हृदयमें रहें और मैं गौओंके मध्यमें निवास करूँ।*
जो प्रतिदिन तीनों सन्ध्याओंके समय नियमपरायण एवं पवित्र होकर 'गावो मे चाग्रतो नित्यम्' इत्यादि श्लोकका पाठ करता है। वह सब पापोंसे मुक्त होता और स्वर्गलोकमें जाता है। प्रतिदिन भक्तिभावसे गौओंको गोग्रास देनेमें श्रद्धा रखनी चाहिये। जो प्रतिदिन गोग्रास अर्पण करता है, उसने अग्निहोत्र कर लिया, पितरोंको तृप्त कर दिया और देवताओंकी पूजा भी सम्पन्न कर ली। गोग्रास देते समय प्रतिदिन इस मन्त्रार्थका चिन्तन करे। सुरभिकी पुत्री गोजाति सम्पूर्ण जगत्के लिये पूज्य है, वह सदा विष्णुपदमें स्थित है और सर्वदेवमयी है। मेरे दिये हुए इस ग्रासको गौमाता देखें और ग्रहण करें।†
ब्राह्मणोंकी रक्षा करने, गौओंको खुजलाने और सहलाने तथा दीन-दुर्बल-दुःखी प्राणियोंका पालन करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यज्ञका आदि, अन्त और मध्य गौओंको ही बताया गया है। वे दूध, घी और अमृत सब कुछ देती हैं। इसलिये गौओंका दान करना चाहिये और उनकी प्रतिदिन पूजा करनी चाहिये। ये गौएँ स्वर्गलोकमें जानेके लिये सीढ़ी बनायी गयी हैं।
गौओंके इस उत्तम माहात्म्यको सुनकर निषादोंने महाभाग आपस्तम्बजीको प्रणाम करके कहा—प्रभो! हमने सुना है कि साधुपुरुषोंके सम्भाषण, दर्शन, स्पर्श, श्रवण और कीर्तन सभी पवित्र करनेवाले हैं। हमने यहाँ आप-जैसे महात्माके साथ वार्तालाप किया और आपका दर्शन भी कर लिया। अब हम आपकी शरणमें आये हैं, आप हमारे ऊपर अनुग्रह कीजिये।
आपस्तम्बजी बोले—इस गौको तुमलोग ग्रहण करो। इससे तुम सब लोग पापमुक्त हो जाओगे।
* गावः प्रदक्षिणी कार्या वन्दनीया हि नित्यशः। मङ्गलायतनं दिव्याः सृष्टास्त्वेताः स्वयम्भुवा ॥
अप्यागाराणि विप्राणां देवतायतनानि च। यद्गोमयेन शुद्ध्यन्ति किं ब्रूमो ह्यधिकं ततः॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिस्तथैव च। गवां पञ्च पवित्राणि पुनन्ति सकलं जगत्॥
गावो मे चाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च। गावो मे हृदये चैव गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥
(स्क० पु०, आव० रे० १३। ६२-६५)
† तेनाग्नयो हुताः सम्यक् पितरश्चापि तर्पिताः। देवाश्च पूजितास्तेन यो ददाति गवाह्निकम् ॥
गोग्रास-समर्पणमन्त्रः—
सौरभेयी जगत्पूज्या नित्यं विष्णुपदे स्थिता। सर्वदेवमयी ग्रासं मया दत्तं प्रतीक्षताम् ॥
(स्क० पु०, आव० रे० १३। ६८-६९)