भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1014
  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९८५

देखकर उनका हृदय करुणासे भर आया। वे दुःखी होकर बोले—'भेददृष्टि रखनेवाले जीवोंके द्वारा दुःखमें डाले हुए प्राणियोंकी ओर जो अपने सुखकी इच्छासे ध्यान नहीं देता, उससे बढ़कर क्रूर इस संसारमें दूसरा कौन है। अहो, स्वस्थ प्राणियोंके प्रति यह निर्दयतापूर्ण अत्याचार तथा स्वार्थके लिये उनका व्यर्थ बलिदान—कैसे आश्चर्यकी बात है? ज्ञानियोंमें भी जो केवल अपने ही हितमें तत्पर है, वह श्रेष्ठ नहीं है; क्योंकि यदि ज्ञानी पुरुष भी अपने स्वार्थका आश्रय लेकर ध्यानमें स्थित होते हैं तो इस जगत्के दुःखातुर प्राणी किसकी शरणमें जायँगे। जो मनुष्य स्वयं अकेला ही सुख भोगना चाहता है, उसे मुमुक्षु पुरुष पापीसे भी महापापी बताते हैं। मेरे लिये वह कौन-सा उपाय है, जिससे मैं दुःखित चित्तवाले सम्पूर्ण जीवोंके भीतर प्रवेश करके अकेला ही सबके दुःखोंको भोगता रहूँ। मेरे पास जो कुछ भी पुण्य है, वह सभी दीन-दुःखियोंके पास चला जाय और उन्होंने जो कुछ पाप किया हो, वह सब मेरे पास आ जाय। इन दरिद्र, विकलांग तथा रोगी प्राणियोंको देखकर जिसके हृदयमें दया नहीं उत्पन्न होती, वह मेरे विचारसे मनुष्य नहीं, राक्षस है। जो समर्थ होकर भी प्राण-संकटमें पड़े हुए भयविह्वल प्राणियोंकी रक्षा नहीं करता, वह उसके पापको भोगता है। अतः मैं इन दीन-दुःखी मछलियोंको दुःखसे मुक्त करनेका कार्य छोड़कर मुक्तिको भी वरण करना नहीं चाहता, फिर स्वर्गलोककी तो बात ही क्या है?'

मुनिका यह वचन सुनकर मल्लाहलोग बहुत घबराये। उन्होंने महाराज नाभागके पास जाकर सब बातें यथार्थरूपसे बतलायीं। नाभाग भी वह वृत्तान्त सुनकर अपने मन्त्रियों तथा पुरोहितोंके साथ मुनिका दर्शन करनेके लिये तुरंत ही वहाँ आये। राजाने उन देवकल्प महर्षिका भलीभाँति पूजन करके कहा—'भगवन्! आज्ञा दीजिये, मैं आपकी कौन-सी सेवा करूँ?'

आपस्तम्ब बोले—राजन्! ये मल्लाह बड़े दुःखसे जीविका निर्वाह करते हैं। इन्होंने मुझे जलसे बाहर निकालकर बड़ा भारी परिश्रम किया है। अतः तुम मेरा जो उचित मूल्य समझो, वह इन्हें दे दो।

नाभाग बोले—भगवन्! मैं इन निषादोंको आपके बदलेमें एक लाख स्वर्णमुद्रा देता हूँ।

आपस्तम्बने कहा—राजन्! मेरा मूल्य एक लाख ही नियत करना उचित नहीं है। मेरे योग्य जो मूल्य हो, वह इन्हें अर्पण करो। इस सम्बन्धमें अपने मन्त्रियोंके साथ विचार कर लो।

नाभाग बोले—द्विजश्रेष्ठ! यदि पूर्वोक्त मूल्य उचित नहीं है तो इन निषादोंको एक करोड़ दे दिया जाय और यदि यह भी आपके योग्य न हो तो आज्ञा होनेपर और अधिक भी दिया जा सकता है।

आपस्तम्ब बोले—राजन्! मैं एक करोड़ या इससे अधिक मूल्यके योग्य नहीं हूँ। मेरे योग्य मूल्य चुकाओ। ब्राह्मणोंसे सलाह ले लो।

राजाने कहा—यदि ऐसी बात है तो मेरा आधा या पूरा राज्य इन निषादोंको दे दिया जाय। मेरे मतमें यह मूल्य आपके योग्य होगा। किंतु आप किस मूल्यको पर्याप्त मानते हैं, यह स्वयं बतानेकी कृपा करें।

आपस्तम्ब बोले—राजन्! तुम्हारा आधा या पूरा राज्य भी मेरे लिये उचित मूल्य नहीं है। मूल्य वह दो, जो मेरे योग्य हो। (समझमें न आता हो तो) ऋषियोंके साथ विचार कर लो।

महर्षिका यह वचन सुनकर मन्त्रियों और पुरोहितोंके साथ विचार-विमर्श करते हुए धर्मात्मा राजा नाभाग बड़ी चिन्तामें पड़ गये। इसी समय महातपस्वी लोमश ऋषि वहाँ आ गये। उन्होंने नाभागसे कहा—'राजन्! भय न करो। मैं मुनिको सन्तुष्ट कर लूँगा।'

राजा बोले—महाभाग! आप ही इनका मूल्य बता दें। अन्यथा ये महर्षि क्रोधमें आकर मेरे कुटुम्ब, कुल, बन्धु-बान्धव तथा समस्त चराचर त्रिलोकीको भस्म कर सकते हैं, फिर मुझ-जैसे