संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जल एवं तिलकी अंजलि देनेसे उन सबकी उत्तम मुक्ति हो जायगी।
सरस्वतीका यह वचन सुनकर राजाने उनको प्रणाम किया और रानियों तथा परिवारके साथ प्रसन्नतापूर्वक कन्यापुरमें लौट आये। वहाँ जाकर राजाने सेवकोंको आज्ञा दी कि 'तुम सब लोग सब आवश्यक सामान एकत्र करके यज्ञकी सामग्री भी साथ लेकर नर्मदा नदीके तटपर चलो।' यह आदेश पाकर सेवकोंने अन्य सामानोंके साथ-साथ उचित रीतिसे उन ब्राह्मणों और गौओंका अस्थिभस्म भी वहाँ पहुँचा दिया। तदनन्तर वह अस्थिभस्म आदि नर्मदाके जलमें मन्त्रोच्चारणपूर्वक बहा दिया गया और उत्तम विधिसे पूजन करके हाथ जोड़े हुए राजाने देवताओं और ब्राह्मणोंको तृप्त किया। उस स्थानपर एक स्रोत प्रकट होकर नर्मदाके जलमें जा मिला। वह नर्मदासंगम 'गांजाल' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। जहाँ गांजाल है, वहीं एक सिद्ध लिंग भी है। जो ब्राह्मण और गौ उस प्रलयाग्निद्वारा दग्ध हुए थे, वे दिव्य विमानपर आरूढ़ हो आशीर्वाद देते हुए हरिकेशकी प्रशंसा करने लगे—'महाभाग! तुम्हारे प्रसादसे हम सब लोग दिव्यलोकमें देवभावको प्राप्त हो गये।' ऐसा कहकर वे सभी विष्णुधाममें चले गये।
राजाओंमें श्रेष्ठ हरिकेश भी अत्यन्त प्रसन्नताके साथ लोकपावनी नर्मदादेवीको नमस्कार करके एकाग्रचित्त हो उनकी स्तुति करने लगे—सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदे! आपको नमस्कार है। आपके जलमें जहाँ कहीं भी स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है, इस घोर संसार-सागरमें फिर उसका जन्म नहीं होता। कोई भी बलवान् सहस्रों जन्मोंमें भी आपके वेगको रोक नहीं सकता। आपने सम्पूर्ण चराचर विश्वको अपने जलसे व्याप्त कर रखा है। महादेवि! आपके ही प्रसादसे मनुष्यकी इस भवसागरसे मुक्ति होती है।
राजाका यह स्तोत्र सुनकर नर्मदादेवीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और इस प्रकार कहा—महाभाग! तुम अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो। हरिकेशने कहा—'देवि! आप मुझे पवित्र कर दें। आपके जलमें स्नान, अवगाहन, पान तथा आपके नामका स्मरण एवं कीर्तन करनेसे तत्काल ही सात जन्मोंके किये हुए पाप नष्ट हो जायँ।' नर्मदा बोलीं—'नृपश्रेष्ठ! 'एवमस्तु'। ऐसा कहकर नर्मदा देवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं।
तदनन्तर चक्रवर्ती राजा हरिकेशने साष्टांग प्रणाम करके इच्छानुसार चलनेवाले रथपर आरूढ़ हो अपने नगरमें प्रवेश किया। वहाँ अन्तःपुर एवं परिवारके साथ उन्होंने प्रचुर भोगोंका उपभोग किया और अन्तकाल आनेपर वे देवलोकको प्राप्त हुए।
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नर्मदा और मत्स्याके संगमका माहात्म्य, महर्षि आपस्तम्बके द्वारा गौओंकी महत्ताका प्रतिपादन तथा तीर्थके प्रभावसे निषादोंका मछलियोंसहित उद्धार
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! पूर्वकालमें आपस्तम्ब नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि हो गये हैं, जो ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ एवं उपवासव्रतमें तत्पर रहनेवाले थे। उन्होंने काम, क्रोध, लोभ और मोहको सदाके लिये त्यागकर नर्मदा और मत्स्याके संगमके जलमें प्रवेश किया था। जलके भँवरमें बैठे हुए महातपस्वी आपस्तम्बको मल्लाहोंने मछलियोंसहित जाल उठाते समय जलके बाहर खींच लिया। उन्हें इस दशामें देखकर वे निषाद भयसे व्याकुल हो उठे और मुनिके चरणोंमें प्रणाम करके इस प्रकार बोले—'ब्रह्मन्! हमने अनजानमें बड़े भारी अपराध कर डाले हैं, आप उन्हें क्षमा करें। इसके सिवा इस समय आपका प्रिय कार्य क्या है, उसके लिये आज्ञा दें।'
मुनिने देखा कि इन मल्लाहोंद्वारा यहाँकी मछलियोंका बड़ा भारी संहार हो रहा है। यह