भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1012

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९८३


पूजन करके मनुष्य सूर्यलोकमें सम्मानित होता है। उत्तर दिशामें शंकर नामक शिवलिंग बताया गया है। जो अमावास्यामें भगवान् शंकरका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। उसके बाद विश्वविख्यात संगमतीर्थ है, जहाँ नर्मदाके साथ दत्तात्रेया नदी मिली हुई है। वह उत्तरकी ओरसे आकर मिलती है। देवता और दैत्य सभी दत्तात्रेया नदीको मस्तक झुकाते हैं। वहाँ संगममें स्नान, दान और भगवान् विष्णुका पूजन करके मनुष्य श्रीहरिके लोकमें जाते हैं। मेधातिथि, कर, स्कन्द, सावार्णि, कौशिक, मनु, काश्यप, गालव तथा तपोनिधि मैत्रेय—ये और दूसरे भी उत्तम व्रतका पालन करनेवाले बहुत-से महर्षि इस तीर्थके प्रभावसे उत्तम सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं।

चन्द्रवंशमें सत्यधर्मपरायण देवानीक नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम हरिकेश रखा गया। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न महान् बलवान् चक्रवर्ती राजा हुआ। महात्मा हरिकेशने अनेक यज्ञ किये। उनकी राजधानी कन्यापुरमें थी, जो कुबेरकी अलकाके समान शोभा पाती थी। कन्यापुरकी समस्त प्रजा दीर्घायु और धन-धान्यसे सम्पन्न थी। श्रीशैल नामक पर्वतपर त्रिपुरारेके समीप तुंगभद्रा नामवाली एक नदी है जो मल्लिकार्जुनके दर्शनसे पाताल-गंगा कही गयी है। उस पुण्यतीर्थमें प्रतापी हरिकेशने सूर्यग्रहणके समय एक लाख गौ और एक सहस्र स्वर्णमुद्राकी व्यवस्था की। फिर सूर्यग्रहणसे पाँच दिन पूर्व उन्होंने वेदोंके विद्वान् एवं बहुश्रुत ब्राह्मणोंको बुलवाया। वे ग्रहणके समय इन सब गौओंका दान करना चाहते थे। ग्रहणसे पूर्व उन्होंने आग्नेयी इष्टि प्रारम्भ कर दी। दैवयोगसे उनके आहवनीय अग्निमें अत्यन्त तेजस्वी रुद्र देवतासम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा आहुति डाली गयी। उस समय पातालसे प्रलयकालके समान प्रज्वलित अग्नि प्रकट हुई, जिसने वहाँके दस हजार ब्रह्मचारियों और एक लाख गौओंको जलाकर भस्म कर दिया। वहाँका यज्ञमण्डप और नगर भी भस्मसात् हो गया। यह सब देखकर हरिकेशके मनमें बड़ा विषाद हुआ। वे अग्निमें समा जानेके लिये अपनी रानियों और समस्त मन्त्रियोंके साथ आसनसे उठकर खड़े हो गये। उस समय सब ओर बड़ा हाहाकार मचा। तब एक ब्राह्मणने कहा—‘महाभाग ! तुम श्रेष्ठ नगर कल्पग्राममें चले जाओ।’

राजा हरिकेश वहाँ जाकर मुनियोंकी आज्ञा पाकर तत्पश्चात् सोमयज्ञ करनेके लिये कुरुक्षेत्रको गये और वहाँ सरस्वती नदीकी शरण ली। वहाँ पहुँचकर उन्होंने शिव, विष्णु और सरस्वतीका स्तोत्र एवं जप किया। वे बोले—‘मैं कुरुक्षेत्रको जाऊँगा और कुरुक्षेत्रमें ही निवास करूँगा। कुरुक्षेत्रका नाम लेनेसे भी मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। सम्पूर्ण शब्दरूपी महौषधोंसे जिन्होंने समस्त जीवोंके कलंकको धो डाला है, जिनके तीर्थोंका मुनिगण सेवन करते हैं, वे सरस्वती-देवी मेरे पापोंका नाश करें।’

राजाका यह वचन सुनकर पापोंका अपहरण करनेवाली सरस्वतीने कहा—राजन् ! विषाद छोड़ो और मेरा श्रेष्ठ वचन सुनो। तुम्हारे यज्ञमें दस हजार ब्रह्महत्या तथा एक लाख गो-हत्या हुई है। इतने महान् पापसे छुटकारा दिलानेमें इस चराचर जगत्के भीतर एकमात्र नर्मदा नदी ही समर्थ है। नर्मदा समस्त पापोंका नाश करनेवाली है। मैं सूर्यग्रहणके अवसरपर बारहवें या चौबीसवें वर्ष सदैव नर्मदाके कोटितीर्थमें स्नान करनेके लिये जाया करती थी। इससे मैं भी परम शुद्ध हो गयी हूँ। नृपश्रेष्ठ ! नर्मदामें स्नान और शिवका पूजन करके एक श्रेष्ठ यज्ञ करो और उसमें बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा दो। उससे तुम्हारा उद्धार हो जायगा। जो ब्राह्मण और गौएँ वहाँ मृत्युको प्राप्त हुई हैं, उनकी हड्डियोंको ले जाकर नर्मदाजीके जलमें बहा दो। उस जलका स्पर्श होनेसे उन सबको देवलोककी प्राप्ति हो जायगी और नर्मदाके