भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1011, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1011

९८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

महामुनि मतंगका यह वचन सुनकर वसिष्ठजी बोले—महर्षे ! हमलोग तो गंगा-यमुनाके संगममें स्नान करके ही भोजन करेंगे। तब मतंगजीने हँसकर कहा—'अच्छा, आज यहीं गंगा-यमुनाके संगममें आपलोगोंका स्नान होगा।' ऐसा कहकर मुनिने ध्यानमें स्थित होकर गंगा-यमुनाका आवाहन किया। उनके आवाहनसे गंगा और यमुना दोनों नदियाँ तत्काल वहाँ चली आयीं। तब मतंगजीने कहा—'मुनिवरो ! अब आपलोग गंगा-यमुनाके संगममें स्नान करें।' सप्तर्षि महात्मा मतंगका यह अद्भुत कर्म देखकर मन-ही-मन बड़े विस्मित हुए। तदनन्तर उन मुनीश्वरोंने विधिपूर्वक स्नान किया और मतंग मुनिका पितृ-यज्ञ सम्पन्न कराकर स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। गंगा और यमुना दोनों ही नर्मदामें समा गयीं। इस प्रकार वहाँ सब पापोंका नाश करनेवाला श्रेष्ठ संगमतीर्थ प्रकट हुआ। जो मनुष्य सब धर्मोंसे सम्पन्न और शिवभक्तिमें तत्पर होकर सोमवती अमावास्याके दिन संगमतीर्थमें स्नान करता है, वह पहले और पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंका उद्धार करके तत्काल विशुद्ध होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। उसे सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। जो क्रोध और इन्द्रियोंको जीतकर लगातार छह महीनेतक प्रतिदिन वहाँ स्नान और महेश्वरकी पूजा करता है, वह किसी कारणसे यदि कभी म्लेच्छदेशमें या जहाँ कहीं भी मृत्युको प्राप्त हो जाय, अन्तमें भगवान् शिवके समीप ही जाता है।


धुवेश्वर, वाराह, चान्द्रायण, द्वादशादित्य तथा गांजालतीर्थकी महिमा, राजा हरिकेशकी शुद्धि

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! जो मानव ध्रुवतीर्थमें स्नान करके ध्रुवेश्वर महादेवजीका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह शुभ विद्याधरलोकमें एक लाख वर्षोंतक राजाके पदपर प्रतिष्ठित होता है। नर्मदातटपर एक नाक्षत्र नामक तीर्थ है, जहाँ सब पापोंका नाश करनेवाले ऋक्षेश्वर महादेव प्रतिष्ठित हैं। वहाँ सत्ताईस नक्षत्र सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। उस तीर्थमें स्नान करके लोग स्वर्गमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु होती है, वे फिर जन्म न लेकर मुक्त हो जाते हैं।

तदनन्तर 'वाराह' नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जहाँ कल्याणदायिनी नर्मदा 'शूकरा' कहलाती हैं। वहाँ एकादशी तिथिको स्नान करके शास्त्रोक्त दानादि सत्कर्म करनेके पश्चात् जो विष्णुपरायण व्रती पुरुष द्वादशीको शुद्ध भावसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदिके द्वारा भगवान् वाराहकी पूजा करता है, वह भगवान् विष्णुके वैकुण्ठधाममें सदा आनन्द भोगता है। जो ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए क्रोधको जीतकर वैष्णवधर्ममें तत्पर हो भक्तिपूर्वक वैष्णव ब्राह्मणोंको भोजन कराता है तथा विष्णुधर्म लिखवाकर श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको निवेदन करता है, उसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों देवता वर देते हैं। विद्यादानसे बड़ा और कोई दान नहीं है। उसके प्रभावसे दाताको सब फल प्राप्त हो जाता है।

तदनन्तर चान्द्रायण नामक एक उत्तम तीर्थ है। पूर्णिमा तिथिको जब चन्द्रमाका रोहिणी नक्षत्रसे योग हो, तब उस महोत्सवकी वेलामें सब सिद्धियोंको देनेवाले भगवान् चन्द्रभूषणकी पूजा करके मानव स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो परम धर्मात्मा पुत्र पूर्णिमा तथा सूर्यग्रहणके अवसरपर पितरोंके लिये तिल और जलकी अंजलि अथवा पिण्डदान देता है, उसके पापात्मा पितर भी तृप्त हो जाते हैं।

वहीं द्वादशादित्यतीर्थ है। वह उत्तरायण कालमें पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। राजन्! वहाँ संक्रान्तिकाल और विषुवयोगमें स्नान एवं सूर्यदेवका

संक्षिप्त स्कन्द पुराण · पृष्ठ 1011, कुल 1406 में से · BharatKosha