संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1010, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९८१
सोमतीर्थ, ब्रह्मकुण्ड, ब्रह्मेश्वर लिंग, सिद्धेश्वर लिंग तथा संगमतीर्थकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! कोटितीर्थके दक्षिण भागमें नर्मदाके तटपर ही सोमतीर्थ है, जो भगवान् सोम (चन्द्रमा)-द्वारा आराधित है। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु होती है, वे फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते हैं। सोमदेवके दक्षिण भागमें शक्रेश्वर महादेव विराजमान हैं। पूर्वकालमें इन्द्रने वहाँ सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये भगवान् शिवकी आराधना की थी। वहीं ब्रह्मकुण्ड नामसे प्रसिद्ध एक दूसरा तीर्थ है जहाँ नर्मदा नदीकी धारा उत्तरकी ओर बहती है और जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु निवास करते हैं। महाराज! वहाँ स्नान करके मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है। अमावास्या तथा व्यतिपात योगमें वहाँ तिल और जलकी अंजलि देने तथा श्राद्ध करनेसे पितरोंको अक्षय तृप्ति होती है। नृपश्रेष्ठ! जहाँ उत्तरवाहिनी नर्मदा, पश्चिमवाहिनी गंगा और पूर्ववाहिनी सरस्वती प्राप्त हों, उस क्षेत्रकी अवश्य यात्रा करो। ब्रह्मकुण्डके उत्तर भागमें सनातनदेव लक्ष्मीपति भगवान् मधुसूदन अम्बरीषके नामसे विख्यात हैं। राजन्! जो एकादशीको वहाँ स्नान करके भगवान्की पूजा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। उसीके पश्चिम भागमें हंसतीर्थ है। वहाँ भी स्नान करके जो श्राद्ध और दान करता है, वह हंसतीर्थके प्रभावसे तिर्यग्योनि (पशु-पक्षियोंकी योनि)-में नहीं जन्म लेता। उसके पश्चिम भागमें महाकाल नामसे प्रसिद्ध शिवलिंग है, जिसकी विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य भगवान् शिवके लोकमें जाता है। वहीं मातृतीर्थ नामसे प्रसिद्ध जो पुण्यस्थान है, उसमें मातृकेश्वर लिंग प्रतिष्ठित है। वहाँ स्नान करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। सप्तविंशोद्भवतीर्थमें स्नान करके पितरोंको जल और पिण्ड देनेसे मनुष्य समस्त मनोवांछित कामनाओंसे सम्पन्न होकर भगवान् शिवके लोकमें सम्मानित होता है। वहाँसे पश्चिम ब्रह्मेश्वर लिंग है, जिसकी आराधना साक्षात् ब्रह्माजीने की है। वह शीघ्र ही समस्त कामनाओंके अनुसार फल देनेवाला है। ब्रह्मेश्वरदेवके दर्शनसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। मंगल और चतुर्दशीको विधिपूर्वक उनकी पूजा करके शिवभक्तिमें तत्पर रहनेवाला मानव शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। उससे पश्चिम भागमें सिद्धेश्वर नामक प्रसिद्ध शिवलिंग है। उसीके समीप सब पापोंका नाश करनेवाला सिद्धेश्वर तीर्थ है। वहाँ स्नान करनेसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है और जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका फिर संसारमें जन्म नहीं होता। पौषमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको विधिपूर्वक उनकी पूजा करके मनुष्य स्वर्गलोकमें आदर पाता है।
उससे उत्तर भागमें विश्वविख्यात संगमतीर्थ है। वहाँ गंगा, यमुना और नर्मदाका नित्य संगम जानना चाहिये। महाराज! उसमें स्नान करनेवालेको अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। उस तीर्थमें पितरोंका श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। वह उनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला होता है।
**राजाने पूछा—**मुनिश्रेष्ठ! इस तीर्थमें गंगा और यमुना कैसे आयीं, यह प्रसंग विस्तारपूर्वक बतलाइये।
**मार्कण्डेयजी बोले—**राजन्! त्रिपुरीमें मतंग नामसे प्रसिद्ध एक धर्मपरायण राजर्षि रहते थे। वे भगवान् शिवके भक्त, महान् योगी और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे। एक दिन तपस्वी मतंग मुनिके समीप उसी मार्गसे जाते हुए सप्तर्षिगण आये। उन्होंने उन ऋषियोंको नमस्कार करके अर्घ्य और पाद्य आदिके द्वारा उन सबकी पूजा की। जब वे सब लोग कुशासनपर विराजमान हो गये, तब मतंग मुनि विनयपूर्वक बोले—‘महर्षियो! आज मैं धन्य हो गया; क्योंकि आज मेरे यहाँ श्राद्धके दिन आप-जैसे महात्मा ब्राह्मण पधारे हैं।'