भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1009, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1009

९८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सदा सबका कल्याण करनेवाले हैं, फिर मुझे मूढ़ देखकर भी (ज्ञानदानमें) विलम्ब क्यों करते हैं? हर! आप मेरी बढ़ी हुई तृष्णाको हर लें और मुझे स्थिर रहनेवाली लक्ष्मी प्रदान करें। महेश्वर! आपके तीर्थोंमें जानेमात्रसे जो पुण्य होता है, वह सदा ही मोहका उच्छेद, पापोंका विनाश और संसार-सागरसे उद्धार करता है, परंतु मुझ भाग्यहीनने उस पुण्यका संचय भी नहीं किया है।

महर्षि भृगुके द्वारा कहे हुए इस 'करुणाहृदय' नामक स्तोत्रका जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। इस स्तोत्रसे सन्तुष्ट होकर भगवान् शिवने भृगुसे कहा—'विप्रवर! तुम्हारे मनमें जिस-जिस वरकी अभिलाषा है, वह सब मैं तुझे दूँगा। साथ ही तुम्हें देवदुर्लभ उत्तम सिद्धि भी प्रदान करूँगा।'

भृगुने कहा—देवेश्वर! यदि आप सन्तुष्ट हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो पृथ्वीपर मेरे ही नामसे इस तीर्थकी प्रसिद्धि हो। महेश्वर! मेरी दूसरी प्रार्थना यह है कि आप अपनेको उस भृगुक्षेत्रमें अवतरित करें, यहाँ सदा ही आपकी स्थिति बनी रहे।

भगवान् शंकर बोले—विप्रवर! ऐसा ही हो। तुम्हारे ही नामसे इस क्षेत्रकी ख्याति होगी।

युधिष्ठिर! इस भृगुक्षेत्रमें आठ रुद्र बताये गये हैं—भृगु, शूली, वेद, चन्द्र, मुख, अट्टहास, काल तथा कराली। इन सबके कारण भृगुक्षेत्र बहुत ही मनोरम और धन्य-धन्य हो गया है। अयन, विषुव, संक्रान्ति, ग्रहण, व्यतीपात, दिनक्षय और गजच्छाया आदि योगोंमें इस तीर्थके भीतर जो स्नान, दान, होम, तर्पण और देवपूजन आदि सत्कर्म किये जाते हैं, वे सब अक्षय होते हैं। जो भृगुक्षेत्रमें स्नान करके वहाँ एक रात्रि निवास करता है, उसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह सैकड़ों यज्ञोंद्वारा भी उपलब्ध होनेवाला नहीं है। संयमी मनुष्य भृगुतीर्थकी प्रदक्षिणा करके तत्काल विशुद्ध होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस तीर्थके माहात्म्यसे मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।

प्राचीन कालमें मोहन नामसे प्रसिद्ध एक गन्धर्वराज था। वह ब्रह्माजीकी सभामें स्थित होकर सदा उनकी आराधनामें तत्पर रहता था। एक दिन महर्षि दुर्वासाको वहाँ उपस्थित देख उसने उनकी हँसी उड़ायी। यह देख मुनिने शाप दिया, 'अरे! तुझे अपने सुन्दर रूपका बड़ा अभिमान है, तू जा चित्रकुष्ठ (चितकबरी कोढ़)-से पीड़ित रह।' उस शापसे भयभीत होकर गन्धर्वराजने मुनिसे कहा—'विप्रवर! मुझ अज्ञानीपर प्रसन्न होकर आप अपने शापका अन्त कीजिये।'

दुर्वासा बोले—गन्धर्वराज! तू त्रिपुरीमें नर्मदाके तटपर जा। वहाँ समस्त भयोंका नाश करनेवाले साक्षात् भगवान् सूर्य निवास करते हैं। नर्मदाके उत्तर तटपर उनका स्थान भास्करतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। उसमें स्नान करनेसे तुमपर लगा हुआ शाप निवृत्त हो जायगा।

तब वह गन्धर्वराज दुर्वासामुनिको प्रणाम करके नर्मदातटपर गया। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उसने भगवान् भास्करकी आराधना की। तीन राततक आराधना होनेपर चौथे दिन प्रातःकाल भगवान् सूर्यने कहा—'महाभाग! तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।' गन्धर्वने कहा—'देवेश्वर! आपके प्रसादसे मेरा यह चित्रकुष्ठ निवृत्त हो जाय।' भगवान् सूर्य बोले—'एवमस्तु।' तदनन्तर वह शापसे मुक्त होकर अपने लोकको चला गया।

युधिष्ठिर! भास्करतीर्थमें पुत्रकी कामनासे सावित्री-देवीकी आराधना की जाती है। यहाँ स्नान करके सूर्यदेवका पूजन करनेसे मनुष्य पुत्रवान् एवं रोगमुक्त होता है। वहीं दक्षिणभागमें कोटीश्वर महादेव हैं। उनका विधिपूर्वक पूजन करनेसे मनुष्य कोटि लिंगोंकी पूजाका फल पा लेता है। जो स्वाधीन अथवा पराधीन होकर भी वहाँ प्राणोंका त्याग करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

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