संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | ९७९ |
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सोमयागका जो फल है, वह तुम्हारे जलका पान करनेमात्रसे होनेवाले पुण्यकी समता नहीं कर सकता। तुमने सम्पूर्ण जगत्को तथा समस्त चराचर जीवोंको व्याप्त कर रखा है। जैसे आग रूईके ढेरको जला देती है, उसी प्रकार तुम्हारा जल स्नान, अवगाहन, पान, स्मरण और कीर्तन करनेसे मनुष्यके अनेक जन्मोंकी पापराशिको भस्म कर देता है। देवि! तुम पितरोंके हितकी कामनासे स्वर्गकी सीढ़ी बनकर आयी हो। चारों प्रकारके जीवोंको स्वर्गलोकमें पहुँचाओ। नर्मदे! लोकमें जो कोई भी नदियाँ और नाना प्रकारके तीर्थ हैं, उन सबकी जननी तुम्हीं हो। तुम पितरोंका उद्धार करनेवाली पराशक्ति हो। जैसे सूर्य और चन्द्रमाका प्रभाव सब जीवोंपर समानरूपसे पड़ता है, जैसे बादल अन्नके पौधों और घासोंपर समानरूपसे जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम सम्पूर्ण विश्वपर समानरूपसे स्नेह रखनेवाली गौरवमयी माता हो। शुभे! ब्रह्मा और बृहस्पतिजी सहस्रों वर्षोंतक लगे रहनेपर भी तुम्हारे गुणोंका पूर्णतया वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं।
अमिततेजस्वी मनुके द्वारा किये हुए इस स्तवनको सुनकर परम सौभाग्यशालिनी नर्मदादेवी बोलीं—महाभाग! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो। तब महादेवी नर्मदाको नमस्कार करके राजाने कहा—'देवि! तुम सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करो और अयोध्या प्रदेशमें अनेक नदियाँ प्रकट हो जायँ। देवलोकमें गंगा आदि अनेकों सरिताएँ बहती हैं, ऐसा सुना जाता है। वे सब इस भूलोकमें भी जिस प्रकार उतर आवें, वैसा उपाय करो।'
नर्मदा बोलीं—नृपश्रेष्ठ! त्रेताके प्रथम भागमें तुम्हारे कुलमें भगीरथ नामसे विख्यात एक राजा होंगे। वे इस लोकमें गंगाजीको लावेंगे। त्रेताके द्वितीय भागमें इस भारतवर्षके भीतर कालिन्दी, सरस्वती, सरयू तथा महाभागा गण्डकी आदि नदियाँ भी प्रकट हो जायेंगी। तुम्हारे वंशमें उत्पन्न भगीरथके ही नामपर सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजी 'भागीरथी' कहलायेंगी। भागीरथीके ही समान उनका दूसरा नाम 'जाह्नवी' भी होगा। उक्त सभी नदियाँ कन्या-द्वीपमें प्रसिद्धिको प्राप्त होंगी।
भृगुतीर्थ और भास्करतीर्थका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! त्रिपुरी क्षेत्रमें ही मर्कटीतीर्थ है और मर्कटीतीर्थके पूर्वभागमें परम उत्तम भृगुतीर्थ स्थित है। कार्तिककी पूर्णिमाको इस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। वहीं नरकेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव हैं, जो स्वर्ग और मोक्ष देनेवाले हैं। उनके आगे बाँसका वृक्ष दिखायी देता है। उसके पूर्वभागमें त्रिलोचन नामक महादेवजी विराजमान हैं। उनके ललाटमें स्थित तृतीय नेत्रका दर्शन करके मुनिश्रेष्ठ भृगुने पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम किया और इस प्रकार उनकी स्तुति की।
भृगु बोले—जो सब जीवोंके भीतर उनके आत्मारूपसे विराजमान हैं, समस्त भूतोंके ईश्वर हैं, कल्याण एवं ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले हैं, सबका पाप हर लेनेके कारण जिन्हें हर कहते हैं, जो कल्याणस्वरूप, तेजस्वरूप, पशुपति एवं अखिल विश्वके स्वामी हैं, जिनमें दोषमात्रका सर्वथा अभाव है तथा जो नित्य विज्ञानानन्दस्वरूप हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। प्रभो! मैं दूसरोंका तिरस्कार करनेके पापसे पराजित हूँ। मेरी उस पापसे रक्षा कीजिये। परमेश्वर! इस क्षणभंगुर शरीरके प्रति मेरे मनमें आत्माभिमानका उदय हो गया है—मैं देहको ही आत्मा मानने लगा हूँ। अतएव कुमार्गकी ओर दृष्टि रखनेवाले मुझ दीनकी आप रक्षा करें। प्रभो! मुझ दीन ब्राह्मणको ज्ञान देनेके लिये उद्यत होइये। आप तो