संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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उनमें संगीत और वाद्यकी भी ध्वनि हो रही थी। वह सब देख-सुनकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे 'ये विमान किसके हैं, जो मेरे ही भवनके ऊपर खड़े हैं। यह कितना साहसपूर्ण कार्य है?' इस प्रकार सोच-विचारमें पड़े हुए राजाकी वह रात्रि व्यतीत हो गयी। सूर्योदय होनेपर नैत्यिक धर्म-कर्मका अनुष्ठान पूरा करके राजर्षि मनुने वसिष्ठ मुनिसे कहा—'महामुने! यह मेरे महलके ऊपर किसके विमान हैं तथा ये किस कर्मके फलसे या किस-किस दान और नियमके पालनसे प्राप्त होते हैं? क्षत्रियवंशमें उत्पन्न होकर जो पृथ्वीका शासन करता है, वह यज्ञोंका अनुष्ठान करके माता और पिताके कुलको स्वर्गलोकमें पहुँचाता है। वास्तवमें उसी राजाका जन्म लेना सार्थक है, जिसके शासनमें इस भूमण्डलपर किसी प्रकारका पापकर्म नहीं हो पाता। दूसरे लोग तो केवल माता-पिताको क्लेश देनेके लिये ही उनके पुत्ररूपसे जन्मग्रहण करते हैं।'
राजा मनुके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी बोले—महाभाग! पुराण और वेदोंसे बाहर जो कर्म किया जाता है, उसकी साधुपुरुष प्रशंसा नहीं करते; क्योंकि उसके द्वारा धर्मकी हानि होती है। नर्मदाके तटपर त्रिपुरी नामसे विख्यात एक तीर्थ है। वहाँ जिन लोगोंने यज्ञ, दान और होम आदि सत्कर्म किये हैं, उन्हींके विमान महलोंके ऊपर खड़े थे। महाराज! एकमात्र नर्मदादेवी ही ऐसी हैं, जिन्होंने समस्त पापियों और दुराचारियोंको स्वर्गलोकमें पहुँचाया है। संसार-समुद्रमें डूबे हुए पापसे दूषित चित्तवाले जीवोंको भी स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये यह नर्मदा नदी दिव्य विमानस्वरूप है। महाभाग! ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीको छोड़कर दूसरा कोई एक मुखवाला पुरुष नर्मदा नदीके पुण्योंका वर्णन नहीं कर सकता। नर्मदा तटपर किये हुए तप, दान और सत्कर्मोंके पुण्यकी कोई भी गणना नहीं कर सकता। जम्बूद्वीपमें जो-जो तीर्थ और समुद्र हैं, उनमेंसे कोई भी नर्मदा नदीकी समता नहीं कर सकते। पुण्यक्षेत्रमें किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है। यही बात धर्मके लिये भी है। वहाँ किया हुआ धर्म भी अक्षय होता है। यह जीवन चंचल है—क्षणभंगुर है। इसलिये मनुष्य कभी पाप न करे।
राजा मनुने नर्मदाके सुयशका वर्णन सुनकर अपने मन्त्रियों, सदस्यों तथा सेवकोंको आज्ञा दी—तुम सब लोग राजकीय सामग्री लेकर शीघ्र ही नर्मदाकी यात्रा करो, विलम्ब नहीं होना चाहिये।
तदनन्तर राजा वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके साथ देव दानववन्दित त्रिपुरी पुरीको गये। वहाँ रानियों तथा समस्त परिवारके साथ नर्मदाजीके जलका दर्शन करके वे जन्मभरके पापोंसे मुक्त हो गये। उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् राजाने चन्दन और पुष्प आदिसे महादेवजीकी पूजा की और नर्मदाके तटपर दस योजनका विशाल यज्ञमण्डप निर्माण कराया। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, यज्ञकर्ममें कुशल, चारों विद्याओंके ज्ञाता तथा वेदज्ञ महर्षि एवं ब्राह्मण उस यज्ञके लिये निमन्त्रित किये गये। जैसे पुष्करतीर्थ ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवताओंका स्वरूप है, उसी प्रकार यह त्रिपुरीतीर्थ भी है। वहाँ राजाने परमोत्तम अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ किया। उस यज्ञमें सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया गया। देवराज इन्द्र भी पधारे थे। मनुने अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क और विष्टर आदि देकर सबको सन्तुष्ट किया। वेदोक्त विधिके अनुसार यज्ञका कार्य पूर्ण हुआ। ब्राह्मणोंको वैभवके अनुसार दक्षिणा देकर प्रसन्न किया गया। देवता, पितर और मनुष्य सभी तृप्त होकर परम गतिको प्राप्त हो गये। ब्रह्मा, विष्णु और शिव राजाको वरदान देकर अपने-अपने लोकमें गये। इस तीर्थमें किया हुआ तप और दान सब कुछ अक्षय होता है।
इस प्रकार महातेजस्वी महाराज मनुका यज्ञ जब पूरा हो गया तब उन्होंने हाथ जोड़कर नर्मदासे कहा—देवि! केवल सहस्रों चान्द्रायण और सैकड़ों