संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९९१
पशु, अपने पुत्र और स्त्री आदि परिवारके साथ आपके प्रसादसे आपके ही लोकमें जायें तथा अन्य जितने पापयोनि हों, उनकी भी ऐसी ही गति हो।'
महादेवजी बोले—मेरे प्रसादसे तुम सब कामनाओंको प्राप्त करोगे।
ऐसा कहकर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर सेवकोंसहित वह निषाद इस तीर्थके प्रभावसे शिवजीके धाममें चला गया। राजन्! यह तुमको शिवनेत्र कुण्डका माहात्म्य बताया गया है। सैकड़ों पापयोनि मनुष्य नर्मदा और शिवके संयोगरूप उस तीर्थमें परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं। जो वहाँ स्वतन्त्र या परतन्त्र होकर प्राण त्याग करता है, वह सहस्रों वर्षोंतक उमा-महेश्वरके धाममें निवास करता है। इस प्रसंगको सुनने और कहनेसे भी मनुष्य भव-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
नर्मदाके उत्तर तटपर एक परम उत्तम तीर्थ है, जो सब सिद्धियोंको देनेवाला है। उसे जनकतीर्थ कहते हैं। स्वारोचिष मन्वन्तर आनेपर त्रेतायुगमें राजा जनक अपने उपरोहित ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि याज्ञवल्क्यको साथ लेकर अनेक मुनिवृन्दोंसे सेवित कश्यपजीके पवित्र आश्रमपर गये। उनके साथ यज्ञ करानेवाले ऋत्विज तथा यज्ञका सामान भी था। तदनन्तर वहाँ यज्ञोंमें उत्तम लक्षमेध यज्ञ आरम्भ हुआ। इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंने स्वयं आकर यज्ञभाग ग्रहण किया। तत्पश्चात् यज्ञ पूरा हुआ। राजा नर्मदामें यज्ञान्तस्नान करके पुत्र और पत्नीके साथ सुशोभित हुए। फिर शिव और विष्णुका पूजन करके उनके वरदानके प्रभावसे वे दिव्य विमानपर आरूढ़ हो दिव्य लोकमें जाते हुए देखे गये। मार्गमें उन्हें देखकर धर्मराज उठकर खड़े हो गये और अर्घ्य, पाद्य आदि लेकर पैदल ही उनके विमानके आगे आये। निकट आनेपर उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—'महाराज ! आपने तपस्या, ध्यानयोग, दान और देवपूजन आदिके द्वारा शिव और नर्मदाजीके प्रसादसे सम्पूर्ण दिव्य लोकोंपर विजय पायी है।' यह सुनकर राजा जनकने यशस्वी धर्मराजसे कहा—'प्रभो! सर्वत्र अपनी प्रभा फैलानेवाले भगवान् सूर्य जिस प्रकार जीवोंके आराध्य देव हैं, वैसे ही आपकी भी मूर्ति है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये जीवोंके समस्त कर्मोंके साक्षी हैं।'
इस प्रकार जनक और धर्मराजमें धर्माधर्म-विचारपूर्वक संवाद चल रहा था, इतनेमें ही देवराज इन्द्र, देवर्षि नारद, पर्वत तथा अन्य श्रेष्ठ मुनि राजा जनकका आगमन सुनकर धर्मराजके नगरमें आये। धर्मराजने उन सबका यथायोग्य पृथक्-पृथक् पूजन किया और वे सब लोग यथायोग्य आसनपर बैठे। तदनन्तर नारदजीने पूछा—'धर्मराज ! पृथ्वीपर कौन-से देश, पर्वत, पवित्र नदियाँ, आश्रम और तीर्थ ऐसे हैं, जहाँ किये हुए मनुष्योंके दान, होम, जप, तप आदि कभी क्षीण नहीं होते। यह सब यथार्थरूपसे बताइये।'
धर्म बोले—मुने ! नर्मदाके उत्तर तटपर लक्षमेध नामक तीर्थ है और वहीं लक्षमेधेश्वर नामक एक शिवलिंग भी है, जो परम पवित्र है। भगवान् शिवसे बढ़कर कोई देवता नहीं है। नर्मदासे बड़ी कोई नदी नहीं है। सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है और सब प्राणियोंपर दया करना—यह सबके लिये परम धर्म है।* जो मनुष्य शिवजीके चिन्तनमें तत्पर हो नर्मदा नदीके तटपर निवास करता है, उसपर यमराजका शासन नहीं चलता और वह कभी यमलोकका दर्शन नहीं करता। ब्रह्मा, विष्णु और शिव ही उसके स्वामी होते हैं।
धर्मराजके कहे हुए इस धर्माख्यानको सुनकर नारद आदि महर्षि बड़े प्रसन्न हुए।
* न शंकरत्परो देवो न रेवायाः परा नदी। न सत्यात्परो धर्मः कारुण्यं सर्वजन्तुषु॥ (स्क० पु०, आव० रे० १८।३६)