भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1021

१९२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, शाण्डिल्या और नर्मदाके संगमकी महिमा तथा नर्मदा-कुब्जाके संगमपर रन्तिदेवका यज्ञ

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! सप्तसारस्वत नामसे प्रसिद्ध एक गन्धर्व था जो भगवान् शिवके सुयशका गान किया करता था। वह गाने-बजानेकी विद्यामें बड़ा निपुण था, परंतु कुछ कालके बाद उसे मदिरा पीनेकी लत पड़ गयी और वह उसीमें अचेत रहा करता था। कामपीड़ित एवं काममोहित होकर उसने भगवान् शंकरकी उपासना त्याग दी और वह भक्ष्य-भोज्यके सेवनमें ही आसक्त रहने लगा। इस प्रकार कुछ काल व्यतीत होनेपर गन्धर्व उमापति महादेवजीका दर्शन करनेके लिये कैलास पर्वतपर गया। उसे शिव-भक्तिसे विमुख हुआ देख नन्दीने शाप दिया—‘अरे! तू अपने पापके प्रभावसे चाण्डाल-योनिमें जन्म ले।’ तब गन्धर्वने कहा—‘महाभाग! मुझे मिले हुए इस शापका अन्त कब होगा, इसका निश्चय भी आपको कर देना चाहिये।’

नन्दी बोले—व्यतिपात योग आनेपर जब नर्मदा नदीमें स्नान करके महेश्वरका पूजन करोगे, तब शापका अन्त होगा और तुम पुनः यहाँ आ सकोगे।

यह सुनकर वह गन्धर्व वहाँसे चला गया और चाण्डालयोनिमें उत्पन्न हुआ। उस योनिमें भी उसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण बना रहा और वह तीर्थयात्राके प्रसंगसे पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरण करने लगा। दैवयोगसे नर्मदाके तटपर आया। वहाँ उसने शंकरस्थण्डिल (शिववेदी)-में जाकर भाँति-भाँतिके पुष्प आदि उपचारोंसे भगवान् शिवका पूजन किया। गन्धर्वकी भक्ति जानकर भगवान् शिव उसके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए। उसी स्थण्डिल (वेदी)-से जलमें परम पावन शिवलिंगके रूपमें उनका प्रादुर्भाव हुआ।

महादेवजी बोले—महाभाग! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।

गन्धर्वने कहा—महेश्वर! आपके प्रसादसे भूमण्डलमें यह स्थान मेरे नामपर सप्तसारस्वततीर्थके रूपमें विख्यात हो और यह शिवलिंग भी सारस्वत लिंग कहलाये। जो पापी, चाण्डाल एवं नराधम पशु-पक्षियोंकी योनिमें पड़े हों, वे भी इस तीर्थके प्रभावसे पापमुक्त हो स्वर्गलोकमें चले जायें।

‘एवमस्तु’ कहकर भगवान् महेश्वर अन्तर्धान हो गये तथा वह गन्धर्व भी शापमुक्त हो शिवलोकको प्राप्त हुआ। जो मनुष्य सप्तसारस्वततीर्थमें स्नान करके भगवान् वृषभध्वजकी पूजा करता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो वहाँ स्नान करते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु हो जाती है, वे पुनर्जन्मसे मुक्त होते हैं।

शाण्डिल्या और नर्मदाका संगम सब पापोंको हरनेवाला और श्रेष्ठ तीर्थ है। वहीं शाण्डिल्येश्वर लिंग भी है। उस तीर्थमें स्नान करके महादेवजीकी पूजा करनेसे मनुष्य फिर कभी कर्मभूमिमें जन्म नहीं लेता। वहाँ तिल और जलकी अंजलि देने तथा हविष्यका पिण्डदान करनेसे पितर चौदह इन्द्रोंके समयतक तृप्त रहते हैं। उस तीर्थमें शाण्डिल्य, कौण्डिन्य, भाण्डव्य, कौशिक, कश्यप और भृगु—ये तथा अन्य भी बहुत-से महर्षिगण जप और ध्यानमें तत्पर रहते हैं। वहाँ साठ हजार मुनियोंने उग्र तपस्याका अनुष्ठान किया है। शाण्डिल्या और नर्मदाके संगममें शाण्डिल्यजीका आश्रम बहुत मनोहर है। लोकमें वह शाण्डिल्यपुरके नामसे प्रसिद्ध है। अनेक ब्रह्मर्षि वहाँ निवास करते हैं। नर्मदाके दक्षिण तटपर द्वादशादित्यतीर्थ, देवदारुतीर्थ और देववनतीर्थ हैं। द्वादशादित्यतीर्थ सब पापोंका नाश करनेवाला है, वहीं ज्ञानस्वरूप सिद्धलिंगमय महादेवजी स्थित हैं। उसी तीर्थमें कनकाको मोक्ष देनेवाला कल्याणमय कनकेश्वरलिंग