भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1022, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1022
  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | ९९३ ---|---

है। वहीं ज्वरेश्वरलिंग है, जहाँ ज्वरका अभाव है। उसके पास ही पंचब्रह्मेश्वरलिंग है, जो सब पापोंसे मुक्त करनेवाला है। पंचब्रह्मेश्वर, पुष्येश्वर तथा स्थण्डिलेश्र्वर—ये तीन लिंग वहाँ प्रधान हैं। नित्य-नैमित्तिक कार्योंमें, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय श्रद्धापूर्वक संगममें स्नान करके तीनों लिंगोंका पूजन करनेसे पितर स्वर्गलोकमें जाते हैं। नर्मदाके दक्षिण भागमें गोप्य लिंग है। उसके पूजनसे ब्रह्महत्या आदि पाप सात रातमें नष्ट हो जाते हैं।

राजन्! पितर, पितामह तथा मातामह आदि सभी आपसमें यह गाथा गाते रहते हैं कि ‘क्या हमारे कुलमें भी कोई ऐसा परम धार्मिक पुत्र उत्पन्न होगा जो हमें नर्मदाके जलसे पूजित तिलयुक्त हविष्यका पिण्ड देगा, जिससे कि लाखों वर्षोंतक तृप्त रहकर हम परम गतिको प्राप्त होंगे?’

नर्मदा और कुब्जाके संगममें स्नान करनेके लिये सोमवती अमावस्या प्रसिद्ध पर्व है। एरण्डी और चण्डवेगाका जहाँ नर्मदा नदीसे संगम हुआ है, वहाँ स्नान करनेके लिये सोमवती अमावस्या, व्यतिपात, संक्रान्ति, वैधृतियोग, विषुवयोग, दक्षिणायन और उत्तरायणके प्रारम्भिक दिन—ये पर्व उत्तम माने गये हैं। अमावास्याको स्नान करनेसे बीस गुना पुण्य होता है, व्यतिपात योगमें सौगुना, संक्रान्तिकाल तथा वैधृतियोगमें पचासगुना और सोमवती अमावस्या एवं चन्द्रग्रहणके समय कुरुक्षेत्रसे सौगुना पुण्य होता है। यह साक्षात् महादेवजीका कथन है। वहाँ बिल्वाम्रक नामसे प्रसिद्ध एक सिद्धलिंग है, जो ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला है। उसके दर्शन और स्पर्शसे मनुष्य शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो सोमवती अमावस्याके दिन वहाँ प्राण-त्याग करता है, वह महादेवजीके कल्याणमय धाममें निवास करता है।

राजन्! अयोध्याके चक्रवर्ती नरेश श्रीमान् रन्तिदेव इन्द्रके तुल्य महापराक्रमी राजा थे। वे समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ माने जाते थे। उनके राज्यमें मनुष्योंको शोक, मात्सर्य, रोग और दारिद्र्यका दुःख नहीं होता था। सब प्रजा दीर्घायु तथा धन-धान्यसे सम्पन्न थी, गौएँ स्वयं ही इच्छाके अनुसार दूध देती थीं और पृथ्‍वी सदा हरी-भरी खेतीसे सुशोभित रहती थी। इस प्रकार पृथ्वीका पालन करते हुए राजा रन्तिदेवने अपने पुरोहित मुनिवर वसिष्ठजीसे पूछा—‘महामुने! किस तीर्थमें निर्विघ्नतापूर्वक यज्ञकी सिद्धि होती है?’

मुनिवर वसिष्ठने कहा—राजन्! पुराणोंमें सब तीर्थोंसे बढ़कर उत्तम तीर्थ उसीको बताया गया है, जहाँ नर्मदा नदी बहती हैं।

तब राजाने सेवक, मन्त्री और पुरोहितको आज्ञा देते हुए कहा—यज्ञका सामान शीघ्र ही तैयार किया जाय। तत्पश्चात् दूतोंको भिन्न-भिन्न देशोंमें शीघ्र जानेकी आज्ञा देते हुए कहा—‘समस्त राष्ट्रमें यह घोषणा करा दी जाय कि ‘सब राजा मेरे यज्ञमें पधारें।’ रन्तिदेवकी आज्ञासे सभी सामन्त नरेश उस यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आये। महाराज रन्तिदेव भी अपनी रानी और यज्ञसामग्रियोंके साथ दिव्य रथपर आरूढ़ हो नर्मदाके तटपर गये। वहाँ यज्ञमण्डप, यज्ञकुण्ड और यज्ञके यूप सभी सुवर्णमय बनाये गये थे। नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ और पकवान तैयार किये गये थे। महाराजने अपनी धर्मपत्नीके साथ यज्ञकी दीक्षा ली। तदनन्तर नर्मदाके सुन्दर तटपर उनका यज्ञ प्रारम्भ हुआ। उसमें धूमरहित अग्निदेव प्रत्यक्ष प्रकट होकर प्रज्वलित हो रहे थे। ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता, लोकपाल, मरुद्गण, विश्वेदेव, साध्य, वसु, चन्द्रमा, सूर्य, नदियाँ, समुद्र, पर्वत, सब तीर्थ, मातृगण, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, उमासहित शिव तथा देवेश्वर विष्णु—इन सबके लिये राजाने पृथक्-पृथक् यज्ञभाग दिये।

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