संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कुब्जा और नर्मदाके संगमकी महिमा, हरिकेश ब्राह्मणका परिवारसहित ब्रह्मराक्षसयोनिसे उद्धार
मार्कण्डेयजी कहते हैं—शालग्रामक्षेत्रमें हरिकेश नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे। वे शिल और उञ्छवृत्तिसे* जीवन-निर्वाह करते थे। बड़े ही धर्मात्मा और सत्यपरायण थे। उनकी धर्मपत्नी ब्राह्मणी भी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली, यशस्विनी, पतिव्रता, परम सौभाग्यवती और पतिसेवामें संलग्न रहनेवाली थी। वह स्त्री समयपर रजस्वला हुई और ब्राह्मणने ऋतुकालमें उसके साथ सहवास किया। ब्राह्मणीके गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न हुए। वे सभी कपिलापुरमें रहते थे। ब्राह्मणदेवता शिलोञ्छवृत्तिके प्रयोगसे एक प्रस्थ अन्न प्रतिदिन उपार्जन करते थे। इससे उनके बच्चे भूखसे दुर्बल होकर बड़े करुण स्वरमें रोते रहते थे। बालकोंको भूखा देख माता शोक और पीड़ासे व्याकुल रहती थी। एक दिन वह अत्यन्त दुःखसे कातर हो पतिसे बोली, 'आर्यपुत्र! बूढ़े माता-पिता, साध्वी पत्नी और छोटी अवस्थावाले बालक—इन सबका प्रयत्नपूर्वक भरण-पोषण करना चाहिये, यही सनातन धर्म है। यों तो सभी पोष्यवर्गका भरण-पोषण आवश्यक है, परंतु पुत्रोंके पालन-पोषणपर तो विशेष ध्यान देना चाहिये।'
युधिष्ठिर! ब्राह्मणीका यह वचन सुनकर हरिकेशजी शोकसे विह्वल हो उठे और इस प्रकार बोले—'देवि! मैं गाँव-गाँवमें भीख माँगकर सबके लिये पृथक्-पृथक् बाँटकर उत्तम अन्न देता ही हूँ। दूसरी कोई वृत्ति करता नहीं, फिर अधिक अन्न मैं कहाँसे लाऊँ?!'
ब्राह्मणी बोली—यदि बालक और वृद्ध भूखसे पीड़ित हों, तो बालहत्याके समान पाप लगता है। अतः दान ग्रहण करके भी अपने बालकोंका पालन-पोषण करना चाहिये। कहते हैं, कुरुक्षेत्रमें अयोध्यानरेश महाराज अम्बरीषका कोई महान् यज्ञ हो रहा है। वहाँ दान लेनेके लिये बहुत-से शालग्राम-निवासी ब्राह्मण गये थे। वहाँसे गौएँ, सुवर्ण और धन पाकर वे सब लोग लौटे हैं। जहाँ सब शालग्रामनिवासी ब्राह्मण गये थे, वहाँ आप भी जाइये।
तब पुत्रोंके भरण-पोषणकी इच्छासे हरिकेशजी भी ब्राह्मणी और बालकोंको साथ ले राजा अम्बरीषके महायज्ञमें गये और जहाँ ऋत्विग् लोग बैठे थे, वहाँ उन्होंने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया। महाराज अम्बरीषने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणको देखकर मस्तक झुकाया और अर्घ्य-पाद्यके द्वारा उन सबका पूजन किया। तत्पश्चात् उन्होंने पूछा—'विप्रवर! आप पत्नी और पुत्रोंके साथ यहाँ किसलिये आये हैं? आपने आतिथ्यके समय यहाँ पदार्पण किया है। अतः जो उचित एवं आवश्यक वस्तु हो उसे माँगिये।'
ब्राह्मणने कहा—राजन्! आप मेरे एक-एक पुत्रको सौ-सौ वर्षोंकी जीविकाके लिये पर्याप्त धन दीजिये। साथ ही यज्ञ और होमके लिये उत्तम धेनु तथा सुवर्णके भारसे विभूषित दस हजार गौएँ प्रदान कीजिये। इसके अतिरिक्त एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ तथा उत्तम-उत्तम वस्त्र और आभूषण अर्पण कीजिये।
ब्राह्मणकी यह बात सुनकर महाराज अम्बरीषने बड़ी श्रद्धाके साथ वह सब कुछ उन्हें समर्पित किया और अपनी सवारियोंसे उन्हें शालग्राम स्थानतक पहुँचा दिया। इस प्रकार उस महान् यज्ञको परिपूर्ण करके वे राजर्षि दीर्घकालतक देवताओंकी भाँति आनन्द भोगते रहे। इधर हरिकेश ब्राह्मण अपनी पत्नी और पुत्रोंके साथ अनेक
* 'उञ्छः कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम्' इस कोष-वाक्यके अनुसार बाजार या खलिहानका अन्न उठ जानेपर वहाँ बिखरे हुए एक-एक दानेको चुनना 'उञ्छ' कहलाता है और खेत कट जानेपर वहाँ गिरी हुई धान या गेहूँकी मंजरी (बाल) बीनना 'शिल' कहा गया है।