संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कुब्जा और नर्मदाके संगमकी महिमा, हरिकेश ब्राह्मणका परिवारसहित ब्रह्मराक्षसयोनिसे उद्धार
मार्कण्डेयजी कहते हैं—शालग्रामक्षेत्रमें हरिकेश नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे। वे शिल और उञ्छवृत्तिसे* जीवन-निर्वाह करते थे। बड़े ही धर्मात्मा और सत्यपरायण थे। उनकी धर्मपत्नी ब्राह्मणी भी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली, यशस्विनी, पतिव्रता, परम सौभाग्यवती और पतिसेवामें संलग्न रहनेवाली थी। वह स्त्री समयपर रजस्वला हुई और ब्राह्मणने ऋतुकालमें उसके साथ सहवास किया। ब्राह्मणीके गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न हुए। वे सभी कपिलापुरमें रहते थे। ब्राह्मणदेवता शिलोञ्छवृत्तिके प्रयोगसे एक प्रस्थ अन्न प्रतिदिन उपार्जन करते थे। इससे उनके बच्चे भूखसे दुर्बल होकर बड़े करुण स्वरमें रोते रहते थे। बालकोंको भूखा देख माता शोक और पीड़ासे व्याकुल रहती थी। एक दिन वह अत्यन्त दुःखसे कातर हो पतिसे बोली, 'आर्यपुत्र! बूढ़े माता-पिता, साध्वी पत्नी और छोटी अवस्थावाले बालक—इन सबका प्रयत्नपूर्वक भरण-पोषण करना चाहिये, यही सनातन धर्म है। यों तो सभी पोष्यवर्गका भरण-पोषण आवश्यक है, परंतु पुत्रोंके पालन-पोषणपर तो विशेष ध्यान देना चाहिये।'
युधिष्ठिर! ब्राह्मणीका यह वचन सुनकर हरिकेशजी शोकसे विह्वल हो उठे और इस प्रकार बोले—'देवि! मैं गाँव-गाँवमें भीख माँगकर सबके लिये पृथक्-पृथक् बाँटकर उत्तम अन्न देता ही हूँ। दूसरी कोई वृत्ति करता नहीं, फिर अधिक अन्न मैं कहाँसे लाऊँ?!'
ब्राह्मणी बोली—यदि बालक और वृद्ध भूखसे पीड़ित हों, तो बालहत्याके समान पाप लगता है। अतः दान ग्रहण करके भी अपने बालकोंका पालन-पोषण करना चाहिये। कहते हैं, कुरुक्षेत्रमें अयोध्यानरेश महाराज अम्बरीषका कोई महान् यज्ञ हो रहा है। वहाँ दान लेनेके लिये बहुत-से शालग्राम-निवासी ब्राह्मण गये थे। वहाँसे गौएँ, सुवर्ण और धन पाकर वे सब लोग लौटे हैं। जहाँ सब शालग्रामनिवासी ब्राह्मण गये थे, वहाँ आप भी जाइये।
तब पुत्रोंके भरण-पोषणकी इच्छासे हरिकेशजी भी ब्राह्मणी और बालकोंको साथ ले राजा अम्बरीषके महायज्ञमें गये और जहाँ ऋत्विग् लोग बैठे थे, वहाँ उन्होंने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया। महाराज अम्बरीषने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणको देखकर मस्तक झुकाया और अर्घ्य-पाद्यके द्वारा उन सबका पूजन किया। तत्पश्चात् उन्होंने पूछा—'विप्रवर! आप पत्नी और पुत्रोंके साथ यहाँ किसलिये आये हैं? आपने आतिथ्यके समय यहाँ पदार्पण किया है। अतः जो उचित एवं आवश्यक वस्तु हो उसे माँगिये।'
ब्राह्मणने कहा—राजन्! आप मेरे एक-एक पुत्रको सौ-सौ वर्षोंकी जीविकाके लिये पर्याप्त धन दीजिये। साथ ही यज्ञ और होमके लिये उत्तम धेनु तथा सुवर्णके भारसे विभूषित दस हजार गौएँ प्रदान कीजिये। इसके अतिरिक्त एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ तथा उत्तम-उत्तम वस्त्र और आभूषण अर्पण कीजिये।
ब्राह्मणकी यह बात सुनकर महाराज अम्बरीषने बड़ी श्रद्धाके साथ वह सब कुछ उन्हें समर्पित किया और अपनी सवारियोंसे उन्हें शालग्राम स्थानतक पहुँचा दिया। इस प्रकार उस महान् यज्ञको परिपूर्ण करके वे राजर्षि दीर्घकालतक देवताओंकी भाँति आनन्द भोगते रहे। इधर हरिकेश ब्राह्मण अपनी पत्नी और पुत्रोंके साथ अनेक
* 'उञ्छः कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम्' इस कोष-वाक्यके अनुसार बाजार या खलिहानका अन्न उठ जानेपर वहाँ बिखरे हुए एक-एक दानेको चुनना 'उञ्छ' कहलाता है और खेत कट जानेपर वहाँ गिरी हुई धान या गेहूँकी मंजरी (बाल) बीनना 'शिल' कहा गया है।
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प्रकारके भोग भोगकर कालान्तरमें मृत्युको प्राप्त हुए। मरनेके पश्चात् उन्हें निर्जल मरुप्रदेशमें ब्रह्मराक्षस होना पड़ा। राजाका प्रतिग्रह दोषयुक्त होता है। उसे लेनेसे फिर मानव-जन्म दुर्लभ हो जाता है। जो द्रव्यके लोभसे मोहित और विषयलोलुप होकर राजाका दान ग्रहण करता है, उसका रौरव-नरकमें गिरना अवश्यम्भावी है।
वह ब्रह्मराक्षस अपनी स्त्री और पुत्रोंके साथ कुरुक्षेत्रको गया और बारह वर्षोंतक भूखा रहकर इस चिन्तामें पड़ा कि 'क्या करूँ, मेरा यह शरीर किसी प्रकार छूट नहीं पाता। अब मैं अपने पापकी शुद्धिके लिये अग्निमें प्रवेश करूँगा।' तब उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उसकी पुत्रवती पत्नीने अपने ब्रह्मराक्षस पतिसे कहा—'प्रभो! ब्राह्मणका यह सब धर्म अग्निसे ही सिद्ध होता है। अतः लकड़ी इकट्ठी करके आप उसमें आग जला दीजिये और मैं सौभाग्यवती रहकर पहले स्वयं ही अग्निमें प्रवेश करूँगी। अपनेसे पहले पतिको भयंकर आगमें गिरते नहीं देख सकूँगी।'
उसके ऐसा निश्चय करनेपर आकाशवाणीने उससे कहा—'शुभे! तुम्हें मृत्युका भय नहीं है, कुब्जा और नर्मदाके संगममें स्नान करनेसे ब्रह्मराक्षसयोनि छूट जाती है। उसमें स्नान करके बिल्वाम्रकेश्वरकी पूजासे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है, ब्रह्मराक्षसयोनिसे मुक्त होता है और ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।' ऐसा कहकर आकाशवाणी मौन हो गयी। तब हरिकेशने अपनी स्त्री और पुत्रोंके साथ वहाँ जाकर महादेवजीको प्रणाम किया और कुब्जा एवं नर्मदाके संगममें विधिपूर्वक स्नान करके महादेवजीका पूजन किया। तत्पश्चात् वे सब-के-सब काम और क्रोधसे रहित हो भगवान् विष्णु और शिवका स्मरण करते हुए अपने घरकी भाँति प्रज्वलित अग्निमें बिना क्लेशके ही प्रवेश कर गये। फिर तो उन्हें तत्क्षण दिव्य देहकी प्राप्ति हुई और वे ब्रह्मतेजोमय शरीर धारण करके दिव्य विमानपर बैठकर ब्रह्मलोकको चले गये।
उस पवित्र संगममें एक सौ आठ शिवलिंग हैं।
माहेश्वरतीर्थकी महिमा, राजा सालंकायनका यज्ञ
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! माहेश्वरपुरमें बहुत-से तीर्थ हैं, वहाँसे रौद्रवारुणतीर्थतक जो एक कोसकी भूमि है, उसके भीतरका स्थान शिवक्षेत्र कहा गया है। जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है, वह शिवलोकमें आनन्दका भागी होता है। वहाँ पितरोंको तिल और जलकी अंजलि देनेसे माता और पिता दोनों कुलोंके पितर महाप्रलय-कालतक तृप्त रहते हैं। प्राचीन कालमें ब्रह्माजीके द्वारा वहाँ असंख्य उत्तम यज्ञ किये गये हैं। इन्द्रने भी वहीं यज्ञानुष्ठान करके देवराज-पदको प्राप्त किया है। कार्तवीर्य अर्जुनने भी वहीं पूर्वकालमें सौ यज्ञ किये थे। राजन्! पहलेकी बात है। अयोध्यापुरीमें सूर्यवंशी राजा वैवस्वत मनु, जो साक्षात् भगवान् सूर्यके ही पुत्र थे, चक्रवर्ती नरेशके पदपर प्रतिष्ठित थे। वे सदा यज्ञ और दानमें तत्पर रहते थे। उनके शासनकालमें उत्तम पुरी अयोध्याके भीतर मृत्यु, रोग और वृद्धावस्थाका कष्ट किसीको भी नहीं होता था।
तदनन्तर उन्हींके वंशमें परम धर्मात्मा राजर्षि सालंकायन हुए, जिनके राज्यकालमें समूची पृथ्वी सस्य-श्यामला एवं धन-धान्यसे सम्पन्न थी। गौएँ स्वयं ही इच्छानुसार दूध देती थीं। एक समय अयोध्याके राज्यमें बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं हुई। सम्पूर्ण देशवासी मनुष्य और पशु मरने लगे। घास, फूस, तृण, लता, बेलें तथा चार प्रकारके जीवसमुदाय भी नष्टप्राय हो गये। उस समय देवता, असुर तथा मनुष्योंमें बड़ा भारी हाहाकार मचा। युधिष्ठिर! अपने देशपर आयी हुई इस आपत्तिको देखकर राजर्षि सालंकायनको बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने सोचा 'जन्मसे लेकर अबतक मेरे द्वारा कोई पाप
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नहीं हुआ, मैं सदा संसार-सागरसे पार उतारनेवाले भगवान् श्रीहरिका पूजन करता हूँ। ब्राह्मण और ऋषि-मुनियोंको भी मैंने इच्छानुसार तृप्त किया है, तो भी मेरे राष्ट्रमें यह विपत्ति क्यों आयी।'
इस प्रकार विचार करते हुए राजाने बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् ब्रह्मवादी वसिष्ठ मुनिको भक्तिभावसे साष्टांग प्रणाम करके पूछा—ब्रह्मन्! यह बारह वर्षोंकी अनावृष्टि क्यों हुई है?
वसिष्ठजी बोले—महाबाहो! जनसमुदायमें महर्षियोंके वचन सुनकर उसीके अनुसार कोई उपाय करना चाहिये।
तब राजाने जनसभामें आसनपर बैठे हुए महर्षियोंके पास जाकर अनावृष्टिका कारण पूछा। उनके पूछनेपर महर्षिलोग इस प्रकार बोले—'राजन्! भूत और भविष्य-कालके तत्त्वको जाननेवाले गुरु एवं महात्मा मार्कण्डेय मुनिके आश्रमपर जाकर ब्राह्मणोंके साथ इस प्रश्नपर विचार करो। वे मुनि जो-जो धर्म बतावें, वह-वह तुम्हें पालन करना चाहिये।'
तदनन्तर राजा सालंकायन ब्राह्मणोंके साथ दिव्य रथपर आरूढ़ हो नर्मदाके तटपर गये और वहाँ मुनियोंके साथ बैठे हुए मुझ मार्कण्डेयको प्रणाम करके बैठ गये। तब मैंने उनसे कुशल-मंगल पूछा।
राजा बोले—ब्रह्मन्! आज आपके चरणारविन्दोंका दर्शन करनेसे मैं सकुशल हूँ। परंतु मेरे राष्ट्रका भविष्य क्या होगा, यह चिन्ता मुझे सदा पीड़ित किये रहती है।
मैंने कहा—प्रजाके कुमार्गगामी होनेसे, देवताओं और ब्राह्मणोंको कष्ट पहुँचानेसे तथा वर्णाश्रमधर्मका लोप करनेसे जो महान् अधर्म होता है, वह धर्मको हानि पहुँचाता है। अतः इस संकटसे मुक्ति पानेके लिये तुम नर्मदाके तटपर आकर रुद्रयज्ञ करो और महादेवजीकी विधिपूर्वक आराधना करो। इससे वर्तमान उपद्रवकी शान्ति होगी, बादल इच्छाके अनुसार वर्षा करेंगे और पुनः सृष्टिका सारा कार्य पूर्ववत् चलने लगेगा। तुम भी पापदोषसे छूट जाओगे तथा राज्य और स्वर्ग पाओगे।
मुनिका यह वचन सुनकर राजाने मुनियोंसहित मुझे नमस्कार किया और कहा—महामुने! आपने कृपापूर्वक जो कुछ बताया है उसे मैं अपने ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह मानता हूँ। यह कहकर राजाने अयोध्यापुरीको सन्देश भेजकर अपनी रानियों और राजकुमारोंको यज्ञसामग्रीके साथ वहीं बुलवाया। उनके बुलानेपर महाराजकी एक हजार आठ रानियाँ, राजकुमार तथा घरका काम-काज करनेवाले अन्य सब लोग भी यज्ञसामग्रीसहित वहाँ उपस्थित हुए। तब राजा सालंकायन मुझे प्रणाम करके इस प्रकार बोले—'मुने! आज्ञा दीजिये कहाँ यज्ञ आरम्भ किया जाय?'
मैंने कहा—वैदूर्यपर्वतके पश्चिम भागमें यज्ञयूप और यज्ञमण्डप निर्माण कराओ तथा यज्ञकी अन्य सब सामग्रियोंका भी वहीं संग्रह कराओ।
तब राजाने यज्ञके लिये वसिष्ठ, वामदेव आदि बहुत-से ऋषियोंका वरण किया। यज्ञमण्डपमें सोनेके बड़े-बड़े खंभे लगाये गये, जिनसे वहाँ बड़ी शोभा हो रही थी। कुण्ड, वेदी और स्रुवा आदि सब सुवर्णमय थे। नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ तथा भाँति-भाँतिके रस तैयार किये गये थे। वेदपाठी ब्राह्मणोंद्वारा देवताओंका आवाहन और पूजन किया गया। होमकुण्डमें अग्निका आधान हुआ। धूमरहित अग्नि प्रज्वलित हो उठी। वेदमन्त्रोंके उच्चारणसे आकाश गूँज उठा। आहुतियाँ दी जाने लगीं। इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञ पूर्ण होनेपर जब सब लोग अवभृथ-स्नानके लिये नर्मदामें गये तब उसका जल सूखा दिखायी दिया। यह देख राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने मुनिवर दुर्वासाजीसे पूछा—'यह क्या हुआ? वर्षा भी कहीं नहीं हुई और नर्मदाका जो पुराना जल था वह भी सूख गया। इसका क्या कारण है?'
राजाका प्रश्न सुनकर दुर्वासा बोले—राजन्! जल तो सभी लोकोंको अभीष्ट है। तप, होम और वेदमन्त्र ब्राह्मणोंके अधीन हैं और यज्ञरक्षा
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एवं दक्षिणा यजमानके अधीन। सो सब कुछ विधिवत् सम्पन्न हुआ है। नर्मदा जलरहित हो गयी और मेघ अभीतक पानी नहीं बरसाते। इससे हताश होनेकी आवश्यकता नहीं है। जो चली गयी है, उस नर्मदा नदीके आनेकी बाट देखो।
तब राजाने नर्मदाकी स्तुति प्रारम्भ की—सुरेश्वरि! तुम्हें नमस्कार है। शंकरात्मजे! तुम्हें नमस्कार है। इडा, पिंगला, उमा, गंगा, सरस्वती, वेदमाता गायत्री, सावित्री, सरस्वती, ब्राह्मी, वैष्णवी और गौरी सब कुछ तुम्हीं हो। तुम्हीं परम यशस्विनी लोकमाता लक्ष्मी हो। पृथ्वीपर जितने भी तीर्थ बताये गये हैं, वे सब तुमसे व्याप्त हैं। समस्त चराचर जगत् तुम्हारे जलसे व्याप्त है। जगत्में ऐसा कोई स्थान नहीं दिखायी देता जो तुम्हारे जलसे आवृत न हो। तुम्हारे जलमें स्नान करनेमात्रसे तृप्त होकर सब जीव परम गतिको प्राप्त होते हैं।
अमिततेजस्वी राजाके मुखसे यह स्तवन सुनकर नर्मदादेवीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—राजन्! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसके अनुसार वर माँगो।
राजाने कहा—देवि! तुम सात पूर्वके और सात दूसरे प्रवाहोंको अक्षय करो।
नर्मदा बोली—राजन्! लो, यह वरदान मैंने तुम्हें यथार्थरूपसे दे दिया।
ऐसा कहकर सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा जलराशिसे परिपूर्ण हो विस्तृत प्रवाहोंसे बहने लगी। राजा सालंकायनका यह अद्भुत कर्म देखकर सत्यधर्म-परायण सभी महर्षि उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर उन सबने नर्मदामें स्नान, अवगाहन, जलपान और पितृतर्पण किया। तत्पश्चात् सर्वस्व दक्षिणा पाये हुए ब्राह्मणोंने वह यज्ञ समाप्त किया। जो जिस वस्तुकी कामना करता, उसे वही वस्तु दी जाती थी। तदनन्तर शिवालयमें जाकर समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाले देवपूजित माहेश्वरलिंगमें स्थित भोग-मोक्ष-प्रदाता उमा-महेश्वरका राजाने विधिपूर्वक पूजन किया। पूजामें प्रत्येक उपचार 'ॐ महेश्वराय देवाय शम्भवाय नमो नमः'—इस मन्त्रसे चढ़ाया गया। पूजा समाप्त होनेपर राजा वहीं हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तत्पश्चात् नर्मदादेवी भगवान् शंकरके चरणके नीचेसे प्रकट हुईं। उनका वह प्रवाह सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित हुआ। तदनन्तर सन्तुष्ट हुए महादेव आदि सब देवता बोले—'राजन्! तुम मनोवांछित वर माँगो।'
उनके ऐसा कहनेपर राजा सालंकायनने कहा—देवताओ! आपलोग कभी इस स्थानका परित्याग न करें। हमारे राष्ट्रमें अनावृष्टि आदि दोषोंसे पीड़ित प्रजाका कष्ट दूर हो और वह सदा फले-फूले। इसके सिवा इस स्थानपर आहवनीय अग्नि स्वयं ही सदा विद्यमान रहे।
देवताओंने कहा—राजन् तुमने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा होगा।
ऐसा कहकर सब देवता वहाँसे अन्तर्धान हो गये। राजाका राज्य पुनः वृद्धिको प्राप्त हुआ और इन्द्र इच्छानुसार वर्षा करने लगे। वह यज्ञ पूरा करके राजा सालंकायन अपने मन्त्रियों तथा अन्तःपुरकी रानियोंके साथ देवनिर्मित अयोध्यापुरीमें लौट आये। युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुम्हें उमामहेश्वरतीर्थका माहात्म्य सुनाया है।
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श्वेतकिंशुक आदि तीर्थोंकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! अमरेश्वरके पूर्वभागमें स्थित श्वेतकिंशुक नामक पापनाशन तीर्थका माहात्म्य सुनो, जिसमें स्नान करनेवाले मनुष्य स्वर्गलोकको प्राप्त होते हैं। वहाँ उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला श्वेतकिंशुक नामक लिंग है तथा स्वर्गरूपी फल प्रदान करनेवाले ताटकेश्वर महादेव भी वहीं विराजमान हैं। उसके बाद वर्ण नामसे प्रसिद्ध एक दूसरा पापनाशक तीर्थ है,
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जहाँ लोकमें वर देनेवाले त्र्यम्बक महादेव विद्यमान हैं। उस तीर्थके माहात्म्यसे गण्डेशको स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई थी। वहाँ गण्डकेश्वर और शुक्लेश्वर लिंग प्रसिद्ध हैं। नर्मदा और दन्तिवनिकाका संगम सर्वत्र विख्यात है। वहीं सब सिद्धियोंको देनेवाला लिंगेश्वर लिंग है। बालकेश्वर और पूर्णकेश्वर लिंग भी वहीं हैं। नर्मदाके उत्तर तटपर उत्तम नर्मदापुर है। कपिशिला नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है, जो सब अनर्थोंका निवारण करनेवाला है। वहीं सिद्धेश्वर तथा नाडकेश्वर लिंग हैं।
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर वैदूर्य पर्वतसे पश्चिम दिशाकी ओर जाय। वहाँ शशभी और नर्मदाका संगम है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहीं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला शशभेश्वर लिंग है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। वह गर्दभीकी योनिसे छुटकारा दिलानेवाला है। यहीं मण्डलेश्वर नामक तीर्थ और लिंग है, जहाँ माण्डलिक नरेश अजापाल और मनु सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। वहाँ यज्ञ करके मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। वहाँ तिल और जल देने तथा पिण्डदान करनेसे जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतक पितरोंको तृप्ति बनी रहती है। वहाँ जो दान दिया जाता है, उसके पुण्यकी कोई संख्या नहीं है। वहाँसे कान्तारकतीर्थमें जाय, जो सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ और शुभ है। वहाँ स्नान करनेवाले स्वर्गमें जाते हैं और मरनेवाले मोक्ष पाते हैं।
त्रेतायुगमें रघुवंशी राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण मिथिलेशकुमारी सीताके साथ यहाँ आकर नर्मदाके पार हुए थे। वे दोनों राजकुमार भगवान् विष्णुके अवतार थे और पिताकी आज्ञाका पालन करते हुए इस मार्गसे वनमें गये थे। उन्होंने इस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करके भक्तिपूर्वक महादेवजीका पूजन किया था। जहाँ उनका स्नान हुआ, वह स्थान 'राजतीर्थ' के नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ लक्ष्मणेश्वर तथा सीतेश्वर लिंग हैं, जो देवताओं और दानवोंद्वारा वन्दित हैं। उस तीर्थमें शूलपाणि महेश्वरका पूजन करके मनुष्य गणपतिपदको प्राप्त होता है।
नृपश्रेष्ठ! वहाँसे पुण्यतीर्थ शिवालयको जाय। वहीं परम मनोहर माहिष्मती पुरी है, जिसका दर्शन करके कोई भी नीचे नहीं गिरता। वहाँ अपनी ज्वालाओंसे प्रज्वलित कालाग्निरुद्रका निवास है। तदनन्तर कोटितीर्थ है, जहाँ कोटीश्वर लिंग विराजमान है। उसकी पूजासे कोटि यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। वहाँ दिये हुए दानका पुण्य कोटि-गुना बढ़ जाता है। उसके बाद दशाश्वमेधतीर्थ है, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है। वहाँ तिल और जलसे तर्पण करनेपर पितरोंकी उत्तम गति होती है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य तेजस्वी हो जाता है। तत्पश्चात् वन्ध्या और नर्मदाका संगम है, जो देवताओं और असुरोंसे भी नमस्कृत है। राजेन्द्र! उस संगममें मुनकेश्वर लिंग है, जिसका दर्शन केवल योगियोंको होता है। साधारण मनुष्य उसे नहीं देख पाते। नर्मदाके दक्षिण तटपर चण्डीश्वर, उडुगणेश्वर और वकेश्वर लिंग हैं, जहाँ बगले स्वर्गको प्राप्त हुए हैं। गंगावह नामवाला एक तीर्थ है, जहाँ सब सिद्धियोंको देनेवाला एक शिवलिंग है। उस निर्मल शिवलिंगका नाम अंगारेश्वर जानना चाहिये। इसके बाद सोमतीर्थ और शुक्लतीर्थ हैं। फिर निरसतीर्थ और ध्रुवतीर्थ हैं। युधिष्ठिर! इन सबके सिवा वहाँ और भी अनेक सहस्र तीर्थ हैं। पिपीलिकातीर्थ भोग और मोक्ष देनेवाला है। वहाँ पूर्वसे पश्चिम एक कोसतककी भूमिमें पंद्रह हजार तीर्थ हैं, जो ऋषियों और देवताओंके द्वारा सेवित हैं। वहाँ जो दान और होम आदि किया जाता है, उसके पुण्यकी कोई संख्या नहीं है। जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो उमा-महेश्वरलोकमें आनन्द भोगता है। अतः मनुष्यको उचित है कि वह शान्तचित्त होकर महादेवजीका पूजन करे और सदा सबके प्रति मैत्री एवं करुणाका भाव बनाये रखे। राजन्! पुण्यवान् पुरुषोंमें ही मैत्री और मुदिता होती है। सब प्राणियोंमें पुण्यवानोंको ही सुख होता है, यह विचारकर पुण्यके लिये यत्न करे। जो पुण्यक्षेत्र नहीं हैं, ऐसे स्थानपर किया हुआ पुण्य सम होता
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| है (जितना किया जाता है, उतना ही रहता है)। परंतु जहाँ नर्मदाका संगम हो, वहाँका थोड़ा-सा भी पुण्य असंख्य होता है। अन्य स्थानोंपर किया हुआ पाप पुण्यक्षेत्रमें नष्ट हो जाता है, किंतु यदि पुण्यक्षेत्रमें पाप किया जाय तो वह वज्रलेप हो जायगा। महाबली कार्तिकेयजीने जहाँ नर्मदा पार की थी, वहाँ कार्तिकेनेश्वर नामक सिद्धिदायक | लिंग प्रतिष्ठित है, यह जानना चाहिये। इसके सिवा वहाँ चन्द्रेश्वर, शिखीश्वर तथा सब पापोंका नाश करनेवाला शक्तीश्वर लिंग है। इन सब लिंगोंका भक्तिभावसे पूजन करके मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं, अन्तमें वह शिवलोकको प्राप्त होता है और उसके पितरोंको स्वर्गलोकमें स्थान मिलता है। |
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मान्धाताका चरित्र
| मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर सर्वदेववन्दित गौरीखण्डकी यात्रा करे। वहाँ स्नान करके मनुष्य सब तीर्थोंका फल पाता है तथा उसमें तिल और जलसे तर्पण करनेपर पितरोंको अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है। गौरीखण्डेश्वर नामक मणिमय लिंग जलके मध्यभागमें स्थित है। मनुष्य उसका दर्शन नहीं कर पाते। वह देवताओंद्वारा पूजित होता है। वहीं कुमारेश्वर नामक शिवलिंग प्रतिष्ठित है। साथ ही भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला मयूरेश्वर लिंग भी है, जिसके माहात्म्यसे मयूरगण स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं। उनके पूजनसे तिर्यग्योनिकी प्राप्ति नहीं होती।<br><br>तत्पश्चात् करमर्दा संगममें स्नान करनेके लिये जाय। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें जिसने स्नान कर लिया, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। करमर्दा में स्नान करके करमर्देश्वर लिंगका पूजन करना चाहिये। वहाँ पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकको प्राप्त होता है।<br><br>युधिष्ठिर बोले—मुने! राजाओंमें श्रेष्ठ मान्धाता तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। मैं उन बुद्धिमान् राजाका चरित्र सुनना चाहता हूँ।<br><br>मार्कण्डेयजीने कहा—महाभाग! इक्ष्वाकुवंशमें एक युवनाश्व नामक राजा हो गये हैं। वे राजर्षि बहुत समयतक सन्तानहीन ही रहे। तब उन्होंने अपना राज्य मन्त्रियोंके अधीन करके वनमें प्रवेश किया और शास्त्रोक्त विधिसे अपने मनका संयम | करके फल-मूलका भक्षण करते हुए बड़ी भारी तपस्या की। एक दिनकी बात है। वे राजा प्याससे विकल हो गये। उनका गला सूखने लगा। तब वे पानीके लिये आश्रमके भीतर गये। रात्रिका समय था। सब लोग सो गये थे। अतः उनके माँगनेपर भी किसीने उनकी बात नहीं सुनी। किसी शक्तिशाली ऋषिते उन्हीं राजा युवनाश्वको पुत्रकी प्राप्तिके लिये मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके एक जलपूर्ण कलश स्थापित कर रखा था। प्यासे हुए राजा बड़े वेगसे दौड़े और उसी जलको पीकर सो रहे। प्याससे व्याकुल राजा उस शीतल जलको पीकर बहुत सुखी हुए।<br><br>तदनन्तर मुनियोंको यह बात मालूम हुई। उन्होंने कुपित होकर पूछा—'किसने कलशका जल पी लिया है।' युवनाश्वने कहा—'महात्माओ! यह काम तो मैंने ही किया है।' तब महर्षि भार्गवने कहा—'राजन्! यह जल तुम्हारे पुत्र होनेके उद्देश्यसे तपस्यासे संचित एवं अभिमन्त्रित करके रखा गया था। इससे महाबलवान् एवं तपोबलसे युक्त सर्वधर्मपरायण पुत्रका जन्म हो, इस संकल्पसे मन्त्रयुक्त विधिके द्वारा इस जलका संस्कार किया गया था। यह तुम्हारे लिये पीने योग्य नहीं था। आज तुम्हारे द्वारा जो कार्य हुआ है, वह अवश्य ही प्रारब्धसे प्रेरित है। महाराज! इस जलको पीनेसे तुम गर्भवान् होओगे।'<br><br>तदनन्तर सौ वर्षोंके पश्चात् राजा युवनाश्वकी |
| १००० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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बायीं कुक्षि फाड़कर सूर्यके समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। तो भी राजाकी मृत्यु नहीं हुई। उस समय महातेजस्वी इन्द्र उस बालकको देखनेके लिये आये। देवता पूछने लगे—‘देवराज ! यह किसका दूध पीयेगा ?’ इन्द्र बोले—‘एष मां धाता—यह मुझे ही पान करेगा।’ ऐसा कहकर उन्होंने बालकके मुँहमें अपनी तर्जनी अँगुली डाल दी। बालक बड़े हर्षके साथ उस अँगुलीका अमृतरस पीने लगा। तत्पश्चात् इन्द्रने उसका ‘मान्धाता’ यह सार्थक नाम रख दिया।
इस प्रकार बालक मान्धाता सोलह वर्षोंतक इन्द्रकी तर्जनी पी-पीकर बढ़ता रहा। उसे आयुर्वेद आदि दिव्य शास्त्रोंका ज्ञान केवल उनके चिन्तनसे हो गया। आजगव नामक धनुष, सींगके बाण और अभेद्य कवच—ये तत्काल उनके पास स्वतः उपस्थित हो गये। इन्द्रने समस्त देवताओंके साथ मान्धाताका राज्याभिषेक किया। महाराज मान्धाताने धर्मसे सम्पूर्ण लोकोंको उसी प्रकार व्याप्त कर लिया, जैसे भगवान् विष्णुने अपने तीन पगोंसे त्रिलोकीको नाप लिया था। उन महात्माका शासनचक्र अप्रतिहत गतिसे चलता था। सैकड़ों राजा स्वयं उनकी सेवामें उपस्थित हुए। इस प्रकार उनका समूची पृथ्वीपर एकच्छत्र अधिकार था। उन्होंने प्रचुर दक्षिणावाले अनेक यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन किया। उन प्रसन्नचित्त, परम बुद्धिमान् और अमित तेजस्वी नरेशने अतिशय धर्मका अनुष्ठान करके इन्द्रके आधे सिंहासनको प्राप्त किया था। उन्होंने धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन किया। उन महात्माका राज्य दस करोड़ वर्षोंतक चलता रहा। एक समय बारह वर्षोंतक वृष्टि नहीं हुई। उस समय मान्धाताने वज्रपाणि इन्द्रके देखते-देखते अपने राज्यकी खेतीको बढ़ानेके लिये बलपूर्वक वर्षा करवा ली। वहीं महाराज मान्धाताका यह देवस्थान है। उन्हींके पुण्यतम देशमें अमरकण्टक पर्वत देखा जाता है। उन्होंने अमरकण्टकपर ॐकारेश्वर शिवके आगे सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इस प्रकार स्तवन किया—‘जगत्की उत्पत्ति करनेवाले परमेश्वर ! आप ही कालगतिके प्रवर्तक हैं, आप ही संसारस्वरूप और संसारका संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। ॐ महादेवजीको नमस्कार है। भगवान् शम्भु और भवको नमस्कार है। तीन नेत्र और तीन मूर्ति धारण करनेवाले तीनों लोकोंके स्वामी आपको नमस्कार है। कालरहित, जरारहित और मृत्युरहित आपको बारंबार नमस्कार है। जो लोग प्रतिदिन आदिदेव भगवान् ॐकारेश्वरका ध्यान करते हैं, उनकी इस संसारसमुद्रमें पुनरावृत्ति नहीं होती।’
कालरूपधारी ॐकारस्वरूप उमानाथ महादेवजीने यह स्तुति सुनकर राजा मान्धातासे कहा—सुव्रत ! तुम कोई वर माँगो।
मान्धाताने कहा— देवेश्वर ! वैदूर्य नामसे प्रसिद्ध यह शैलराज मान्धाता नाम धारण करे और आपके प्रसादसे देवस्थान बन जाय। यहाँ जो मनुष्य दान, तप, पूजा तथा प्राणविसर्जन करें, वे शिवधामके निवासी हों।
मान्धाताका यह वचन सुनकर महादेवजी बोले— नृपश्रेष्ठ ! मेरे प्रसादसे यह सब कुछ होगा। इस प्रकार वरदान पाकर महाराज मान्धाता अपनी पुरीको लौट गये। युधिष्ठिर ! यह सब मान्धाताका उत्तम चरित्र तुम्हें बताया गया। इस तीर्थके माहात्म्यसे मान्धाता आदि नरेश सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाएँ प्राप्त करके भगवान् विष्णुके धाममें विहार करते हैं।
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- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १००१ ---|---
बाणासुरके तीन पुरोंका भगवान् शंकरके द्वारा संहार, जालेश्वरनामक बाणलिंगकी उत्पत्ति और बाणासुरको शिवलोक-प्राप्ति
मार्कण्डेयजी कहते हैं—सत्ययुगमें बलि नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ दैत्य हुए। उनके महापराक्रमी पुत्रका नाम बाणासुर था। वह अपनी सहस्र भुजाओंके कारण विख्यात था। उसने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने कहा—'वत्स! तू कोई श्रेष्ठ वर माँग ले।'
बाणासुर बोला—प्रभो! मेरा नगर दिव्य एवं सम्पूर्ण देवताओंके लिये अजेय हो। आपको छोड़कर दूसरे किसी देवताके लिये यहाँ प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन हो। मेरा यह नगर मेरे स्थिर होनेपर स्थिर रहे और मेरे चलनेपर वह साथ-साथ चले—सर्वथा मेरे मनके अनुकूल बना रहे।
महादेवजीने कहा—'एवमस्तु'। तदनन्तर भगवान् विष्णुने भी बाणासुरसे कहा—'यदि महादेवजीने तुम्हें एक पुर तुम्हारे मनके अनुरूप दिया है तो मैं भी तुम्हें वैसा ही दूसरा पुर देता हूँ।' तत्पश्चात् दोनों देवता श्रीविष्णु और शिवने एकत्र होकर कहा—'बाणासुर! अब तुम शीघ्र ही ब्रह्माजीके पास जाओ।' तब बलिका पुत्र ब्रह्माजीके पास गया। ब्रह्माजीने उसे हृदयसे लगाया और कहा—'वत्स! भगवान् शिव और विष्णु दोनोंने तुम्हें एक-एक पुर प्रदान किया है। अतः मैं भी वैसा ही एक पुर और तुम्हें देता हूँ। इन तीनों पुरोंको प्राप्त करके बाणासुर त्रिपुरके नामसे विख्यात हुआ। युधिष्ठिर! इस प्रकार वरदान पाकर सहस्र भुजाओंके विस्तारसे शक्तिशाली बना हुआ बाणासुर समस्त देवताओंके लिये अवध्य हो गया। उसने यक्ष, विद्याधर, देव, दानव, गन्धर्व और राक्षसोंके समस्त निवासस्थानोंको नष्ट कर दिया। वहाँकी वेदिकाएँ तोड़-फोड़ डालीं। इन्द्रकी अमरावतीपुरीको उजाड़ दिया। उसके अत्याचारसे उद्विग्न होकर सब देवता महादेवजीके पास गये और इस प्रकार बोले—'भगवन्! आपने, श्रीविष्णुने तथा श्रीब्रह्माजीने भी बाणासुरको वरदान देकर अजेय बना दिया है। उसके साथ युद्ध करनेकी शक्ति किसीमें भी नहीं है। जो भी उसके सामने खड़ा होगा, उसे वह भस्म कर सकता है।'
महादेवजी बोले—देवताओ! तुम सब लोग तीस करोड़की संख्यामें हो और बड़े बलवान् हो। सब लोग संगठित होकर जाओ और यत्नपूर्वक त्रिपुरका विनाश करो।
यह सुनकर सब देवता तीखे अस्त्र-शस्त्र लेकर बाणासुरके—त्रिपुरके समीप गये। किंतु उस दैत्यने समस्त देवताओंको क्षणभरमें परास्त कर दिया। उन सबके अस्त्र-शस्त्र भी छीन लिये। देवताओंके पाँव उखड़ गये। वे हतोत्साह होकर पुनः महादेवजीके समीप आये। महादेवजीने पूछा—'तुम सब लोगोंने वहाँ जाकर क्या किया?' देवताओंने कहा—'भगवन्! क्या कहें, हम उसका पराक्रम वर्णन करनेमें असमर्थ हैं।
देवताओंकी वह बात सुनकर भगवान् शिवने कहा—अच्छा तो इस महादुष्ट त्रिपुरका संहार मैं स्वयं करूँगा। यह कहकर वे कैलाससे चले और जहाँ त्रिपुरासुर था वहाँ जा पहुँचे। उनके साथ देवी पार्वती भी थीं। चण्डेश्वर, नन्दी, महाकाल, महेश्वर, वृष, भृंगिरिटि, विघ्नेश (गणेश), स्कन्द, महावीर पुष्पदन्त, घण्टाकर्ण, महोदर, गोमुख, हस्तिकर्ण, स्थूलजंघ और वृकोदर—ये पंद्रह पार्षद भी भगवान् शिवके साथ गये। वे सब-के-सब महादेवजीके तुल्य पराक्रमी थे। जहाँ महान् क्षेत्रस्वरूप श्रीशैल नामका सिद्ध पर्वत है, वहीं ठहरकर महादेवजीने देवीसे कहा—'प्रिये! यहीं त्रिपुरासुरको मारना उचित होगा।' ऐसा कहकर भगवान् शंकरने उस पर्वतको अपना प्रधान निवास स्थान बनाया और व्यापक विराड्रूप धारण करके पिनाक नामक धनुष हाथमें लिया। फिर एक पैरसे पातालको
| १०0२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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और दूसरेसे ब्रह्माण्डको दबाया तथा त्रिपुरासुरकी ओर लक्ष्य बाँधकर अघोर नामक बाणका प्रहार किया। उस अस्त्रसे दग्ध होकर त्रिपुरके तीन खण्ड हो गये। उसे जर्जर करके शिवजीने नर्मदाके जलमें गिरा दिया। वहाँ गिरनेपर वह सात पातालोंका भेदन करके रसातलको चला गया। इससे वहाँ जालेश्वर नामक तीर्थ प्रकट हुआ, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। जालेश्वरदेवका पूजन करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे छुटकारा पा जाता है और कोटि सहस्र कल्पोंतक भगवान् शिवके धाममें सुखपूर्वक निवास करता है। जो वहाँ स्नान करते हैं, वे तो स्वर्गमें जाते हैं और जो मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। युधिष्ठिर! वहाँ तिल और जलसे तर्पण करने तथा पिण्डदान देनेसे जबतक भगवान् शंकर और नर्मदाजी स्थित हैं, तबतक पितर तृप्त रहते हैं। कालाग्निरुद्रके समान प्रज्वलित त्रिपुरनाशक अघोरास्त्रको नर्मदाके सिवा दूसरा कौन धारण कर सकता है? इस प्रकार अघोरास्त्रसे छूटा हुआ बाणजाल ही ‘जालेश्वर' (नामक बाणलिंग) कहलाया।
अपने तीनों पुरोंके दग्ध होनेपर बाणासुर भयभीत हो भगवान् शिवकी इस प्रकार स्तुति करने लगा—अनादिदेव! ईश! आपको नमस्कार है। विघ्नेश्वर! आपको नमस्कार है। महेश्वर! आपको नमस्कार है। सर्वज्ञ! अज्ञानहारी हर! ज्ञानदाता शिव! आपको नमस्कार है। अनन्तगुणमय रत्नोंसे विभूषित आप परमेश्वरको नमस्कार है। परात्पर! परातीत! उत्पत्ति और पालन करनेवाले शिव! आपको नमस्कार है। सब प्रयोजनोंकी सिद्धिके साधनभूत विश्वनाथ! आपको नमस्कार है। धनंजय! निराधार! स्वभावसे ही उपद्रवरहित आपको नमस्कार है। सदा प्रसन्न रहनेवाले परमेश्वर! आप सम्पूर्ण योगोंके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है। भूतनाथ! जगन्नाथ! सर्वाधार! आपको नमस्कार है। सृष्टि, संहार, मोक्ष और सात पातालोंके आश्रय! आपको नमस्कार है। त्रिनेत्र और त्रिशूल धारण करनेवाले त्रिलोकस्वरूप आपको नमस्कार है। चन्द्रशेखर! देवता और असुर दोनों आपके चरणोंमें नतमस्तक होते हैं, आपको नमस्कार है। महाप्रभो! मैंने अपनी जिह्वाकी चपलताके कारण आपके विषयमें कुछ कहनेकी धृष्टता की है, आप उसे क्षमा करें। आपके गुणोंका वर्णन करनेमें कौन समर्थ है।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**बाणासुरद्वारा की हुई इस स्तुतिको सुनकर भगवान् शिव उसपर प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले—‘दैत्यराज! सेवापराधजनित तुम्हारा यह दोष क्षमा किया गया। तुम कोई वर माँगो।'
**बाणासुर बोला—**देव! मैं अपने परिवारसहित इसी शरीरसे आपके उस परम धामको जाऊँ, जहाँ पुनर्जन्मका भय नहीं है।
बाणासुरका यह वचन सुनकर महादेवजीने कहा—दैत्यराज! तुम मेरी भक्तिके प्रसादसे मेरे समीप निवास करोगे। तत्पश्चात् वह दिव्य विमानपर आरूढ़ हो महादेवजीके प्रसादसे उन्हींके लोकमें चला गया।
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अमरकण्टक और यज्ञपर्वतके श्रेष्ठ तीर्थ एवं लिंग, राजा इन्द्रद्युम्नका यज्ञ और उन्हें देवोंका वरदान
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! अमरकण्टक पर्वतपर सब ओर अत्यन्त गुप्त पुण्यका निवास है। उस गिरिश्रेष्ठसे लेकर नर्मदा नदीतक सब तीर्थ अत्यन्त पवित्र माने गये हैं। अमरकण्टकसे उत्तरभागमें यज्ञ पर्वत है, जो विन्ध्याचलका कनिष्ठ पुत्र और पर्यंक पर्वतका भाई है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने वहीं सौत्रामणि नामक यज्ञ किया था और इन्द्रने भी उसी पर्वतपर अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किया था।
| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १००३ |
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महर्षि दधीचि तथा अन्य देवताओंने वहीं बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। उसी यज्ञ पर्वतसे चतु नामकी एक महानदी निकली है, जो नर्मदामें जाकर मिली है। वह संगम विश्वविख्यात तीर्थ है। उसके तटपर पीले रंगके कुश पृथ्वीपर फैले हैं। उनसे श्राद्ध करनेपर वे पितरोंको मोक्ष देनेवाले होते हैं। जहाँ चतु और नर्मदाका संगम है और जहाँ यज्ञ पर्वत है, इन दोनोंके बीचकी भूमिमें जो श्राद्धका अनुष्ठान करता है, उसके पितर पूर्ण तृप्त होते हैं। जो वहाँ स्नान और सिद्धेश्वर एवं चतुष्केश्वर लिंगकी परिक्रमा करता है, उस मनुष्यकी लोकमें पुन: गणना नहीं होती—वह मुक्त हो जाता है। युधिष्ठिर! वहाँ महादेवजी संगममें स्थित हैं। मनुष्य उनका दर्शन नहीं कर पाते। देवता, असुर और नागकन्याओंद्वारा उनका पूजन किया जाता है।
सुपर्ण नामसे प्रसिद्ध एक जितेन्द्रिय ब्रह्मर्षि थे। उनकी पतिव्रता धर्मपत्नीका नाम पुरुहूता था। वे दोनों दम्पति नैमिषारण्यमें निवास करते थे। एक दिन पर्वकालमें ऋतुस्नाता होनेपर पुरुहूताने अपने पतिको प्रसन्न करके कहा—'महामुने! आज मेरे साथ सहवास कीजिये, जिससे मुझे सम्पूर्ण वंशको पवित्र करनेवाला पुत्र प्राप्त हो। पुत्रके द्वारा मनुष्य पुण्यलोकोंपर विजय पाता है। पुत्रसे देवता और पितर तृप्त होते हैं। अतः आप पुत्र उत्पन्न करें।'
ब्राह्मणने कहा—प्रिये! आज अमावास्या है। इसमें मैथुनका निषेध किया गया है। अतः आज यह नहीं करना चाहिये। पितरोंके लिये तो आजके दिन मैथुन विशेषरूपसे वर्जित है। जो अमावास्याके दिन ऋतुकालमें भी पत्नीसंगम करता है, पितर उसका मांस भोजन करते हैं। उनके इस कथनसे पत्नीको सन्तोष हो गया और दोनों शिवाराधनमें तत्पर हो गये।
नील गंगाके पश्चिम और नर्मदाके उत्तर व्यतीपातेश्वर नामक शिवलिंग है, जो परम सिद्धि देनेवाला है। उसे साक्षात् जगदीश्वर सोमनाथका ही स्वरूप समझो। वहाँ सावित्री और सप्तर्षियोंने तपस्या की थी। नर्मदाके तटपर सावित्रीकुण्ड एक विख्यात तीर्थ है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्यको कन्यादानका फल प्राप्त होता है। वहाँ तिलसहित जल देने और अन्नदान करनेसे पितर सावित्रीलोकमें रहकर तृप्तिलाभ करते हैं।
पातालेश्वर नामसे प्रसिद्ध देवताओंके स्वामी जगदीश्वर सोमनाथका पूजन करके सब लोग शिवधामको प्राप्त होते हैं। सावित्रीकुण्डमें स्नान करके उसीके जलसे भगवान् सोमनाथका पूजन करे, इससे उस मनुष्यका पुन: इस संसारमें जन्म नहीं होता।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! सूर्यवंशमें इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो अयोध्याके अधिपति थे। उन्होंने पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन किया था। उनके राज्यकालमें चारों वर्णोंके लोग स्वधर्म-पालनमें तत्पर थे। प्रत्येक धेनु इच्छानुसार दूध देनेवाली कामधेनु थी और पृथ्वी हरी-भरी खेतीसे सुशोभित होती थी। एक दिन राजर्षि इन्द्रद्युम्नने महर्षि वसिष्ठसे पूछा—'महामुने! मैं अश्वमेध-यज्ञ करना चाहता हूँ, सो किस तीर्थमें उसका अनुष्ठान करूँ?'
वसिष्ठजी बोले—राजन्! वेदवेत्ता ब्रह्मर्षिगण! आपको जैसी सम्मति दें, उस प्रकार ब्राह्मण ऋत्विजोंके द्वारा आपको यज्ञका अनुष्ठान करना चाहिये। उस समय राजसभामें मरीचि, कश्यप, अंगिरा, गौतम, दुर्वासा, च्यवन, धूम्र, महामुनि कण्व तथा और भी बहुत-से उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर बैठे थे। महाराज इन्द्रद्युम्नने उन सबसे पूछा—'किस तीर्थमें किया हुआ यज्ञ मनोवांछित फल देनेवाला होता है?'
ऋषि बोले—राजन्! इस कार्यके लिये ऋषियोंने अनेक भिन्न-भिन्न तीर्थोंको श्रेष्ठ बताया है।
यह सुनकर दुर्वासाने हँसते हुए कहा—राजन्! ब्राह्मण ज्ञानकी अधिकतासे ज्येष्ठ माने जाते हैं, क्षत्रियोंमें जिसका बल और पराक्रम अधिक हो, वही ज्येष्ठ माना गया है, वैश्योंका ज्येष्ठत्व धन
| १००४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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और धान्यकी अधिकतापर निर्भर है तथा शूद्र जन्म एवं आयुके अनुसार ही ज्येष्ठ माने जाते हैं।* सात कल्पोंतक जीवित रहनेवाले तीनों वेदोंके ज्ञाता त्रिकालज्ञ महर्षि मार्कण्डेयजीके रहते हुए धर्मका निरूपण एवं निश्चय करनेकी शक्ति किसमें है? महाराज! आप नर्मदाके तटपर विद्यमान धर्मारण्यमें जाइये। वहाँ मार्कण्डेयजी जहाँ बतावें, उसी स्थानपर अपना यज्ञ प्रारम्भ करें।
‘देवर्षे! आप जैसा कहते हैं, वैसा ही करूँगा’—यों कहकर राजा इन्द्रद्युम्नने अपने मन्त्री देवगर्भको यज्ञकी सब सामग्री ले चलनेका आदेश दिया और स्वयं वहाँके ब्राह्मणों एवं मुनियोंके साथ दिव्य वाहनपर बैठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ यात्रा की। उनके साथ अन्तःपुरकी रानियाँ भी थीं। सबके साथ राजा इन्द्रद्युम्न धर्मारण्यमें पहुँचे, जहाँ मार्कण्डेयजी विद्यमान थे। वहाँ जाकर उन्होंने मार्कण्डेयजीको साष्टांग प्रणाम और उनका यथावत् पूजन किया। राजा इन्द्रद्युम्नको आया देख महामुनि मार्कण्डेयजीने पूछा—‘नृपश्रेष्ठ! कुशल तो है न? बहुत दिनोंके बाद दिखायी दिये हो। इन ब्रह्मर्षियोंके साथ यहाँ किस प्रयोजनसे तुम्हारा आगमन हुआ है?’
इन्द्रद्युम्न बोले—द्विजश्रेष्ठ! मैं यज्ञ करनेके लिये आया हूँ, सो किस तीर्थमें उसका अनुष्ठान करूँ?
मार्कण्डेयजीने कहा—राजन्! समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब नर्मदा नदीमें स्नान करनेके लिये आते हैं। उत्तरमें जितने शिवलिंग हैं और दक्षिणमें जो-जो तीर्थ हैं, वे सब कोटितीर्थमें लीन होते हैं, इसीलिये उसका नाम कोटितीर्थ हुआ है। भगवान् शंकरने पूर्वकालमें पार्वतीदेवी, कार्तिकेयजी, ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवताओंके सम्मुख इस तीर्थके माहात्म्यका इस प्रकार वर्णन किया है—‘ॐकारेश्वरके समीप नर्मदामें कोटितीर्थ बताया गया है। वहाँ जो दान, होम, यज्ञ तथा दुष्कर तप आदि पुण्यकर्म किया जाता है, उसके पुण्यका अन्त नहीं है। ग्रहणकालमें कुरुक्षेत्रकी प्रशंसा की जाती है। परंतु नर्मदा सदा सब कार्योंके लिये पुण्यदायिनी कही गयी है। अतः तुम कोटितीर्थमें यज्ञ करो।
यह सुनकर परम धर्मात्मा राजा इन्द्रद्युम्नने अमित तेजस्वी मार्कण्डेय मुनिके चरण पकड़े और कहा—मुने! आपने जो कुछ कहा है, उसके लिये मैं अपने ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह मानता हूँ। इसी समय सुन्दर यज्ञयूप, विभिन्न देशोंके क्षत्रियवृन्द, गौ, अश्व, हाथी तथा अन्यान्य आवश्यक सामग्री साथ लेकर मन्त्री देवगर्भ वहाँ आ पहुँचे। तब राजाने तीस योजनका एक विशाल यज्ञ-मण्डप बनवाया। उसमें बहुत-से यूप लगाये और अपने प्रमाणके अनुसार नाना प्रकारके कुण्ड निर्माण कराये। यज्ञ प्रारम्भ हुआ और वेदमन्त्रोंकी उच्चारण-ध्वनिसे भूमि और आकाशका मध्यभाग गूँज उठा। सूर्यके सदृश तेजस्वी अग्निदेव अपने धूमरहित स्वरूपसे प्रज्वलित हो रहे थे। महाराज इन्द्रद्युम्नने उस यज्ञमें ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवका भी आवाहन किया। इनके साथ सम्पूर्ण देवता भी पधारे। राजाके यज्ञमें घी और दूधकी नदियाँ बहती थीं, जहाँ दही और खीरकी कीच जमी हुई थी। अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ सदा सबके लिये प्रस्तुत रहते थे। देवता, मुनि तथा चार प्रकारके प्राणिसमुदाय भलीभाँति तृप्त हुए। अन्तमें ब्राह्मणोंको प्रचुर दक्षिणा दी गयी। इस प्रकार वह यज्ञ सम्पूर्ण हुआ।
तदनन्तर ध्रुव तथा ब्रह्मपुत्र महर्षियोंको विदा करके ॐकारेश्वरके स्वरूपको जानकर राजाने उनका पूजन किया। मणि-माणिक्य आदि रत्नोंसे पहले ॐकारलिंगको विभूषित किया। फिर गन्ध, नाना प्रकारके धूप, कपूर, अगर, चन्दन, ध्वज, छत्र, वितान, व्यजन और दिव्य चामरोंसे पूजा सम्पन्न करके इस प्रकार स्तुति की—‘जिस बिन्दुयुक्त ॐकारका योगीजन सदा ध्यान करते हैं तथा जो ॐकारस्वरूप काम और मोक्ष
* विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः। वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणां चैव जन्मतः॥ (स्क० पु०, आव० रे० ३४। १९-२०)
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १००५
देनेवाले हैं, उनको बार-बार नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रको भी वर देनेवाले सर्वदेवमय शिव! आपको नमस्कार है। रुद्र! पुण्यसे सुशोभित होनेवाली जो आपकी कल्याणमयी अघोर (सौम्य) मूर्ति है, उसके द्वारा आप मुझपर कृपा कीजिये। आपके सब ओर हाथ और पैर हैं। सब ओर नेत्र, सिर और मुख हैं। लोकमें सब ओर आपके कान हैं तथा आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार स्तुति करनेपर ॐकारलिंगके मध्यभागमें एक दूसरा लिंग दिखायी दिया, जो प्रज्वलित कालाग्निके समान कान्तिमान् था। उसने इन्द्रद्युम्नसे कहा—'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो कामना हो, उसके लिये वर माँगो।'
इन्द्रद्युम्न बोले—देव! वहाँ यज्ञ पर्वतपर देवद्रोणीमें भगवती पार्वतीके साथ पूजित होकर आप सदा निवास करें। देवदेवेश्वर! इस तीर्थमें जो प्राणत्याग करे, वह शिवलोकमें जाय।
ॐकारेश्वर बोले—नृपश्रेष्ठ! तुम्हारी यह सब कामना पूर्ण हो।
इतना कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये। उन्हींके साथ अन्यान्य देवता भी अपने-अपने स्थानको चले गये। भगवान् शंकर कैलाशधामको गये। राजा इन्द्रद्युम्नने वहाँ चार प्रकारके प्राणियोंको सुनाकर कहा—'तुम सब लोग मेरे यज्ञके प्रभावसे नीरोग हो जाओ और सभी तृप्त रहो।' तत्पश्चात् राजा इन्द्रद्युम्नने साष्टांग प्रणाम करके भगवान् विष्णुकी स्तुति की।
राजाने कहा—मैं केशव (जलमें शयन करनेवाले), माधव (लक्ष्मीपति), विष्णु (सर्वव्यापी), गोविन्द, मधुसूदन (मधु दैत्यको मारनेवाले), पद्मनाभ (नाभिसे कमल उत्पन्न करनेवाले), हृषीकेश (इन्द्रियोंके स्वामी), श्रीधर, त्रिविक्रम (तीन विशाल डगवाले विराट्रूपधारी वामन), दामोदर (माता यशोदाके द्वारा रस्सीसे कटिभागमें बँधनेवाले), वासुदेव (वसुदेवपुत्र) तथा श्रीहरि (पाप हरण करनेवाले) को प्रणाम करता हूँ। जो शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और वनमालासे विभूषित हैं, सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक, जगत्के स्वामी, लक्ष्मीजीके पति तथा सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं, उन भगवान् श्रीकान्त, श्रीधर, श्रीश एवं श्रीनिवासको मैं नमस्कार करता हूँ। अच्युत! अनन्त! यज्ञेश! यज्ञाधिप! आपको नमस्कार है। ऋक्, साम, अथर्व और यज्ञ (यजुर्वेद)-स्वरूप आपको नमस्कार है। नृसिंह, मत्स्य, वाराह और कूर्मरूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। पवित्र वाहनपर आरूढ़ होनेवाले गरुड़ध्वज! आपको नमस्कार है। जो सहस्र मस्तकोंवाले, सकल-निष्कल, जाननेयोग्य, पुरुष (अन्तर्यामी), अध्यक्ष (साक्षी) तथा सबके आदिकारण हैं, उन भगवान् नारायणदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। दैत्योंका अन्त करनेवाले देवता श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। हिरण्य, पृथ्वी तथा यज्ञको अपने गर्भमें धारण करनेवाले, अमृतकी उत्पत्तिके हेतुभूत श्रीविष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। वासुदेव! श्रीगर्भ एवं ज्ञानगर्भस्वरूप आपको नमस्कार है। प्रभो! आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि की है। आप ही प्रत्येक युगमें सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। आपके सब ओर नेत्र हैं, सब ओर मुख हैं। आप अव्यक्त एवं जाननेयोग्य हैं। सम्पूर्ण विश्वके आत्मा, प्रकाशक और सबके भीतर निवास करनेवाले आपको नमस्कार है। आप सूर्य, वायु, अग्नि और चन्द्रमा हैं। देवदेवेश्वर! आप ही धाता, इन्द्र और प्रजापति हैं। सुरश्रेष्ठ! आपके ही प्रसादसे मेरे यज्ञकी सिद्धि हुई है।
राजाके द्वारा की हुई यह स्तुति सुनकर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने कहा—राजन्! तुम कोई वर माँगो।
राजा बोले—ॐकारलिंगके उत्तर भागमें वैदूर्य पर्वतकी चोटीपर आप जनार्दन लिंगके रूपमें निवास करें। यहाँ विधिपूर्वक आपकी पूजा करके मनुष्य श्रीविष्णुधामको प्राप्त हों, पशु-पक्षियोंकी योनिमें न जायँ तथा यमलोकमें भी प्रवेश न करें। यहाँ प्राणत्याग करनेपर मनुष्योंको
१००६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
आपके परम धामकी प्राप्ति हो और इस तीर्थमें पितरोंके निमित्त अन्नदान करनेपर वे पितर आपके प्रसादसे विष्णुधामको प्राप्त करें।
भगवान् विष्णुने कहा—नृपश्रेष्ठ ! मैं यहीं अवतार धारण करूँगा और तुमने जो कुछ माँगा है, वह सब मेरे प्रसादसे पूर्ण होगा।
ऐसा कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु अपने धामको चले गये। युधिष्ठिर ! इस प्रकार राजा इन्द्रद्युम्नके महान् यज्ञका वर्णन किया गया। उस यज्ञसे ही वह पर्वत समस्त संसारमें पुण्यतीर्थके रूपमें विख्यात हुआ। सिद्धेश्वरलिंगको ब्रह्माका और नारायणेश्वरको श्रीहरिका स्वरूप समझो। इसके श्रवण और कीर्तनसे मनुष्य विष्णुलोकमें सम्मानित होता है।
तत्पश्चात् सत्यव्रतपरायण राजाने तीर्थोंका स्तवन किया—पितरोंका उद्धार करनेके लिये समस्त तीर्थोंको मेरा बार-बार नमस्कार है।
तीर्थ बोले—महाभाग ! तुम हमसे मनोवांछित वर माँगो।
इन्द्रद्युम्नने कहा—तीर्थगण ! आप सब लोग मुझपर अनुग्रह करके ॐकारके समीपवर्ती तीर्थमें निवास करें।
'एवमस्तु' कहकर तीर्थोंने नर्मदा नदीका इस प्रकार स्तवन किया—अनेक कल्पपर्यन्त स्थित रहनेवाली तथा महादेवजीकी सर्वोत्कृष्ट कलास्वरूपा नर्मदादेवीको हम नमस्कार करते हैं। सब लोकोंमें अत्यन्त प्रसिद्ध एवं नदियोंमें श्रेष्ठ नर्मदाको हम मस्तक नवाते हैं। देवि ! आप हम तीर्थोंके प्रभावसे नहीं, किंतु स्वभावसे ही परम पवित्र हैं, ठीक उसी तरह जैसे भगवान् सूर्यकी प्रभा और अग्निदेवकी कान्ति पवित्र होती है।
नर्मदाकी स्तुति करके तीर्थोंने इन्द्रद्युम्नसे कहा—राजेन्द्र ! जैसे चन्द्रमाकी कला पवित्र होती है, उसी प्रकारसे महानदी नर्मदा भी हैं। यों कहकर सब तीर्थ अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने अर्घ्य देकर गंगाजीकी स्तुति की—'गंगा, भागीरथी, देवि, भोगवती, शुभा, जाह्नवी, मोक्षदा, भद्रा, तारिणी और पापनाशिनी इत्यादि नामोंसे प्रसिद्ध गंगादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। मातः ! आप ही स्वर्गमें देवाधिदेवोंसे वन्दित मन्दाकिनी कहलाती हैं। आप ही वेदमाता गायत्री, उमा और कात्यायनी हैं। देवि ! आपको साक्षात् महादेवजीने अपने सिरपर धारण किया है। इससे अधिक आपके विषयमें और क्या कहा जा सकता है। भगवान् चन्द्रार्धशेखरको छोड़कर दूसरा कौन आपकी स्तुति करनेमें समर्थ है?'
गंगाजीने कहा—महाराज ! मैं प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो।
राजाने कहा—देवेश्वरि ! आप सदा यहीं निवास करें।
गंगा बोली—राजेन्द्र ! ऐसा ही होगा। मैं अपने एक अंशसे सदा यहीं प्रवाहित होऊँगी।
ऐसा कहकर गंगा अपने स्थानको चली गयीं। इसके बाद राजा इन्द्रद्युम्नने नर्मदादेवीकी स्तुति की—'देवि ! तुम्हारे जलके प्रभावसे मैंने देवताओं और पितरोंको सन्तुष्ट किया है। तुमने चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीको पवित्र किया है। तुम सम्पूर्ण प्राणियोंकी माता और मनुष्योंको संसार-सागरसे पार उतारनेवाली हो। महादेवि ! मेकला, कल्पगा, नर्मदा और जलपूर्णा इत्यादि नामोंसे विख्यात होकर तुम विन्ध्यपर्वतकी शोभा बढ़ाती हो। शुभे ! सहस्रों वर्षतक तुम्हारी स्तुतिमें संलग्न रहनेपर भी कौन तुम्हारा भलीभाँति स्तवन कर सकता है।'
इस स्तोत्रसे सन्तुष्ट होकर नर्मदाने कहा—'राजन् ! तुम क्या चाहते हो, कहो। मैं तुम्हें वर दूँगी, जिससे सिद्धिको प्राप्त होओगे।' नर्मदाका यह वचन सुनकर ब्राह्मणोंसहित शिवभक्तिपरायण राजाने हँसते हुए कहा—'देवि !
| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १००७ |
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यदि मुझे वर देना चाहती हो तो अपने दक्षिण तटसे लेकर उत्तर तटतक सात धाराएँ कर लो।'
नर्मदा बोलीं—राजन् ! मेरे प्रभाव और प्रसादसे यह सब हो जायगा। इस बीचमें जो कुछ दान दिया जायगा, उसका पुण्य असंख्य होगा। यहाँ दान देनेवालोंका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होगा। शूद्र, चाण्डाल, मृग, पशु और सर्प आदि भी नीलगंगा-संगममें स्नान करने अथवा प्राण त्यागनेपर स्वर्गधामको जायँगे। | तत्पश्चात् नर्मदाको नमस्कार करके राजा इन्द्रद्युम्न अपने वाहनपर आरूढ़ हुए और सहस्रों राजाओंके साथ अपनी राजधानी देवनिर्मित पुरी अयोध्याको चले गये। वहाँ दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् वे स्वर्गलोगमें गये।<br><br>युधिष्ठिर! यह प्राचीन इतिहास तुमको सुनाया गया है। जो इसे कहते और सुनते हैं, वे यमलोक नहीं देखते और पापयोनिमें नहीं जाते हैं।
<div align="center">~~ ० ~~</div>पुराणलक्षण, कलिकालका प्रभाव तथा राजर्षि वसुदानके यज्ञमें प्रकट हुई कपिला और नर्मदाके संगमका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—ये पुराणके पाँच लक्षण हैं*। कलियुगमें मनुष्य प्रायः असमर्थ और अल्पजीवी होंगे। बुद्धिहीन तथा दुराचारपरायण होंगे। स्वाध्याय, वषट्कार, तप और यज्ञ आदि कोई भी सत्कर्म उनके द्वारा न होगा। वे स्त्रियोंकी कामना रखनेवाले और विषयलोलुप होंगे। ब्राह्मण सकामभावसे ही कर्म करनेवाले और याचक होंगे। सदा दान लेंगे और परिवारके भरण-पोषणमें ही आसक्त रहेंगे। स्त्रियोंके प्रति आसक्ति होनेके कारण वे आत्माको नहीं जानेंगे। धर्मिष्ठ और तपस्वी भी कुकर्म करेंगे। कलिकाल आनेपर अधिकांश लोग वाममार्गी और दिगम्बर हो जायँगे। सब प्रजा एक वर्णकी हो जायगी। राजा म्लेच्छ होगा। हीनयुग आनेपर जब भगवान् विष्णुका बौद्धावतार होगा, तब मनुष्य अल्पायु, अल्पवीर्य तथा अल्पपराक्रमी होंगे। नाना प्रकारके देशव्यापी उपद्रव होते रहेंगे। चाण्डालोंके वंशमें उत्पन्न ब्राह्मण वेदोंको पढ़ावेंगे। दूसरोंको वेदका उपदेश करेंगे और अपने वेद बेचेंगे। धन पानेके लोभसे राजाओंके दरबारमें जायँगे। अग्निहोत्र और कन्याओंका विक्रय करेंगे। कलियुगके वेदपाठी ब्रह्मचर्यव्रतसे रहित होंगे। दस-बारह | वर्षोंकी बालिका भी गर्भ धारण करेगी। स्त्री अपने पतिका और पुत्र अपने माता-पिताका आदर नहीं करेंगे। बहू सासकी और पुत्री माताकी बात नहीं मानेगी। ये सब बातें यहाँ संक्षेपसे बतायी गयी हैं।<br><br>युधिष्ठिर! एक दिव्य कथा श्रवण करो, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है।<br><br>पूर्वकालमें वसुदान नामवाले एक चक्रवर्ती राजर्षि थे। उनकी राजधानी अयोध्या थी। उनके राज्यमें कोई दीन, दुःखी अथवा दरिद्र नहीं होता था। प्रत्येक गाय स्वयं ही इच्छानुसार दुग्ध देनेवाली और पृथ्वी हरी-भरी खेतीसे सुशोभित थी। एक समय राजर्षि वसुदान वेदके पारंगत ब्राह्मण ऋत्विजोंके साथ यज्ञकी सब सामग्रीका संग्रह करके अमरेश्वरतीर्थमें गये। वहाँ उनका यज्ञ प्रारम्भ हुआ और निर्विघ्न समाप्त भी हो गया। अवभृथके जलसे वहाँकी स्वर्णनिर्मित समूची पृथ्वी भीग गयी। उस यज्ञमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवका एक साथ ही पूजन किया गया और वहाँ होमसे दूध और घीकी पृथक्-पृथक् धाराएँ बह निकलीं। गोमूत्रकी भी एक धारा बहने लगी और वेदोंके पारंगत विद्वान् ऋषि-मुनियोंने देवताओंको जो स्नान कराया था, उस जलकी भी एक धारा बह
* सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चेति पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ (स्क० पु०, आव० रे० ३५। १५)
| १०८८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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चली। इन सब धाराओंके आपसमें मिल जानेपर ब्रह्मर्षियों और देवताओंने देखा, एक नदी बह रही है। वह नदी कपिला नामसे प्रसिद्ध हुई। कपिला और नर्मदाका जहाँ संगम है, वहाँ रुद्रावर्ततीर्थ बताया गया है।
तदनन्तर दक्षिणाओंद्वारा सब ब्राह्मणोंका भलीभाँति सत्कार किया गया। उन्हें नाना प्रकारके वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके हाथी, घोड़े और रथपर बिठाया गया। देवताओंको भी ऐसा ही सत्कार प्राप्त हुआ। सब देवता सन्तुष्ट होकर राजर्षि वसुदानसे बोले—‘महाभाग! इस यज्ञसे हम बहुत प्रसन्न हैं, तुम कोई वर माँगो।’
वसुदान बोले—देवताओ! नर्मदा और कपिलाके संगममें स्नान करके जो मनुष्य महादेवजीकी पूजा करते हैं, वे दिव्य विमानोंद्वारा स्वर्गलोकमें जायँ और जिनकी यहाँ मृत्यु हो, वे पुनः संसारमें जन्म न लेकर मुक्त हो जायँ।
देवताओंने कहा—राजन्! तुम्हारे सभी अभीष्ट मनोरथ यथेष्ट सफल होंगे।
ऐसा कहकर सब देवता अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि वसुदान भी वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके साथ परम आनन्दसे युक्त हो अयोध्यापुरीमें लौट आये। उस तीर्थके प्रभावसे अन्तःपुर एवं परिवारसहित उन्होंने प्रचुर भोगोंका उपभोग किया और अन्तमें वे भगवान् शिवके परम धाममें गये। युधिष्ठिर! इस प्रकार नर्मदा और कपिलाके संगमका वृत्तान्त बताया गया। इसके श्रवण और कीर्तनसे मनुष्यको संसार-बन्धनसे छुटकारा मिल जाता है।
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अमरावतीमें भगवान्का दैत्यसूदनरूपसे निवास तथा वहाँके अन्यान्य तीर्थों और शिवलिंगोंका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाराज! नर्मदाके दक्षिण और कपिलाके पश्चिम तटपर भगवान् विष्णुकी मनोहर पुरी अमरावती है, जिसमें भगवान् लक्ष्मीपति कोटि कल्प और युगोंतक निवास करते हैं। प्राचीन कालमें देवताओं और असुरोंके युद्धमें देवकण्टक दानवोंद्वारा सब देवता परास्त हो गये। उस समय दानवोंके अत्याचारसे पीड़ित होकर पृथ्वीदेवी और ब्रह्मा आदि देवता क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे—‘दैत्योंका अन्त करनेवाले जनार्दन! देव! जगन्नाथ! आपकी जय हो। वेदोंके मूलस्थान जगदीश्वर! हम आपकी शरणमें आये हैं, आप हमारी रक्षा करें।’
इस स्तोत्रको सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—ब्रह्मन्! भूलोकमें जो-जो दुर्धर्ष दानव हैं, उन सबका मैं शीघ्र ही नाश करूँगा। ऐसा कहकर भगवान् विष्णु देवताओंके साथ आये और सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये अपने सुदर्शनचक्रसे दैत्योंके मस्तक काटने लगे। तब समस्त दानव भगवान् विष्णुके भयसे थर्रा उठे और पृथ्वी छोड़कर रसातलमें भाग गये। तदनन्तर पुनः ब्राह्मण, देवता और तपस्वीजनोंके यज्ञ पूर्ववत् होने लगे। युधिष्ठिर! उस पुरी (अमरावती)-में भगवान् विष्णु दैत्यसूदनके नामसे प्रतिष्ठित हुए। जो मनुष्य वहाँ प्राणत्याग करता है, वह विमानके द्वारा विष्णुलोकमें सम्मानित होता है। कपिलाके पश्चिममें नीलगंगाका आगमन हुआ है। उसमें स्नान करके मनुष्य कोटितीर्थके सेवनका फल पाता है। सुदर्शन, दैत्यसूदन, विष्ण्वावर्त, शिवावर्त और लक्ष्म्यावर्त—इन तीर्थोंमें जो दान दिया जाता है, उसका पुण्य असंख्य होता है। वहाँ श्रीविष्णुको प्रसन्न करके मनुष्य अनन्त फलका भागी होता है। श्रीविष्णुक्षेत्रका
- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १००९ ---|---
प्रमाण एक कोसका बताया गया है। उसके भीतर ब्रह्महत्याका प्रवेश नहीं होता। जो वहाँ एक मासतक उपवास तथा अग्निहोत्र करता है, जो स्त्री वहाँ पातिव्रत्यधर्मका पालन करती है तथा जो मनुष्य स्वाध्याय, यज्ञ, चान्द्रायण, पराक तथा पितरोंका तिल और जलसे तर्पण करते हैं, उनके पितर तृप्त होकर भगवान् विष्णुके धाममें विहार करते हैं और उन मनुष्योंको भी अपने सत्कर्मोंका उत्तम फल प्राप्त होता है। जो एकरात्र, त्रिरात्र, कृच्छ्र, सान्तपन, अतिकृच्छ्र, पर्णकृच्छ्र तथा अन्यान्य वैष्णवव्रत करता है और जो दोनों पक्षोंकी एकादशीको भोजन नहीं करता है, वह इन व्रतोंके द्वारा भगवान् विष्णुके लोकमें पूजित होता है। चाण्डाल, श्वपच अथवा पशु-पक्षीकी योनिमें पड़ा हुआ प्राणी भी यदि इस तीर्थमें अपने प्राणोंका त्याग करता है, तो वह भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। इस तीर्थमें मासोपवासव्रत करनेवाले पुरुषों तथा पतिव्रता स्त्रियोंको देखकर धर्मराज स्वयं ही वहाँ जा उनके लिये अर्घ्य समर्पण करते हैं और उन महात्माओंको वैष्णवलोकका दर्शन कराकर लौट आते हैं। ब्रह्माजीके मानसपुत्र सप्तर्षियोंने एक समय धर्मराजसे पूछा- 'धर्म ! क्या कारण है कि आप यहाँ स्वयं पैदल विचर रहे हैं? इससे हमें बड़ा विस्मय हुआ है। महाभाग! इसका कारण बताइये?'
यह सुनकर धर्मराजने हँसते हुए कहा- मुनिवरो ! मेरे भयंकर दूत पतिव्रता स्त्रियों, मासोपवासी पुरुषों तथा इन सबके विमानोंकी उज्ज्वल दीप्तिकी ओर दृष्टिपात करनेमें असमर्थ हो रहे हैं। इसलिये वे लौट गये हैं। इसीलिये मैं पैदल गया था।
मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजन् ! अमरावतीमें अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुका निवास है। वहाँ किया हुआ श्रीहरिका पूजन कलियुगके दोषोंका नाश करनेवाला है। नर्मदाके उत्तर तटपर एक अन्य श्रेष्ठ देवता हैं, जो ब्रह्मेश्वरके नामसे विख्यात हैं। वे सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। उनके पूजनसे पापराशि नष्ट होती है और पितर तृप्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं। लंकेश्वरसे दक्षिण सिद्धलिंग बताया गया है। उसके पूजन और स्पर्शसे गणपतिपदकी प्राप्ति होती है। विश्वेश्वर नामक महालिंग सर्वदेवमय और शुभ है। वैशाख शुक्ला अष्टमीको उसके पूजनसे मनुष्य दस हजार शिवलिंगोंकी पूजाका फल पाता है और भगवान् शिवका अनुचर होता है। महाराज ! तत्पश्चात् नर्मदा नदीके उत्तर तटकी यात्रा करे। वहाँ परम सिद्धिदायक पापनाशन लिंग है। वहाँ स्नान, तर्पण और पूजन करनेसे ब्रह्महत्याका नाश होता है। उसके बाद सब पापोंका नाश करनेवाला ऋणमोचन लिंग है। उसके पूजनसे अनेक जन्मोंका ऋण नष्ट हो जाता है। ऋणमोचनके दर्शनपूर्वक तिल और जलकी अंजलि देनेसे पितर तबतक तृप्त रहते हैं, जबतक कि सूर्य, चन्द्रमा और ताराओंकी स्थिति बनी रहती है। नर्मदा और चरुके संगममें शास्त्रोक्त रीतिसे स्नान करके संगमके जल और बिल्वपत्रसे जो महादेवजीको स्नान कराता और उनकी पूजा करता है, उसकी उमा-महेश्वरधामसे कभी पुनरावृत्ति नहीं होती। चतुष्केश्वर नामक एक सिद्धलिंग है, जो आँवलेके फलके बराबर है। देवता और दैत्य उसका पूजन करते हैं। मनुष्य उसे नहीं देख पाते। जो परम धार्मिक पुत्र उस तीर्थमें श्राद्ध करता है, उसके पितर महाप्रलय कालतक तृप्त रहते हैं। चरु नामवाली नदी यज्ञ पर्वतसे निकली है। पूर्वकालमें अपने पुरोहित बृहस्पतिजीके साथ देवराज इन्द्रने यहाँ यज्ञ किया था। तबसे लोकमें समस्त देवताओंद्वारा इसकी परम पवित्र महिमाका गान किया जाता है। वहाँ दारुवन नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जो पृथ्वीपर सबके द्वारा सेवित होता है। त्रेतामें साठ हजार तपस्वी मुनियोंने उस तीर्थमें निवास किया था। वे सभी कन्द-मूल-फलका आहार करनेवाले और अग्निहोत्रपरायण थे। इस तीर्थके प्रभावसे उन्हें ब्रह्मलोककी प्राप्ति हुई है। दारुवनमें सब पापोंका नाश करनेवाला एक शिवलिंग है,
| १०१० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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जिसके पूजनसे मनुष्य गणपति होता है। वहीं सर्वदेवमय शुभ विमलेश्वर लिंग है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं और जो मरते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। उस तीर्थमें देवता और असुर सबको निर्मल करके पिनाकधारी महादेव अपने धाममें ले जाते हैं। जो वहाँ तिल, जल और पिण्डदान देकर पितरोंको तृप्त करता है, वह भगवान् महेश्वरके परम धामको जाता है। युधिष्ठिर! विमलेश्वर लिंगको तुम साक्षात् महेश्वर ही समझो। वहीं एक व्याघ्रेश्वर लिंग भी है, जहाँ व्याघ्रीको स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई थी। उस तीर्थमें तिल, जल और हविष्यका पिण्डदान देनेसे पुत्र अपने पहले और पीछेकी सौ-सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है और स्वयं जबतक चौदह इन्द्र व्यतीत होते हैं तबतक वरुणलोकमें निवास करता है। व्याघ्रेश्वरदेवके पूजन, कीर्तन और श्रवणसे मनुष्य इन्द्रलोकको प्राप्त होता है।
अमरकण्टकपर सूत्रयागका माहात्म्य, कावेरी-संगम और पयोष्णी-संगमकी महिमा तथा वहाँके अन्य तीर्थोंके सेवनकी महत्ता
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! चन्द्रग्रहण, सूर्य्यग्रहण, षडशीतिमुख, युगादि, विषुव, व्यतिपात, संक्रान्ति, कार्तिक, माघ तथा वैशाखकी पूर्णिमा, कपिलषष्ठी, वैशाख शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्ला नवमी, माघकी अमावास्या तथा भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी—ये युगादि तिथियाँ हैं। इन पर्वोंमें सूत्रयाग करना चाहिये। भगवान् शंकरके तुल्य जो पर्वत है, उसे उमासहित महादेवजी तथा गणेशजीका स्वरूप समझकर जो सूतसे लपेटता है, वह सहस्रों युगोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो स्त्री उस पर्वतको सूतसे आवेष्टित करती है, वह पतिसे संयुक्त एवं पुत्रवती होती है। राजन्! रेशमी सूत अथवा कपासका सूत लेकर उसे नौ तागोंका या दस, बारह, अठारह अथवा चौबीस तागोंका कर ले। फिर उसे कोटितीर्थमें धोवे और गन्ध एवं धूपसे सुवासित करे। तत्पश्चात् उसमें फूलकी माला बाँधे और रातमें दीपावली जलावे। ॐकारतीर्थमें विधिपूर्वक रातमें जागरण करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहे और निराहार रहकर रात्रि व्यतीत करे। फिर प्रातःकाल ॐकारेश्वरका पूजन एवं उत्सव करे। एकाग्रचित्त होकर अक्षयवटमें सूत बाँधे और सर्वतीर्थमय शुभस्वरूप कोटितीर्थकी यात्रा करे। वहाँसे ऋणमोचन, पापनाशन, नरकेश्वर, गन्धर्वेश्वर और अंगारेश्वरतीर्थमें होते हुए सर्वतीर्थमय ब्रह्मावर्तमें जाय। वहाँ स्नान करके मनुष्य शिवलोकको पाता है। उस तीर्थमें तिल और जल देनेसे पितरोंकी सद्गति होती है। सर्वपापनाशक दारुकेश्वर लिंगके पूजनसे मनुष्य विद्याधर होता है। दारुकेश्वरसे भृगुलिंगके समीप जाय। वहाँ जानेमात्रसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। वहाँसे जालेश्वरतीर्थको जाय, जो सब तीर्थोंमें उत्तम है। वहाँ स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जालेश्वरमें तिल और जलकी अंजलि देनेसे पितरोंको अक्षय गति प्राप्त होती है। जालेश्वरसे पुनः कोटितीर्थमें आवे और विधिपूर्वक स्नान करके ॐकारेश्वर महादेवके श्रीअंगोंमें श्वेत सूत बाँधे। फिर ॐकारेश्वरकी पूजा करके दीपमाला जलावे। तत्पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे—‘महेश्वर! आपके प्रसादसे मेरा यह सूत्रयाग सफल हो।’ तदनन्तर यतियोंको भोजन करावे और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। उसके बाद भाई-बन्धु और भृत्यवर्गके साथ पारण करे। जो शारीरिक कष्ट उठाकर शिवपर्वतकी परिक्रमा करता है, उसे पग-पगपर यज्ञका फल प्राप्त होता है।
उत्तर और दक्षिणमें जो तीर्थ हैं, वे भगवान् शिवके साक्षात् स्थान कोटितीर्थमें विलीन होते हैं। समुद्रपर्यन्त पृथ्वीमें जो तीर्थ हैं, वे परम-
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०११
| पदस्वरूप कोटितीर्थमें लयको प्राप्त होते हैं। नृपश्रेष्ठ! नर्मदा और अमरावती तथा नर्मदा और ॐकारेश्वरके मध्यभागमें कोटितीर्थ विद्यमान है, जिसमें पातालके एक लाख तीर्थ निवास करते हैं। साक्षात् महादेवजीने कपिला और नर्मदाके बीचमें उन सब तीर्थोंकी स्थापना की है। महाराज ! इसके बीच रुद्रावर्तके जलमें जो मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करते हैं, वे शिवलोकमें जाते हैं तथा जो नर्मदाके उत्तर तटमें निवास करते हैं, वे रुद्रलोकके निवासी होते हैं। जो वाम भाग (दक्षिण तट)-पर निवास करते हैं, वे विष्णुलोकमें जाते हैं। जो अमरकण्टक पर्वतपर पूर्व और पश्चिम भागमें निवास करते हैं, वे रुद्र, ब्रह्मा और विष्णुके लोकमें जाते हैं। सूर्यग्रहणके समय न्यायोपार्जित धनका कोटितीर्थमें दान करनेसे अनेक प्रकारके पुण्य होते हैं। कावेरीके पूर्वभागमें जहाँतक पर्यंक पर्वत है, उसके बीचमें तीर्थोंकी संख्या दस लाख बतायी गयी है। नर्मदासे लेकर जमदग्नि आश्रमके बीचमें श्रीकण्ठ और नीलकण्ठ नामक शिवलिंग स्थित हैं। नर्मदाके उभय तटोंपर एक कोसके भीतर जितने भी स्वयम्भू देवता हैं, उन सबको सिद्धिदायक जानना चाहिये। वे सभी इच्छानुसार काम, भोग और फल देनेवाले हैं। भारत ! यह अमरकण्टक पर्वत जिस प्रकार सब ओरसे पवित्र है, वैसा पवित्र मुझे तीनों लोकोंमें दूसरा कोई पर्वत नहीं दिखायी देता। कोटितीर्थ और अमरकण्टक दोनों ही परम पवित्र हैं। इन्हें स्वर्ग, मोक्ष तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता समझो। चतुर्दशी मंगलवारको जब व्यतिपात योग हो, तब कावेरीसंगममें स्नान करनेसे सहस्रगुना पुण्य होता है। जो शस्त्रद्वारा मारे गये हैं, ऐसे लोगोंके निमित्त वहाँ तिलमिश्रित जलकी अंजलि देनेसे और एकोद्दिष्ट श्राद्ध करनेसे वे स्वर्गलोक पाते हैं। नर्मदा और कावेरीके जल और जंगली तिलसे तृप्त किये हुए पितर परम गतिको प्राप्त होते हैं। सहस्रों धाराओंसे कावेरी नदी इस भूतलपर प्रसिद्ध है। कावेरीके जलसे समस्त पृथ्वी व्याप्त है। | नर्मदाके दक्षिण तटपर वाराह और विन्ध्याचलमें सम्पूर्ण देवताओंको प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली पयोष्णी नदी प्रकट हुई है। पूर्वकालमें महादेवजीके आराधना करनेपर साक्षात् पार्वतीस्वरूपा पयोष्णी नदीका प्रादुर्भाव हुआ है। वह यशस्वी वाराह पर्वतके शरीरसे निकली है। उसमें स्नान करनेपर मनुष्य निश्चय ही इस संसारमें जन्म नहीं लेता। युधिष्ठिर ! वहाँ तिलोदक देनेसे पितर लाखों वर्षोंतक भगवान् शिवके लोकमें क्रीडा करते हैं। चन्द्रग्रहणके समय वाराह और विन्ध्याचल पर्वतपर कुरुक्षेत्रके समान पुण्य होता है। यह साक्षात् भगवान् शंकरका कथन है। वाराह पर्वतसे लेकर पयोष्णी नदीके संगमतक एक करोड़ तीर्थ बताये गये हैं। पयोष्णीसंगममें सोमावर्त नामक तीर्थकी स्थिति कही जाती है। वह स्थान सब ओरसे पवित्र है। जहाँ चार भुजाधारी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीपति निवास करते हैं, उस एक कोसके क्षेत्रको विष्णुक्षेत्र जानना चाहिये। आश्विनमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी और अमावास्या तथा शुक्ल पक्षकी प्रतिपदा—ये क्रमशः उस तीर्थके पर्व हैं। चतुर्दशीको चारका योग होनेपर अर्थात् मास, पक्ष, तिथि और विष्णुक्षेत्रका संयोग होनेपर वहाँ अमृतकी धारा बहती है। उस दिन वहाँ तर्पण करनेसे पितर अवश्य ही तृप्त होते हैं। सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें जो फल बताया गया है, वह तापी और पयोष्णीके संगममें भी प्राप्त होता है। नर्मदाके दक्षिण पातालसे एक तीर्थ प्रकट हुआ है, जो तीनों लोकोंमें कावेरीकुण्डके नामसे विख्यात हुआ है। उसमें स्नानमात्र करनेसे मनुष्य गणाध्यक्ष पदको प्राप्त करता है। वहाँ कुण्डेश्वर नामक एक सिद्धलिंग है, जो देवताओं और सिद्धोंसे सुसेवित है। उस पवित्र लिंगका जो भूलसे भी पूजन कर लेता है, उसके पुण्यकी कोई संख्या नहीं है। स्वयं प्रकट हुए जो स्वयम्भू लिंग हैं, वे स्वर्ग और मोक्ष देनेवाले हैं। कावेरीमें मनुष्य जहाँ-कहीं भी स्नान करता है, वह अश्वमेधके फलको पाकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। |
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| १०१२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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भद्ररुद्रेश्वरकी महिमा, दुर्वासाजीके द्वारा अमरकण्टकका गयातीर्थके तुल्य होना तथा राजा भरतका यज्ञ
| मार्केण्डेयजी कहते हैं—राजन्! एक भद्र-रुद्रेश्वर नामक लिंग है, जो उत्तम सिद्धियोंको देनेवाला है। पूर्वकल्पमें भद्र और रुद्र नामवाले दो गन्धर्व थे। वे दोनों भाई थे। उन्होंने विधिपूर्वक इस शिवलिंगकी अर्चना करके विद्याधरलोक प्राप्त किया।<br><br>आदिकल्पके चाक्षुष मन्वन्तरमें सत्ययुग आनेपर निमि नामसे प्रसिद्ध एक चक्रवर्ती राजा हुए। वे ब्राह्मणके क्रोधसे पक्षी-योनिमें पड़ गये थे। उन्होंने सोमवती अमावास्यामें यहाँ स्नान करके इस तीर्थके माहात्म्यसे पक्षी-योनि त्यागकर स्वर्गलोक प्राप्त किया।<br><br>एक समय उग्र तपस्वी दुर्वासा मुनि सब तीर्थोंमें घूम रहे थे। घूमते-घूमते वे पितरोंके हितकी कामनासे पितृतीर्थ गयाजीमें गये। वहाँ स्नान करके महादेवजी तथा ब्रह्माजीकी पूजा करनेके पश्चात् उन्होंने कुश और तिलयुक्त जलांजलि तथा पिण्ड पितरोंके लिये अर्पण किये। पिण्डदान करके दुर्वासाजीने मुनियोंसे कहा—'मुनिवरो! मैंने सुना था कि इस तीर्थमें पितरलोग उपस्थित होकर अपने हाथसे पिण्ड ग्रहण करते हैं, वह बात आज मैं नहीं देखता। अतः मेरी तो तीर्थयात्रा व्यर्थ हो गयी।'<br><br>मुनि बोले—अमावास्याको यहाँ दिया हुआ पिण्डदान पितरलोग अपने हाथमें लेते हैं, अतः आप अमावास्यातक प्रतीक्षा कीजिये।<br><br>दुर्वासाने कहा—अब न तो यहाँ पिण्ड दूँगा और न स्नान एवं दान ही करूँगा।<br><br>इसके बाद उन्होंने मुनिवर एरण्डसे कहा—आप क्यों अपने शरीरको क्लेश दे रहे हैं? कमण्डलु हाथमें लेकर ॐकारतीर्थ और नर्मदा नदीकी यात्रा कीजिये। ऐसा कहकर दुर्वासा मुनि ऋषियोंके साथ अमरकण्टक पर्वतपर आये और ॐकारेश्वरकी पूजा करके उनका इस प्रकार | स्तवन किया।<br><br>दुर्वासा बोले—कालस्वरूप महादेवजीको नमस्कार है। त्रिमूर्तिधारी शिवको नमस्कार है। अव्यक्त और व्यक्तस्वरूप अनन्तानन्तगामी भगवान् शंकरको नमस्कार है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद जिनके स्वरूप हैं, उन सर्वज्ञ शिवको नमस्कार है। भवोद्भव! जगन्नाथ! उमाकान्त! आपको नमस्कार है। कल्याणकारी सुखदाता भवको नमस्कार है। मंगलकारी शंकरको नमस्कार है। तीन नेत्रोंवाले आपको नमस्कार है। अर्धचन्द्रधारी, श्रीकण्ठ और नीलकण्ठको नमस्कार है। सर्पोंका आभूषण धारण करनेवाले त्रिशूलधारी रुद्रको नमस्कार है। पिनाक धनुष धारण करनेवाले महादेवको नमस्कार है। प्रभो! आप शर्व, सर्वरूप और चराचर जगत्स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। सुरेश्वर! इस लोक और परलोकमें मेरे अपराधको आप क्षमा करें। देवेश! उमापते! आपके समान दूसरा कोई नहीं है।<br><br>यह दिव्य स्तुति सुनकर ॐकारस्वरूपधारी भगवान् शिव बोले—महाभाग! तुम वर माँगो।<br><br>दुर्वासाने कहा—देव! यह तीर्थ गयाके समान हो जाय।<br><br>भगवान् ॐकार बोले—तपोधन! मेरे प्रसादसे यह तीर्थ आजसे ही गयातुल्य हो जायगा।<br><br>इस प्रकार वरदान पाकर ब्रह्मर्षि दुर्वासा अमरकण्टकके पूर्वभागमें मुनियोंके साथ रहने लगे।<br><br>मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाभाग! तदनन्तर नर्मदात्तटपर विद्यमान शल्या और विशल्या तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है। उस तीर्थमें अतिशय उत्तम यज्ञेश्वर तथा धूपेश्वर लिंग हैं। उनको सिद्धिदाता और मोक्षदाता जानो। उस तीर्थमें तिल और जलसे तर्पण करनेपर पितर सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्रोंके स्थिति-कालतक तृप्त रहते हैं।<br><br>राजन्! सूर्यवंशमें भरत नामसे प्रसिद्ध एक |
| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १०१३ |
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राजा हो गये हैं, जो सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन करते थे। एक समय राजा भरतने यज्ञकर्ममें तत्पर हो भृगुपर्वतके दक्षिण भागमें दस योजन विस्तृत यज्ञभूमि निर्माण करायी, जो कुण्ड और यज्ञमण्डपसे सुशोभित थी। यज्ञकी सब सामग्रियोंसे सम्पन्न हो वेदमन्त्रोंके उच्चारणकी ध्वनिसे आकाश और पृथ्वीको गुँजाते हुए महाराज भरतने यज्ञ प्रारम्भ किया। उन्होंने होमसे सप्तलोकवासी देवताओंको तृप्त किया। इस प्रकार अमित तेजस्वी राजाका यज्ञ अभी चल ही रहा था कि उसका विध्वंस करनेके लिये भयानक रूपवाले राक्षस माल्यवान्, सुमाली, सुकेशी, शंख और दूषण आदि सहस्रोंकी संख्यामें आ धमके। उन्होंने यज्ञकी समस्त वस्तुएँ नष्ट-भ्रष्ट कर डालीं। सब देवता भाग चले, ऋत्विज मार गिराये गये। इस प्रकार राक्षसोंद्वारा उस यज्ञके नष्ट किये जानेपर राजा भरत आहुतिसे प्रज्वलित हुए अग्निकी भाँति क्रोधसे जल उठे और समस्त राक्षसोंका उन्होंने संहार कर डाला। तत्पश्चात् अपने ब्राह्मण ऋत्विजोंको राक्षसोंद्वारा भयभीत, धराशायी तथा मारे गये देख उन्हें बड़ा शोक हुआ। वे देवमन्त्री बृहस्पतिजीसे बोले—'ब्रह्मन्! आप सब देवताओंके गुरु, तीनों कालकी बातें जाननेवाले तथा त्रिवेदवेत्ता हैं। देवकण्टक राक्षसोंने मेरे लिये आये हुए इन ब्राह्मणोंकी हत्या कर डाली है। इसका प्रायश्चित्त मुझे क्या करना चाहिये।'
बृहस्पतिजी बोले—नृपश्रेष्ठ! मैं तुम्हें संजीवनी विद्या देता हूँ।
उस विद्याके प्रभावसे राजाने सब ब्राह्मणोंको जीवित किया। नूतन जीवन पाकर ब्राह्मणोंने देवगुरु बृहस्पतिकी बड़ी प्रशंसा की। तदनन्तर पूर्ण तथा उत्तम दक्षिणासे युक्त वह यज्ञ समाप्त हुआ। यज्ञमें जो यूप गड़े थे, उन्हींके मूलसे वहाँ शल्या और विशल्या नामवाली दो नदियाँ प्रकट हुईं। वे दोनों लोकपावनी नर्मदामें मिल गयीं। इसके बाद देवतालोग अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गको चले गये। राजा भरतने भी ब्राह्मणोंके साथ अपनी पुरीमें प्रवेश किया। भरतेश्वरलिंग ब्रह्मयोनिमें स्थित है।
ब्रह्माजीके द्वारा सौम्या दृष्टिसे दानवोंका निवारण तथा रुद्रके एक सौ एक नामोंद्वारा शिवजीका स्तवन
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! जो 'ॐ' इस एक अक्षरका जप और उसके अर्थभूत परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करते हुए शरीरका त्याग करता है वह परम गतिको प्राप्त होता है।* वेदमाता गायत्री ॐकारसे ही प्रकट हुई हैं। 'ॐ' इस एक अक्षरवाले तत्त्वमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों प्रतिष्ठित हैं। ॐकार ही वेदका मूल है। उसीसे श्रुतिरूपा शाखाएँ फैली हुई हैं। स्मृति और आगम ये फल, फूल एवं पत्ते हैं। जैसे ॐकार सब विद्याओंका आदि है, उसी प्रकार भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण देवताओंके आदि हैं। तीनों सन्ध्याएँ, तीनों काल, त्रिविध अग्नि, तीनों लोक तथा धर्म, अर्थ और काम—ये तीन वर्ग—सभी ॐकारमें ही स्थित हैं।
युधिष्ठिर! स्वायम्भुव मन्वन्तरके आदिकल्पके सत्ययुगमें नर्मदाके तटपर रहनेवाले देवताओंको कंकोल, कालिकेय और कालक नामवाले दानवोंने परास्त करके वहाँसे मार भगाया। वे देवता ब्रह्माजीके साथ महादेवजीकी शरणमें गये। तब सात पातालोंको भेदकर 'ॐ भूर्भुवः स्वः' का उच्चारण करते हुए पर्वतसे एक लिंग प्रकट हुआ, जो प्रज्वलित कालाग्निके समान कान्तिमान् था। उन लिंगरूपी
* ओमित्येकाक्षरं राजन् व्याहरन् समनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥
(स्क० पु०, आव० रे० ४७। १९-२०)