संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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[ ८ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १४८. धर्महरिकी स्थापना और स्वर्णखनि तीर्थ, रघुका सर्वस्व दान तथा कौत्सकी याचनाको सफल करना ............................................ | ५१४ | १६९. कपितीर्थकी महिमा—उसमें स्नान करनेसे रम्भा और घृताचीका शापसे उद्धार ...................... | ५७२ |
| १४९. सम्भेदतीर्थ, सीताकुण्ड, गुप्तहरि और चक्रहरि तीर्थकी महिमा ............................................ | ५१७ | १७०. रामेश्वर नामक महालिंगकी महिमा ............ | ५७३ |
| १५०. गोप्रतारतीर्थकी महिमा और श्रीरामके परमधाम-गमनकी कथा ............................................. | ५२० | १७१. भगवान् श्रीरामके द्वारा राक्षसोंसहित रावणका वध और सेतुके क्षेत्रमें रामेश्वरलिंगकी स्थापना | ५७६ |
| १५१. क्षीरोदकतीर्थ, बृहस्पतिकुण्ड, रुक्मिणी आदि कुण्डोंका माहात्म्य ...................................... | ५२३ | १७२. श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा हनुमान्जीको ज्ञानोपदेश | ५७९ |
| १५२. अयोध्याक्षेत्रके अन्य विविध तीर्थोंका वर्णन तथा वसिष्ठके मुखसे विभीषण आदिका अयोध्या-माहात्म्य-श्रवण ............................. | ५२५ | १७३. हनुमान्जीद्वारा भगवान् श्रीराम और सीताका स्तवन तथा अपने लाये हुए शिवलिंगका स्थापन | ५८२ |
| १५३. गयाकूप आदि अनेक तीर्थोंका माहात्म्य तथा ग्रन्थका उपसंहार ........................................ | ५२७ | १७४. भगवान् रामेश्वरके प्रभावसे राजा शंकरका ब्रह्महत्या और स्त्रीहत्याके पापसे उद्धार ....... | ५८४ |
| ( ३ ) ब्राह्मखण्ड<br>( सेतु-माहात्म्य ) | १७५. राजा पुण्यनिधिके यहाँ महालक्ष्मीका पुत्रीके रूपमें निवास एवं सेतुमाधवकी महिमा ....... | ५८८ | |
| १५४. सेतुतीर्थ (रामेश्वरक्षेत्र)-की महिमा ............... | ५३० | १७६. सेतुतीर्थकी यात्राका क्रम ........................... | ५९४ |
| १५५. सेतुबन्धकी कथा तथा सेतुमें स्थित मुख्य-मुख्य तीर्थोंके नाम ............................................... | ५३२ | १७७. सेतुतीर्थका माहात्म्य तथा इस खण्डका उपसंहार | ५९६ |
| १५६. चक्रतीर्थका माहात्म्य—गालवमुनि तथा धर्मकी तपस्याका वर्णन .......................................... | ५३५ | ( धर्मारण्य-माहात्म्य ) | |
| १५७. सेतुबन्धन आरम्भ करनेकी बात तथा सेतुयात्राका क्रम एवं विधान .......................................... | ५३९ | १७८. धर्मकी तपस्यासे धर्मारण्यक्षेत्रकी प्रसिद्धि और उसका माहात्म्य .......................................... | ६०२ |
| १५८. सीतासरोवर और मंगलतीर्थका माहात्म्य, राजा मनोजवकी कथा .......................................... | ५४० | १७९. सदाचार—शौच, स्नान, सन्ध्या, तर्पण, बलिवैश्वदेव आदिका महत्त्व .......................... | ६०६ |
| १५९. एकान्तरामनाथ, ब्रह्मकुण्ड, हनुमत्कुण्ड और अगस्त्यतीर्थका माहात्म्य ............................. | ५४४ | १८०. वेदोंके स्वाध्याय, बलिवैश्वदेव, अतिथिसवा, आठ प्रकारके विवाह, पंचयज्ञ तथा व्यावहारिक शिष्टाचारोंका कथन ................................. | ६१२ |
| १६०. रामतीर्थ, लक्ष्मणतीर्थ और जटातीर्थकी महिमा | ५४६ | १८१. पतिव्रता स्त्रियोंके बर्ताव, धर्म और नियम तथा श्राद्ध और धर्मारण्यका महत्त्व ...................... | ६१७ |
| १६१. लक्ष्मीतीर्थ और अग्नितीर्थका माहात्म्य—पिशाच-योनिको प्राप्त हुए दुष्पण्यका उद्धार ............. | ५४८ | १८२. धर्मारण्यवासी ब्राह्मणोंके गोत्र तथा उनकी रक्षाके लिये कामधेनुद्वारा वैश्योंकी उत्पत्ति ............. | ६२१ |
| १६२. चक्रतीर्थ, शिवतीर्थ, शंखतीर्थ और यमुना, गंगा एवं गयातीर्थकी महिमा—राजा जानश्रुतिको रैकवके उपदेशसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति ................ | ५५१ | १८३. लोलजिह्वाक्षका वध, गणेशजीकी उत्पत्ति और देवताओंद्वारा उनका स्तवन .......................... | ६२३ |
| १६३. कोटितीर्थकी महिमा—भगवान् श्रीकृष्णका अवतार, कंसवध तथा श्रीकृष्णका कोटितीर्थमें स्नान .. | ५५४ | १८४. संज्ञाकी तपस्या, अश्विनीकुमारोंका जन्म तथा वकुलादित्यकी स्थापना ................................ | ६२६ |
| १६४. सर्वतीर्थ तथा धनुष्कोटि तीर्थोंकी महिमा ...... | ५५८ | १८५. इन्द्रेश्वरकी स्थापना और उनकी महिमा, देवमज्जनक तड़ागका माहात्म्य तथा लोहापुरके अत्याचारसे धर्मारण्यकी जनताका पलायन .... | ६२७ |
| १६५. अश्वत्थामाके द्वारा सोते हुए पाण्डव-योद्धाओंका वध तथा धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे उसका उद्धार ...................................................... | ५६१ | १८६. सरस्वती नदी, द्वारकातीर्थ एवं गोवत्स आदि तीर्थोंकी महिमा .......................................... | ६२९ |
| १६६. धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे परावसुका पापसे उद्धार .. | ५६४ | १८७. संक्षेपसे श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन | ६३१ |
| १६७. धनुष्कोटिकी महिमा; सियार, वानर तथा दुराचार ब्राह्मणकी कथा और महालय श्राद्धकी आवश्यकता ................................. | ५६६ | १८८. वसिष्ठजीके द्वारा भिन्न-भिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन, श्रीरामकी धर्मारण्य-यात्रा, वहाँके भगे हुए ब्राह्मणोंको पुनः लाकर बसाना और सत्यमन्दिरकी स्थापना करना ....................... | ६३६ |
| १६८. क्षीरकुण्डकी उत्पत्ति और महिमा—महर्षि मुद्गलको भगवान् विष्णुका दर्शन ................ | ५७० | १८९. रामनामकी महिमा, कलियुगका प्रभाव तथा धर्मारण्यक्षेत्रके माहात्म्यश्रवणका फल .......... | ६४४ |
| ( चातुर्मास्य-माहात्म्य ) | |||
| १९०. चातुर्मास्य-व्रतका माहात्म्य, संयम-नियम, दया-धर्म तथा चौमासेमें अन्न आदि दानोंकी महिमा ... | ६४६ |