संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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[ ९ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| १९१. चातुर्मास्यमें इष्ट वस्तुके परित्याग तथा नियम-पालनका महत्त्व .................................................... | ६४९ |
| १९२. चातुर्मास्यमें विशेष-विशेष तप और भगवान्की षोडशोपचार पूजाका क्रम ................................. | ६५१ |
| १९३. ब्रह्माजीके द्वारा मानसी और शारीरिक सृष्टिका प्रादुर्भाव, चारों वर्णोंके धर्म तथा शूद्र जातियोंके भेदोंका वर्णन .................................................... | ६५४ |
| १९४. पैजवन शूद्र और महर्षि गालवका संवाद तथा शालग्राम-शिलाके पूजनका महत्त्व .................... | ६५६ |
| १९५. सतीका देहत्याग, पार्वतीविवाह, भगवान् शिवका हरिहररूपमें प्राकट्य और शालग्राम-शिलाका महत्त्व .................................................... | ६५८ |
| १९६. शालग्राम-पूजन, द्वादशाक्षर मन्त्र एवं राम-नामकी महिमा .................................................... | ६६१ |
| १९७. भगवान् शिवका नर्मदेश्वर शिवलिंगरूप होना तथा गालव-शूद्र-संवादका उपसंहार .................... | ६६३ |
| १९८. महादेवजीके द्वारा पार्वतीके प्रति ध्यानयोग एवं ज्ञानयोगका निरूपण ............................................ | ६६५ |
| १९९. ज्ञानयोग और उसके साधन, स्कन्दस्वामीका सेनापतित्व और कौमारव्रत ................................. | ६६६ |
| ( ब्रह्मोत्तरखण्ड ) | |
| २००. शिवके षडक्षर एवं पंचाक्षर मन्त्रका माहात्म्य, राजा दाशार्ह तथा रानी कलावतीकी कथा .... | ६६९ |
| २०१. शिवरात्रिको शिवपूजनका महत्त्व, राजा मित्रसहका वसिष्ठके शापसे राक्षस होकर ब्राह्मणकी हत्या करना और गौतमजीका उन्हें गोकर्णक्षेत्रकी महिमा सुनाना .................................................... | ६७१ |
| २०२. गोकर्णक्षेत्रमें शिवरात्रिके शिव-पूजनके माहात्म्यसे एक चाण्डालीका परमधामगमन .......................... | ६७४ |
| २०३. शिव-पूजाकी महिमाके विषयमें परम शिवभक्त राजा चन्द्रसेन और भक्त श्रीकर गोपकी अद्भुत कथा .................................................... | ६७७ |
| २०४. प्रदोषमें शिवपूजनकी अवहेलनासे दोषकी प्राप्तिके प्रसंगमें विदर्भराज और उसके पुत्रकी कथा | ६८० |
| २०५. प्रदोषव्रतकी विधि, इसके पालनसे द्विजकुमार और राजकुमारकी दरिद्रताका निवारण तथा राज्यकी प्राप्ति .................................................... | ६८३ |
| २०६. सोमवार-व्रतके प्रभावसे सीमन्तिनीको पुनः परम सौभाग्यकी प्राप्ति ................................................. | ६८८ |
| २०७. त्यागी हुई रानी और राजकुमारकी वैश्य एवं शिवयोगीद्वारा रक्षा तथा शिवयोगीका राजपुत्रको धर्मका उपदेश करना ........................................ | ६९३ |
| २०८. शिवयोगीसे शिव-कवचका उपदेश और दिव्य खड्ग एवं शंख पाकर भद्रायुका शत्रुओंको जीतना तथा निषधराजकी पुत्रीसे उसका विवाह ...... | ६९८ |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| २०९. भद्रायु तथा कीर्तिमालिनीके भक्तिभावकी परीक्षा लेकर भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ..... | ७०३ |
| २१०. भस्मकी महिमासे ब्रह्मराक्षसका उद्धार ......... | ७०६ |
| २११. भस्मकी महिमा, शबरकी चिताभस्मद्वारा की हुई पूजासे शिवजीकी प्रसन्नता और उसकी जली हुई पत्नीका पुनः जीवित होना ......... | ७०७ |
| २१२. उमामहेश्वरव्रतकी महिमा, इसके पालनसे शारदाको शिवलोककी प्राप्ति तथा सत्कथाश्रवणका माहात्म्य और ब्राह्मखण्डकी समाप्ति ........... | ७१० |
| ( ४ ) काशीखण्ड ( पूर्वार्ध ) | |
| २१३. मेरुगिरिसे स्पर्धा करके विन्ध्याचलका सूर्यके मार्गको रोकना और ब्रह्माजीके आदेशसे देवताओंका काशीमें अगस्त्य मुनिके समीप जाना ......... | ७१७ |
| २१४. बृहस्पतिजीके मुखसे लोपामुद्राके पातिव्रत-धर्मका वर्णन .................................................... | ७२१ |
| २१५. अगस्त्यजीका काशीपुरीसे प्रस्थान, विन्ध्यपर्वतको लघुरूपमें रहनेका आदेश और महालक्ष्मीकी स्तुति ................................................................. | ७२२ |
| २१६. मुक्तिदायक तीर्थोंका वर्णन तथा मानसतीर्थ एवं काशीकी श्रेष्ठता ................................................ | ७२५ |
| २१७. शिवशर्माका सात पुरियोंकी यात्रा करना और हरद्वारमें उसका परमधाम-गमन .................... | ७२८ |
| २१८. शिवशर्मा और विष्णुपार्षदोंका संवाद तथा विभिन्न लोकोंका वर्णन ................................................. | ७३१ |
| २१९. शिवशर्माका सूर्यलोकमें पहुँचकर सूर्यदेवकी महिमा श्रवण करना ......................................... | ७३३ |
| २२०. इन्द्रलोक तथा अग्निलोकका वर्णन, विश्वानर मुनिके द्वारा की हुई आराधनासे प्रसन्न होकर शिवजीका उन्हें वरदान देना .......................... | ७३६ |
| २२१. विश्वानरके पुत्र गृहपतिका भगवान् शिवकी आराधनासे अग्नि एवं दिक्पालका पद प्राप्त करना ...................................................... | ७३९ |
| २२२. नैर्ऋत्यलोक तथा वरुणलोकका वर्णन ........... | ७४२ |
| २२३. वायु, कुबेर, ईशान और चन्द्रमाके लोकोंकी स्थितिका वर्णन ................................................ | ७४४ |
| २२४. बुधलोक और शुक्रलोककी स्थिति, बुध और शुक्रके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति और वरदान-प्राप्ति .................................................. | ७४६ |
| २२५. मंगल, बृहस्पति और शनिके लोकोंकी स्थिति | ७४९ |
| २२६. सप्तर्षिलोक और ध्रुवलोककी स्थिति, ध्रुवकी तपस्या और वरदान-प्राप्ति .......................... | ७५१ |
| २२७. महर्लोक, जनलोक और तपोलोककी स्थिति, ब्रह्माजीके द्वारा सत्यलोकका महत्त्व-कथन और भारतवर्ष एवं वहाँके तीर्थोंकी महत्ता बताते हुए प्रयाग और काशीकी महिमाका प्रतिपादन .... | ७६० |