संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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[१०]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| २२८. वैकुण्ठ और कैलासकी स्थिति तथा शिव और विष्णुकी अभिन्नता एवं महत्ताका निरूपण | ७६३ | २५२. गणेशजीका काशीमें जाना और लोकप्रिय होना, गणेशजीका स्तवन | ८४५ |
| २२९. अगस्त्यजीका श्रीशैलपर कार्तिकेयजीकी सेवामें जाना और उनके मुखसे काशीकी महिमा श्रवण करना | ७६४ | २५३. भगवान् विष्णुका काशी-गमन, केशव एवं पादोदकतीर्थकी महिमा, धर्मक्षेत्रमें पुण्यकीर्तिका उपदेश तथा राजा दिवोदासकी निर्वाण-प्राप्ति | ८४६ |
| २३०. काशीकी उत्पत्ति-कथा, काशी और मणिकर्णिकाका माहात्म्य | ७६६ | २५४. धर्मनदतीर्थके पंचनद नाम पड़नेका कारण, अग्नि-विन्दुके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति, भगवान्के मुखसे पंचनद एवं विन्दुमाधवतीर्थकी महिमाका निरूपण | ८५० |
| २३१. श्रीगंगाजीकी महिमा | ७६८ | ||
| २३२. श्रीगंगाजीकी महिमा | ७७२ | २५५. भगवान् विष्णुद्वारा अपने आदिकेशव प्रभृति स्वरूपोंका वर्णन तथा अग्नि-विन्दुको मुक्ति | ८५३ |
| २३३. गंगासहस्रनामस्तोत्र | ७७३ | ||
| २३४. शिवकी कृपाके बिना काशीवासकी दुर्लभता तथा काशीकी महिमा | ७९४ | २५६. भगवान् शिवका स्वागत या वृषभध्वजतीर्थकी महिमा तथा शिवका काशीपुरीमें प्रवेश | ८५४ |
| २३५. काशीपुरीकी श्रेष्ठता, हरिकेश यक्षको शिवाराधनाके द्वारा दण्डपाणिपदकी प्राप्ति और दण्ड-पाण्यष्टक-स्तोत्र | ७९७ | २५७. जैगीषव्यपर भगवान् शिवकी कृपा और उनके द्वारा शिवकी स्तुति | ८५७ |
| २३६. ईशानके द्वारा ज्ञानोद (ज्ञानवापी) तीर्थका प्राकट्य, ज्ञानवापीकी महिमाके प्रसंगमें सुशीला (कलावती)-की कथा, काशीके विविध तीर्थोंका वर्णन | ८०१ | २५८. काशीके ब्राह्मणोंको भगवान् शिवका वरदान तथा काशीक्षेत्रकी महिमा | ८५९ |
| २३७. ज्ञानवापीकी महिमा और उसके सेवनसे माल्यकेतु और कलावतीको तारक ब्रह्मकी प्राप्ति | ८०४ | २५९. परापरेश्वर और व्याघ्रेश्वर लिङ्गकी महिमा, भगवान् शिवद्वारा व्याघ्ररूपधारी दैत्यका वध | ८६२ |
| २३८. संक्षेपसे सदाचार और उसके महत्त्वका वर्णन | ८०६ | २६०. हिमवान्के द्वारा काशीमें शैलेश्वर लिंगकी प्रतिष्ठा | ८६३ |
| २३९. संस्कारोंका संक्षिप्त परिचय, ब्रह्मचारी एवं ब्रह्मचर्य-आश्रमके धर्म | ८०८ | २६१. रत्नेश्वर लिंगकी महिमा | ८६५ |
| २४०. गृहस्थ-आश्रमके धर्म, पंचयज्ञकी महिमा, काशीवासकी महत्ता तथा राजा दिवोदासको पृथ्वीके राज्यकी प्राप्ति | ८११ | २६२. कृत्तिवासेश्वर लिंगका प्राकट्य और उसकी महिमा | ८६६ |
| २४१. गृहस्थोचित शिष्टाचार और धर्म | ८१३ | २६३. विभिन्न तीर्थोंके देवविग्रहोंका काशीमें आगमन और उनका स्थान | ८६७ |
| २४२. वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्मका वर्णन, योगमार्गका निरूपण | ८१८ | २६४. दैत्योंसहित दुर्गमासुरका देवी और उनकी शक्तियोंके साथ युद्ध | ८७० |
| २४३. मृत्युसूचक चिह्नोंका वर्णन | ८२५ | २६५. दुर्गदैत्यका वध, देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति और दुर्गानामकी प्रसिद्धि | ८७२ |
| २४४. महाराज दिवोदासके धर्मपूर्ण राज्यका वर्णन | ८२६ | २६६. काशीके अट्ठाईस प्रमुख लिंगोंका संक्षिप्त वर्णन तथा ॐकारेश्वरके प्राकट्यकी कथा, ब्रह्माजीके द्वारा ॐकारेश्वरका स्तवन और उनकी महिमा | ८७४ |
| २४५. भगवान् शिवके आदेशसे सूर्यका काशीमें गमन और निवास तथा लोलार्कतीर्थका माहात्म्य | ८२८ | ||
| २४६. उत्तरार्क सूर्यकी महिमा, सुलक्षणकी तपस्या और उसपर शिव-पार्वतीकी कृपा | ८३० | २६७. त्रिलोचन लिंगकी महिमा | ८७८ |
| २४७. साम्बादित्य, द्रौपदादित्य और मयूखादित्यकी माहात्म्य-कथा | ८३२ | २६८. केदारेश्वर लिंगकी माहात्म्य-कथा | ८८२ |
| २४८. गरुडेश्वरलिंग तथा खखोल्कादित्यकी प्रादुर्भाव-कथा, काशीमें गरुड़ और विनताकी तपस्या और वरदान-प्राप्ति | ८३६ | २६९. श्रीधर्मेश्वर लिंगका माहात्म्य, धर्मपीठका गौरव तथा मनोरथतृतीयाव्रतकी विधि और महिमा | ८८३ |
| काशीखण्ड (उत्तरार्ध) | २७०. वीरेश्वर लिंगकी महिमाके प्रसंगमें राजा अमित्रजित और मलयगन्धिनीका चरित्र | ८८८ | |
| २४९. अरुणादित्य, वृद्धादित्य, केशवादित्य, विमलादित्य, गंगादित्य तथा यमादित्यकी महिमाका वर्णन | ८३८ | २७१. वीरेश्वरका जन्म, तपस्या, वीरेश्वर लिंगका प्राकट्य और उसकी महिमा | ८९१ |
| २५०. ब्रह्माजीका दिवोदासकी सहायतासे काशीमें यज्ञ करना और दशाश्वमेधतीर्थकी महिमा | ८४१ | २७२. दुर्वासेश्वर (कामेश्वर) लिङ्गकी महिमा | ८९३ |
| २५१. पिशाचमोचनतीर्थकी महिमा | ८४३ | २७३. श्रीविश्वकर्मेश्वर लिंगकी महिमा | ८९४ |
| २७४. दक्षेश्वर तथा पार्वतीश्वर लिंगका माहात्म्य | ८९७ | ||
| २७५. नर्मदेश्वर तथा सतीश्वर लिंगका माहात्म्य | ८९८ |